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उनको पूजु है मन अब मेरा हो रहा
जन्म दाता है जो , जन्म जिसने दिया
है वो नर,
पर नारायण सा लगने लगे ।
सोये हम इसलिए जब वो जगने लगे ।
माँ पिता के कई रूप अंजान है
मै पुजारी हूँ
वो मेरे भगवान है ,
इस जहाँमे कोई पुष्प
है ही कहाँ ,
इनके चरणों में जो लाके
मै डाल दू ॥

मेरा तन मन समर्पण
मेरी आतमा,
जिसको चाहो चूनों अब
मेरी भोली माँ

मेरे पापा ,
मै बालक
कहूँ और क्या ??
रक्त हर तरल
आपके पग धरू ॥

जन्म दाता,
ये भी भेट कम लग रहा
पर मै हूँ बालक तुम्हारा
करू और क्या ??

तुझ को पूजु है मन, अब मेरा हो रहा
जन्म दाता है तु, जन्म तुमने दिया ॥

सूरज कुमर सिहँ

दिनांक – 21 – 07 - 2015
वो तुम्हीं हो परी

रात फिर ख्वाब मे
एक हसीना मिली
दिख रही नूर सी
हर कली से भली
       खो गई फिर कहाँ
  है मुझे क्या पता

होठ अंगुर से
आँख है फुलझडी
वो तुम्ही हो परी
वो तुम्ही हो परी

आँख मे है नशा
हर अदा मे मजा
मै तो सोया रहा
तुझ्मे खोया रहा

रात थी ख्वाब मे
जो हसीना मिली
वो तुम्ही हो परी
वो तुम्ही हो परी  ॥

सूरज कुमार सिहँ
दिनांक – 24 – 07 - 2015
=== Back का सिलसिला ===

Back का सिलसिला
संग चलने लगा
        ऐसा सोचा न था !!
ईस्क है पाने खोने का
एक सिलसिला
ऐसा सोचा न था !!
pass वो हो गई
Back मुझ को मिला !!
ऐसा सोचा न था !!

notes मै ने लिखा
पर पढी यार वो
ऐसा सोचा न था !!
प्यार मे मुझ को कैसा
दगा मिल गया !!
ऐसा सोचा न था !!

जब थी नजरे मिली
Back एक मे लगा
जब मिले तो दो – दस,
Back ढोना पडा !!
ऐसा सोचा न था !!

अब तो छे Back है
हर semester मिले
ऐसा सोचा न था !!
हम भी बेसर्म सा
मुस्कूराने लगे !!

बात घर तक गई
तो ये दंगा हुआ
मम्मी का प्यारा बेटा
लफन्गा हुआ !!

दादी की गालिया
तो कहर बन पडी
मेरी ध्यान फिर भी थी
उन पे अडी !!


Back लगता था तब
अब तो ree लग रहा
ऐसा सोचा न था !!
फिर मेरी हौसलो कि
हवा खुल गई !!


pass वो हो गई
fail मै हो गया !!

Back का सिलसिला
संग चलने लगा
ऐसा सोचा न था !!

सुरज कुमर सिहँ
दिनांक :-  17-03-2015
hindi poem on back paper
~ ईस्क कि सुरुआत ~

ईस्क सुरुआत तुम ने की
हम बद्नाम हो बैठे !
तुम्हारी आसकी में दर्द का
दरवान हो बैठे ॥

           मेरी हर हँसी पर रात-दिन
           खुशीयों का पहरा था ।
           मिली मुझसे जो तु,
            खुशीयों से हम परेशान हो बैठे ॥

हमारे घर भी खुशीयाँ आके
हर दिन लौट जाती है !!
उन्हे मैं लाख रोकूं पर
            वो मेरी एक नही सूनती ।
            मै थक कर बैठ जाता हूँ ,
            वो हँस कर भाग जाती है ॥

गई तु छोर कर
मेरी खुशी तो छोर जाती तु !
मैं हँसी को खोजते
          गम की गली मे लूट जाता हूँ !!
          खुशी आगे निकलती है
          मैं पिछे छुट जाता हूँ !!

तु शायद भूल जा
लेकिन ,
           मुझे वो याद आता है
           मै सोनु , सोना
           बाबू , बच्चा तुमहारा था ।
           इन सब ऐसे कोइ कैसे भूल जाता है ॥

मैं रोता हूँ , बिलकता हूँ !!
कोई चुप नही करता,
तेरे बेबी सर गोदि में
अपने अब नहि धरता ॥

तेरी यादो में खुद को
कभी मैं ढुढ्ने निकला !!
मगर अपने ही आसु में
मै हर दिन डूब जाता हूँ ॥

- सूरज कुमर सिहँ
दिनांक :- 14 / 06 /14
missing some one
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     गुड़िया……॥
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कहानी अब तेरी मेरी
मैं युँ किसको सूनाऊँगा ।
तेरी मासूमियत को मैं
समझ शायद ना पाऊँगा ॥

तू है भोली बहुत गुडिया
मैं तुम से कह नहि सकता
तेरी मासूमियत के छाव बिन
मैं रह नहि सकता ॥

युँ तेरी अन कही बातें
क्युँ मुझ को याद आती है
निगाँहो नये सपनें
सदा हर दिन बनाती है ॥

क्युँ सपनों के हकिकत को
तु अब तक जान ना पाई ।
वो गम कि एक परछाई
तु क्युँ पहचान ना पाई ॥

वो गम की एक गगरी बस
खुशी का तु खजाना हैं ।
तभी तो आज सूरज भी
यहाँ तेरा दिवाना है ॥

बनी तु राग सरगम की
सूरा का पात्र मै गुडिया ।
सफलता की है सूचक तु
तेरा दुर्भग्य मै गुडिया ॥

कभी तु हो ना हो मेरी ॥
सदा मैं हूँ तेरा गुडिया ॥

                     लेखक :- सूरज कुमार सिँह

दिनांक :- 14 / 02 / 2014
'''''''''''''''''  ये कैसी आजादी  ?? '''''''''''''''
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''­''''''''''''''''''''''''


आजाद कहाँ हम ?
ये कैसी आजादी ?
गुलामों से बढ कर
हमारी बरबादी ॥

दिया एक भी जला नहीं किसी घर में,
गरीब हम , क्या खाएँ, चूल्हा ठंढा घर में,
मिटे कैसे भूख जो पलती उदर मे।
बाहर भी जाएं तो खौफ जिगर मे,
आतंकी अनहोनियाँ नगर मे, ड्गर मे ॥

आजाद कहाँ हम ?
जब सुरसा महँगाई
निवाले पे खतरा
सरकारी बेहयाई ॥

समझों किस हालत में देश अपना आज है ।
लोग यहाँ चूहे तो नेतागण बाज है ॥
देश की स्टीयरिंग थामे घोटालेबाज है ॥
जो करे विरोध उस पर गिरती गाज है ॥
बस कहने को देश में जनता का राज है ॥


- सुरज कुमर सिहँ
दिनांक :- 07 / 11 / 2010
~~~~~~~~~~~~~~ इस बरस की होली  ~~~~~~~~~~~~~~~
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इस बरस की होली
कुछ याद आ रहा है ।
बचपन की यादे मुझ को
मन तक हिला रहा है ॥

पापा के रंग प्यारे
मम्मी की वो मलाई ।
छोटे – छोटे पिचकारी
संग छोटे बहन भाई ॥

होली की वो सरारत
सूबह से रात करना ।
राहों में खड़े होकर
पिचकरी में रंग भरना ॥

दोस्तो पे रंग लगाकर
फिर रुठना मनाना ।
उन छोटे – छोटे पल मे
खुद को भूल जाना ॥

कल पहर से मुझको
वो सब सता रहा है ।
इस बरस की होली
कुछ याद आ रहा है ॥

रंगो के रंग मे रंग कर
दो – चार बार नहाना ।
मम्मी पापा का गुस्सा
फिर प्यार से मुस्काना ॥

थे दो रुपये के छुट्टे
दौड़ कर दुकान जाना ।
दो रुपये के रंग मे
खुद को भूल जाना ॥


बचपन की वहीं होली
क्यों ? याद आ रही हैं ॥


लेखक :- सूरज कुमार सिँह

दिनांक :- 15 / 03 / 2014

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