इंतेहा हो गई पर सहती रही
उम्मीदो की दरिया जैसी बहती रही
कभी अपनों के लिए
कभी अपनों के सपनो के लिए
चाहे आखो में हो अश्क का सागर
होठो में ओरो की मुस्कराहट लिए
पथरीली रहो पर चलती रही
शाम की तरह ढलती रही
उम्मीदो के दरिया जैसी बहती रही
अस्काम के तराशे हम खुद्गरजो के लिए
मतलबी दुनिया के मकबरों के लिए
हर दर्द सहे उसने हँसते हँसते
जो मुड़ कर न आये उन पलों के लिए
औरत है वो देवी जो बुझती रही
मुरझा गई पर जीती रही
जाने कैसे वो इम्तेहा सहती रही
जाने कैसे दरिया बन बहती रही