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फिल्म वास्ते एक दिन मैंने, किया जो टेलीफोन। बजने घंटी ट्रिंग ट्रिंग औ, पूछा है भई कौन ? पूछा है भई कौन कि, तीन सीट क्या खाली है? मैं हूँ ये मेरी बीबी है और, साथ में मेरे साली है । उसने कहा सिर्फ तीन की, क्यूं करते हो बात ? पुरी जगह ही खाली है, घर बार लाओ जनाब। परिवार लाओ साथ कि, सुनके खड़े हो गए कान। एक बात है ईक्छित मुझको, क्षमा करे श्रीमान। क्षमा करे श्रीमान कि सुना, होती अतुलित भीड़। निश्चिन्त हो श्रीमान तुम कैसे, इतने धीर गंभीर? होती अतुलित भीड़ है बेशक, तुम मेरे मेहमान। आ जाओ मैं प्रेत अकेला, घर मेरा शमशान। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 15, 2019
May 15, 2019 at 6:20 AM UTC
हाय रे टेलीफोन
फिल्म वास्ते एक दिन मैंने, किया जो टेलीफोन। बजने घंटी ट्रिंग ट्रिंग औ, पूछा है भई कौन ? पूछा है भई कौन कि, तीन सीट क्या खाली है? मैं हूँ ये मेरी बीबी है और, साथ में मेरे साली है । उसने कहा सिर्फ तीन की, क्यूं करते हो बात ? पुरी जगह ही खाली है, घर बार लाओ जनाब। परिवार लाओ साथ कि, सुनके खड़े हो गए कान। एक बात है ईक्छित मुझको, क्षमा करे श्रीमान। क्षमा करे श्रीमान कि सुना, होती अतुलित भीड़। निश्चिन्त हो श्रीमान तुम कैसे, इतने धीर गंभीर? होती अतुलित भीड़ है बेशक, तुम मेरे मेहमान। आ जाओ मैं प्रेत अकेला, घर मेरा शमशान। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
पुराने जमाने में टेलीफोन लगाओ कहीं और थे , और टेलीफोन कहीं और लग जाता था . इसी बात को हल्के फुल्के ढंग से मैंने इस कविता में दिखाया है.
ajayamitabh7
Written by
40/M/Delhi, India
May 15, 2019
May 15, 2019 at 6:20 AM UTC
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