Submit your work, meet writers and drop the ads. Become a member
घूमने फिरने के जमाने मे
एक ठहराव ढूँढ रही हूँ
महलों की ख्वाहिश नहीं है मुझे
जहाँ तू साथ हो ऐसा घर ढूंढ रही हूँ

सिर्फ तुझसे चीज़े लेने की चाह नहीं
कुछ तुझे देने की खुशी ढूँढ रही हूँ
साथ खुश हो मेरे तू हर पल
मैं तो एक ऐसा कल ढूँढ रही हूँ

सबूत नहीं मेरे प्यार का मेरे पास
जो तुझको मैं जवाब दे सकूँ
पर तु समझे मेरे प्यार को एक बार
मैं एक ऐसा पल ढूँढ रही हूँ
महलो की ख़्वाहिश नहि है मुझे
जहाँ तू साथ हो मैं तो ऐसा घर ढूँढ रही हूँ
जाके कोई क्या पुछे भी,
आदमियत के रास्ते।
क्या पता किन किन हालातों,
से गुजरता आदमी।

चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ।
एक को कसता है तो,
दुजे से पिसता आदमी।

जोर नहीं चल रहा है,
आदतों पे आदमी का।
बाँधने की घोर कोशिश
और उलझता आदमी।

गलतियाँ करना है फितरत,
कर रहा है आदतन ।
और सबक ये सीखना कि,
दुहराता है आदमी।

वक्त को मुठ्ठी में कसकर,
चल रहा था वो यकीनन,
पर न जाने रेत थी वो,
और फिसलता आदमी।

मानता है ख्वाब दुनिया,
जानता है ख्वाब दुनिया।
और अधूरी ख्वाहिशों का,
ख्वाब  रखता आदमी।

आया हीं क्यों जहान में,
इस बात की खबर नहीं,
इल्ज़ाम तो संगीन है,
और बिखरता आदमी।

"अमिताभ"इसकी हसरतों का,
क्या बताऊं दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर,
राख रखता आदमी।
कवि यूँ हीं नहीं विहँसता है,
है ज्ञात तू सबमें बसता है,
चरणों में शीश झुकाऊँ मैं,
और क्षमा तुझी से चाहूँ मैं।

दुविधा पर मन में आती है,
मुझको विचलित कर जाती है ,
यदि परमेश्वर सबमें  होते,
तो कुछ नर  क्यूँ ऐसे होते?

जिन्हें स्वार्थ साधने आता है,
कोई कार्य न दूजा भाता है,
न औरों का सम्मान करें ,
कमजोरों का अपमान करें।

उल्लू नजरें है जिनकी औ,
गीदड़ के जैसा है आचार,
छली प्रपंची लोमड़ जैसे,
बगुले जैसा इनका प्यार।

कौए सी है इनकी वाणी,
करनी है खुद की मनमानी,
डर जाते चंडाल कुटिल भी ,
मांगे शकुनी इनसे पानी।

संचित करते रहते ये धन,
होते मन के फिर भी निर्धन,
तन रुग्ण  है संगी साथी ,
पर  परपीड़ा के अभिलाषी।

जोर किसी पे ना चलता,
निज-स्वार्थ निष्फलित है होता,
कुक्कुर सम दुम हिलाते हैं,
गिरगिट जैसे हो जाते हैं।

कद में तो छोटे होते हैं ,
पर साये पे हीं होते है,
अंतस्तल में जलते रहते,
प्रलयानिल रखकर सोते हैं।

गर्दभ जैसे अज्ञानी  है,
हाँ महामुर्ख अभिमानी हैं।
पर होता मुझको विस्मय,
करते रहते नित दिन अभिनय।

प्रभु कहने से ये डरता हूँ,
तुझको अपमानित करता हूँ ,
इनके भीतर तू हीं रहता,
फिर जोर तेरा क्यूँ ना चलता?

क्या गुढ़ गहन कोई थाती ये?
ईश्वर की नई प्रजाति ये?
जिनको न प्रीत न मन भाये,
डर की भाषा हीं पतियाये।
  
अति वैभव के हैं जो भिक्षुक,
परमार्थ फलित ना हो ईक्छुक,
जब भी बोले कर्कश वाणी,
तम अंतर्मन है मुख दुर्मुख।

कहते प्रभु जब वर देते हैं ,
तब जाके हम नर होते हैं,
पर है अभिशाप नहीं ये वर,
इनको कैसे सोचुं ईश्वर?
  
ये बात समझ ना आती है,
किंचित विस्मित कर जाती है,
क्यों कुछ नर ऐसे होते हैं,
प्रभु क्यों नर ऐसे होते हैं?

अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
कवि को ज्ञात है कि ईश्वर हर जगह बसता है. फिर भी वह कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आता है , जो काफी नकारात्मक हैं . कवि चाह कर भी इन तरह के लोगों में प्रभु के दर्शन नहीं कर पाता . इन्हीं परिस्थियों में कवि के मन में कुछ प्रश्न उठते हैं , जिन्हें वो इस कविता के माध्यम से ईश्वर से पूछता है .
कह रहे हो तुम ये  ,
मैं भी करूँ ईशारा,
सारे  जहां  से अच्छा ,
हिन्दुस्तां हमारा।


ये ठीक भी बहुत  है,
एथलिट सारे जागे ,
क्रिकेट में जीतते हैं,
हर गेम में  है आगे।


अंतरिक्ष  में उपग्रह
प्रति मान फल  रहें है,
अरिदल पे नित दिन हीं
वाण चल रहें हैं,


विद्यालयों में बच्चे
मिड मील भी पा  रहें है,
साइकिल भी मिलती है
सब गुनगुना रहे हैं।


हाँ ठीक कह रहे हो,
कि फौजें हमारी,
बेशक  जीतती हैं,
हैं दुश्मनों  पे भारी।


अब नेट मिल रहा है,
बड़ा सस्ता बाजार में,
फ्री है वाई-फाई ,
फ्री-सिम भी व्यवहार में।


पर  होने से नेट भी
गरीबी मिटती कहीं?
बीमारों से समाने फ्री
सिम टिकती नहीं।


खेत में  सूखा है और
  तेज बहुत धूप है,
गाँव में मुसीबत अभी,
रोटी है , भूख है।


सरकारी हॉस्पिटलों में,
दौड़ के हीं ऐसे,
आधे तो मर रहें  हैं,
इनको बचाए कैसे?


बढ़ रही है कीमत और
बढ़ रहे बीमार हैं,
बीमार करें  छुट्टी  तो
कट रही पगार हैं।


राशन हुआ है महंगा,
कंट्रोल घट रहा है,
बिजली हुई न सस्ती,
पेट्रोल चढ़ रहा है।


ट्यूशन  फी है हाई,
उसको चुकाए कैसे?
इतनी सी नौकरी में,
रहिमन पढ़ाए कैसे?


दहेज़ के अगन में ,
महिलाएं मिट रही है ,
बाज़ार में सजी हैं ,
अबलाएँ बिक रहीं हैं।


क्या यही लिखा है ,
मेरे देश के करम में,
सिसकती रहे बेटी ,
शैतानों के हरम में ?


मैं वो ही तो चाहूँ ,
तेरे दिल ने जो पुकारा,
सारे  जहाँ  से अच्छा ,
हिन्दुस्तां   हमारा।


पर अभी भी बेटी का
बाप है बेचारा ,
कैसे कहूँ है बेहतर ,
है देश ये हमारा?


अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
मौजो से भिड़े  हो ,
पतवारें बनो तुम,
खुद हीं अब खुद के,
सहारे बनो तुम।


किनारों पे चलना है ,
आसां बहुत पर,
गिर के सम्भलना है,
आसां बहुत पर,
डूबे हो दरिया जो,
मुश्किल हो बचना,
तो खुद हीं बाहों के,
सहारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े  हो ,
पतवारें बनो तुम।


जो चंदा बनोगे तो,
तारे भी होंगे,
औरों से चमकोगे,
सितारें भी होंगे,
सूरज सा दिन का जो,
राजा बन चाहो,
तो दिनकर के जैसे,
अंगारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े  हो,
पतवारें बनो तुम।


दिवस के राही,
रातों का क्या करना,
दिन  के उजाले में,
तुमको है  चढ़ना,
सूरजमुखी जैसी,
ख़्वाहिश जो तेरी
ऊल्लू सदृष ना,
अन्धियारे बनो तुम,
मौजो  से  भिड़े  हो,
पतवारें बनो तुम।


अभिनय से कुछ भी,
ना हासिल है होता,
अनुनय से  भी कोई,
काबिल क्या होता?
अरिदल को संधि में,
शक्ति तब दिखती,
जब संबल हाथों के,
तीक्ष्ण धारें बनों तुम,
मौजो  से  भिड़े  हो,
पतवारें बनो तुम।


विपदा हो कैसी भी,
वो नर ना हारा,
जिसका निज बाहू हो,
किंचित सहारा ।
श्रम से हीं तो आखिर,
दुर्दिन भी हारा,
जो आलस को काटे,
तलवारें बनो तुम ।
मौजो  से  भिड़े  हो ,
पतवारें बनो तुम।


खुद हीं अब खुद के,
सहारे बनो तुम,
मौजो  से  भिड़े  हो,
पतवारें बनो तुम।


अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
फिल्म वास्ते एक दिन मैंने,
किया जो टेलीफोन।
बजने घंटी ट्रिंग ट्रिंग औ,
पूछा है भई कौन ?

पूछा है भई कौन कि,
तीन सीट क्या खाली है?
मैं हूँ ये मेरी बीबी है और,
साथ में मेरे साली है ।

उसने कहा सिर्फ तीन की,
क्यूं करते हो बात ?
पुरी जगह ही खाली है,
घर बार लाओ जनाब।

परिवार लाओ साथ कि,
सुनके खड़े हो गए कान।
एक बात है ईक्छित मुझको,
  क्षमा करे श्रीमान।

क्षमा करे श्रीमान कि सुना,
होती अतुलित भीड़।
निश्चिन्त हो श्रीमान तुम कैसे,
इतने धीर गंभीर?

होती अतुलित भीड़ है बेशक,
तुम मेरे मेहमान।
आ जाओ मैं प्रेत अकेला,
घर मेरा शमशान।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
पुराने जमाने में टेलीफोन लगाओ कहीं और थे , और टेलीफोन कहीं और लग जाता था . इसी बात को हल्के फुल्के ढंग से मैंने इस कविता में दिखाया है.
Shivam Porwal Dec 2017
Me bhi tumhari tarah 1 aam insaan hu
Pareshaniya mene bhi dekhi hai, takleefe mene bhi sahi h
Kuch waqt k liye khud Ko kamzor bhi paya hai
Mera bhi man mushkilo ko dekhkar ghbraya hai,

Par inhi sab chizo se 1 tajurba paaya hai
Jisne Zindagi ko jeena ka 1 naya rang sikhaya hai

Sangharsh aur musibatein to jivan ka ek hissa hai
Aage bhi badna hai sangharsh bhi nahi krna hai ye to galat kissa hai

Sangharsh ke bina tajurba kaha se laoge
Aur tajurbe ke bina kya sikhoge aur sikhaoge

Ab waqt aa gaya hai tumhe himmat dikhani hogi,
Apni kathinaiyo par apni asfaltao par tumko Vijay Pani hogi
Apne irado ko or majbut banana hoga
Kuch karna hai kuch karna hai in jazbato ko dil me utarna hoga

Ye zindagi ki ladai hai tumhe khud hi ladni hogi
Apni kamiyo ko taqat banane ki kala tumhe sikhni hogi
Tum chaho to duniya jeet skte **
Apne har sapne ko haqueeqat me badal skte ** !!! :)
An inspiration poem which inspires to fight with the conflicts
Shivam Porwal Sep 2017
Chalo ! Chalo aaj kuch esa kiya jae,

Apne Sapno ko Haqeeqat se Joda jae,

Ye dono 1 dusre se bilkul alag hai,

par dono hi apni kabiliyat ke liye mashoor hai,

Sapne, Sapne to Aasman hai, Jinki koi seema hi nahi,

Par Haqeeeqat to Aag se Bhare angaare hai, Jin par chal pana itna aasan nahi.

Sapne to woh raah hai, Jo hume kuch karne k liye prerit karti hai,

par haqeeqat, haqeeqat to un sapno ko bhi tod deti hai.

To kya ab haqeeqat ko dekhkr, sapne dekhna chod de,

ya apni khwaisho ke rukh ko hi mod le,

Agar Nahi, To fir chalo haqeeqat ko swikarte hai,

Apne sapno ko haqeeqat banane me jutt jate hai,

Mehnat kar apni kabiliyat ke rang sajate hai,

Apne sapno ko apni Manjil tak lekar jate hai,

Apne khwabo ke pankho ko or feltate hai,

Thoda Haste hai, Thoda hasate hai,

Chalo na !!!

Apni zindagi ko thoda or kamyab banate hai !!!!..

Written By :
SHIVAM PORWAL
This poem describe the relationship between dreams and the reality
Next page