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Feb 2015
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     गुड़िया……॥
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कहानी अब तेरी मेरी
मैं युँ किसको सूनाऊँगा ।
तेरी मासूमियत को मैं
समझ शायद ना पाऊँगा ॥

तू है भोली बहुत गुडिया
मैं तुम से कह नहि सकता
तेरी मासूमियत के छाव बिन
मैं रह नहि सकता ॥

युँ तेरी अन कही बातें
क्युँ मुझ को याद आती है
निगाँहो नये सपनें
सदा हर दिन बनाती है ॥

क्युँ सपनों के हकिकत को
तु अब तक जान ना पाई ।
वो गम कि एक परछाई
तु क्युँ पहचान ना पाई ॥

वो गम की एक गगरी बस
खुशी का तु खजाना हैं ।
तभी तो आज सूरज भी
यहाँ तेरा दिवाना है ॥

बनी तु राग सरगम की
सूरा का पात्र मै गुडिया ।
सफलता की है सूचक तु
तेरा दुर्भग्य मै गुडिया ॥

कभी तु हो ना हो मेरी ॥
सदा मैं हूँ तेरा गुडिया ॥

                     लेखक :- सूरज कुमार सिँह

दिनांक :- 14 / 02 / 2014
suraj kumar singh
Written by
suraj kumar singh  ODISHA
(ODISHA)   
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