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क्या क्या काम बताओगे तुम,
राम नाम पे राम नाम पे?
अपना काम चलाओगे तुम,
राम नाम पे राम नाम पे?
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डीजल का भी दाम बढ़ा है,
धनिया ,भिंडी भाव चढ़ा है।
कुछ तो राशन सस्ता कर दो ,
राम नाम पे, राम नाम पे।
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कहने को तो छोटी रोटी,
पर खुद पर जब आ जाये।
सिंहासन ना चल पाता फिर ,
राम नाम पे राम नाम पे।
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पूजा भक्ति बहुत भली पर,
रोजी रोटी काम दिखाओ।
क्या क्या चुप कराओगे तुम ,
राम नाम पे राम नाम पे।
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माना जनता बहली जाती,
कुछ दिन काम चलाते जाओ।
पर कब तक तुम फुसलाओगे,
राम नाम पे राम नाम पे?
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
Apr 3, 2022
Apr 3, 2022 at 12:08 AM UTC
जब कान्हा के होठों पे मुरली गैया मुस्काती थीं,
गोपी सारी लाज वाज तज कर दौड़े आ जाती थीं।
किया प्रेम इतना राधा से कहलाये थे राधेश्याम,
पर भव सागर तारण हेतू त्याग चले थे राधे धाम।
पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।
सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।
जब पापी कुचक्र रचे तब हीं वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।
एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।
जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
May 31, 2021
May 31, 2021 at 1:36 AM UTC
कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया ,
अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया।
कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए,
जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए।
जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया,
तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया।
ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी,
दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी।
ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं ,
अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं।
कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया,
शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया।
जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था,
मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।
जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी ,
आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी।
और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे ,
मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे।
कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
May 23, 2021
May 23, 2021 at 1:21 AM UTC
तुम कहते हो करूँ पश्चताप,
कि जीवन के प्रति रहा आकर्षित ,
अनगिनत वासनाओं से आसक्ति की ,
मन के पीछे भागा , कभी तन के पीछे भागा ,
कभी कम की चिंता तो कभी धन की भक्ति की।
करूँ पश्चाताप कि शक्ति के पीछे रहा आसक्त ,
कभी अनिरा से दूरी , कभी मदिरा की मज़बूरी ,
कभी लोभ कभी भोग तो कभी मोह का वियोग ,
पर योग के प्रति विषय-रोध के प्रति रहा निरासक्त?
और मैं सोचता हूँ पश्चाताप तो करूँ पर किसका ?
उन ईक्छाओं की जो कभी तृप्त ना हो सकी?
वो चाहतें जो मन में तो थी पर तन में खिल ना सकी?
हाँ हाँ इसका भी अफ़सोस है मुझे ,
कि मिल ना सका मुझे वो अतुलित धन ,
वो आपार संपदा जिन्हें रचना था मुझे , करना था सृजन।
और और भी वो बहुत सारी शक्तियां, वो असीम ताकत ,
जिन्हें हासिल करनी थी , जिनका करना था अर्जन।
मगर अफ़सोस ये कहाँ आकर फंस गया?
कि सुनना था अपने तन की।
मोक्ष की की बात तो तू अपने पास हीं रख ,
करने दे मुझे मेरे मन की।
अजय अमिताभ सुमन
Apr 3, 2021
Apr 3, 2021 at 4:59 AM UTC
तुम आते हीं रहो देर से हम रोज हीं बतातें है,
चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहराते हैं।
लेट लतीफी तुझे प्रियकर नहीं समय पर आते हो,
मैं राही हूँ सही समय का नाहक हीं खिसियाते हो।
तुम कहते हो नित दिन नित दिन ये क्या ज्ञान बताता हूँ?
नही समय पर तुम आते हो कह क्यों शोर मचाता हूँ?
जाओ जिससे कहना सुनना चाहो बात बता देना,
इसपे कोई असर नही होगा ये ज्ञात करा देना।
सबको ज्ञात करा देना कि ये ऐसा हीं वैसा है,
काम सभी तो कर हीं देता फिर क्यों हँसते कैसा है?
क्या खुजली होती रहती क्यों अंगुल करते रहते हो?
क्या सृष्टि के सर्व नियंता तुम हीं दुनिया रचते हो?
भाई मेरे मेरे मित्र मुझको ना समझो आफत है,
तेरी आदत लेट से आना कहना मेरी आदत है।
देखो इन मुर्गो को ये तो नित दिन बाँग लगाएंगे,
जब लालिमा क्षितिज पार होगी ये टाँग अड़ाएंगे।
मुर्गे की इस आदत में कोई कसर नहीं बाकी होगा,
फ़िक्र नहीं कि तुझपे कोई असर नहीं बाकी होगा।
तुम गर मुर्दा तो मैं मुर्गा अपनी रस्म निभाते है,
मुर्दों पे कोई असर नहीं फिर भी आवाज लगाते है।
मुर्गों का काम उठाना है वो प्रति दिन बांग लगाएंगे,
मुर्दों पे कोई असर नहीं होगा जिंदे जग जाएंगे।
जिसका जो स्वभाव निरंतर वो हीं तो निभाते हैं,
चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहरातें हैं।
अजय अमिताभ सुमन
Mar 27, 2021
Mar 27, 2021 at 2:24 AM UTC
दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है ना कोई विरुद्ध खड़ा है।
जग की नज़रों में काबिल पर चेतन अंतर रूद्ध डरा है।
घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।
अभिलाषा के श्यामल बादल काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।
स्वयं जाल ही निर्मित करता और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।
अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।
तबतक जगतक दौड़ लगाते जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।
किस कीमत पे जग हासिल है चेतन मन अबुद्ध अधरा है।
अरि दल होता किंचित हरते निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।
किस शिकार का भक्षण श्रेयकर तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।
निज निश्चय पर संशय अतिशय मन से मन संरुद्ध लड़ा है।
मन चेतन संयोजन क्या जब खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।
अजय अमिताभ सुमन
Mar 19, 2021
Mar 19, 2021 at 5:48 AM UTC
आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के।
सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से ,
बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के?
ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा,
रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के?
दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन,
संभले नहीं संभलते हयात आदमी के।
दो गज जमीं तक के छोड़े ना अवसर,
ख्वाहिशें बहुत हैं दिन रात आदमी के।
बना रहा था कुछ भी जो काम कुछ न आते,
जब मौत आती मुश्किल हालात आदमी के।
खुदा भी इससे हारा इसे चाहिए जग सारा,
अजीब सी है फितरत खयालात आदमी के।
वक्त बदलने पे वक़्त भी तो बदलता है,
पर एक नहीं बदलता ये जात आदमी के।
अजय अमिताभ सुमन
Jan 17, 2021
Jan 17, 2021 at 11:45 PM UTC
मेरे पास छोड़ जाओ,
अपनी खुशबू, अपनी बाते।
उन्हें सम्भाल कर रखूंगी मैं,
चाहे दिन हो या हो रातें।
Aug 21, 2020
Aug 21, 2020 at 3:07 AM UTC
कभी चाहते थे,
तुम्हें ना खोना।
अभी चाहते हैं,
की काश तुम हमे कभी मिले ही ना होते।
Aug 14, 2020
Aug 14, 2020 at 3:12 AM UTC
क्षणभर विश्रांती चा विचार केला की आठवणींची चाहुल मात्र लुडबुड करायाला लागते
जनू खुप काळ निघुन गेला पण आठवण मात्र तशीच राहते, दडलेल एक पखरू मनातलं तसच मनात वावरत आहे
आठवणींचे क्षण मात्र उमलू लागले आहेत आणी भेटण्यासाठी अततुरतेने वाट पाहत आहेत
कळत नाही कसे सांगावे मनाला त्या क्षणभर विश्रांतीला आराम तरी कासा द्यावा
क्षण असा यावा की नुक्ताच भेटुन खुप आनंद वाटावा, त्याचा हसरा चेहरा बघूनी मन आनंदाने फुलावे
नजरेचा प्रत्येक तो अनमोल क्षण सरळ चेहरावर हस्य बनुन यावे
यावे हे क्षण लवकरच ज्याने तुला पाहुनी मनाची आसना उमलावी क्षणातच
Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:38 PM UTC
मन माझे अतूर झाले बोल तुझे ऐकण्यासाठी,
का शरीर थकुनही मन मात्र थके ना ...
रुंणगुणनारे गीत तुझे एकूनी रोज मी उठते,
स्पर्श तुझा घेता मनी ते माझ्या रुजुनी जाते ...
ये ना सख्या लवकर बघ मी आले,
तोच किनारा तोच समुद्र जणू आपलीच वाट पाहत आहे ...
दाटून आले क्षण असे फक्त तुझे नी माझे,
सांगते मला हरवुनी जावे तुझ्यात कोवळे हे मन माझे ...
Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:37 PM UTC
सूर तूझे जुळले असे
मनी माझ्या रमले असे
ताल तू घेता स्वर हि आले धावून
आवाजाने तुझ्या मीच गेल गुंगून
Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:26 PM UTC
चलते रहो और आगे बढ़ो,
तोह बस हम भी चल पड़े,
अपनी रूह की तलाश में,
पहाड़ो पे चल दिये, नदिया किनारे पे बैठ लिए,
जहन दो पल सुकून, हर वो जगह पे चल दिये,
यह पीड़ा, यह चोट जोह लगी ह इस रूह पे,
इस एहसास को मिटाने की हमारी यह लाखों कोशिशें जोह ठहरी ,
उझाला भी अंधकार है, रोशनी की तड़प में जतपटाते से चल दिये,
आंखें जैसे बटन की तरह खुली, बन्द करने पे मौत और खुली रहे तोह अन्धकार,
जाऊ कहाँ बताओ ज़रा, हर पल सलाह देने वाली मंडली का पत्ता ही बता दो ज़रा,
पूछेंगे उनसे हमारी रूह का पता,
टोटके तोह बताएं कैसे करूँ इससे रिहा ,
कहलेंगे इस रूह को रो भी लो ज़रा,
फुट फुट के रोयेगी, इस घुटन के फांदें को तोड़ेगी,
मलहम लगाएंगे उन गहरी चोट पे , प्यार से सिरहेँगे, सुकून की लोरी जोह गाएंगे,
बिछड़े हुई साथी को फिरसे जीना सिखाएंगे।।
Jul 29, 2020
Jul 29, 2020 at 1:13 PM UTC
ऐ आने वाले पल
कोई तो अच्छी खबर लेकर आ।
बहुत देख लिए दुख सबने,
अब तो थोड़ी खुशी देकर जा।
कब तक मैं आँसु बहाऊंगा,
कब तक इस दर्द को छुपाऊंगा।
एक बार तों मुझ पर रहम तू खा,
या छोड़ तनहा या जिन्दगी से मिलवा।
Jul 5, 2020
Jul 5, 2020 at 2:44 AM UTC
अक्सर जिन्हें खोने के नाम से ही रूह कांप उठती थी,
आज देखों अरसे बीत गए उनसे बात किए।
जिनके चेहरे से दिन की शुरुआत होती थीं,
आज शाम ढल गई बिना उनका नाम लिए।
जो सिर्फ़ अपने मतलब के लिए हमें मरने देने को तैयार थें,
आज सोचते हैं कैसे हम उनके साथ जीए।
कभी सोचा था ये उम्र भर का साथ हैं,
और रिश्ते के नाम पर वो सारे धोखे सहे जो तुमने दिये।
उन्हें खुशियाँ देकर,
सारे ग़म हमनें पियें।
खुद भी जख्मी थें हम,
मगर अपने जख्म छोड़ तेरे घाव हमने सियें।
Jul 4, 2020
Jul 4, 2020 at 8:10 AM UTC
Subha se sham ** gyi,
Par tum na aye.
Tumhari yaad aa gyi,
Par tum na aye.
Na aye tum,
Aag ki lau bujhne tak.
Meri saanas tham gyi,
Par tum na aye.
Jun 22, 2020
Jun 22, 2020 at 4:36 AM UTC
ये आँखे आत्मा का दरपन है,
बिन बोले सब बयान कर देती है।
छिपाती नहीं कुछ भी ये,
इंसान का हर राज़ बतादेती है।
झूठ इनकी फ़ितरत में नहीं,
ये तों सच का साथ ही देती है।
झाँकना हो किसीकी मन में तों,
रास्ता भी यहीं बतादेती है।
Jun 16, 2020
Jun 16, 2020 at 2:31 PM UTC
Kuch kam hi sahi,
Par is zindgi ne kuch diya to hai.
Kitne hi gehre the ghaw,
Par zindgi ne unhe siya to hai.
Beshak the wo dard bhare fasane,
Par is zindgi se humne kuch na kuch liya to hai.
Pal pal jod kar hi sahi,
Par is zindgi ko humne jiya to h.
Jun 13, 2020
Jun 13, 2020 at 5:01 PM UTC
Ye kahaani meri hai,
Kuch adhi hai kuch puri hai.
Kabhi to hai dil ke paas,
Kabhi inme duri hai.
Ye jo faasle hai na,
Filhaal ye ek majburi h.
Bairhaal to bas yun hai,
Ke sab chal raha hai.
Koi nahi janta ki,
Konsi kahaani puri or konsi adhuri h.
Jun 11, 2020
Jun 11, 2020 at 3:25 PM UTC
Ye raste jane hume kis or le jate hai,
Zara sa apnate hai kabhi,
To kabhi begane lagne lag jate h.
Ye tedhe-medhe ulte-sidhe raste,
Kis gali kis nukad par mud jate hai,
Jaha bhi ye mud jate hai wahi se naye mod ban jate hai.
Har mod har dagar par ye naye kisse nayi kahaaniyan sunate hai,
Kabhi haste hai hume to kabhi hume rulate hai,
Kabhi kisi ki zindgi ki shuruat to kabhi kisi ke kahaani ka ant ban jate hai.
Yehi to hai jo hume zindgi ke har naye-purane pahlu se rubaru karwate hai,
Jo ye girate hai to uth kar fir chalne ka sabab bi to hume yehi samjhate hai,
Ye raste hi to hai jo musafiro ko unki manzil ki or le jate hai.
Jo kabhi hote hai naraz to paas bhi ye khud hi bulate hai,
Apno ki ehmiyat kya hai is zindgi me yehi to hume btate hai,
Hai apnate kisko kabhi to kabhi kisiko bhul bhi ye jate hai.
Zindgi hai chalte rahne ka naam ye raste hi to hume yaad dilate hai,
Har pal har ghari kuch naya hume sikhate hai,
Jo milate hai kisise kabhi to kabhi kisiko dur bhi to yehi le jate hai.
Or agar gaur se dekha aur socha jaye to,
Zindgi ke mayine aur is hasin falsafe ka ehsaas waqt be waqt aksar ye raste hi hume karwate hai.
Jun 12, 2020
Jun 12, 2020 at 2:38 PM UTC
जाके कोई क्या पुछे भी,
आदमियत के रास्ते।
क्या पता किन किन हालातों,
से गुजरता आदमी।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ।
एक को कसता है तो,
दुजे से पिसता आदमी।
जोर नहीं चल रहा है,
आदतों पे आदमी का।
बाँधने की घोर कोशिश
और उलझता आदमी।
गलतियाँ करना है फितरत,
कर रहा है आदतन ।
और सबक ये सीखना कि,
दुहराता है आदमी।
वक्त को मुठ्ठी में कसकर,
चल रहा था वो यकीनन,
पर न जाने रेत थी वो,
और फिसलता आदमी।
मानता है ख्वाब दुनिया,
जानता है ख्वाब दुनिया।
और अधूरी ख्वाहिशों का,
ख्वाब रखता आदमी।
आया हीं क्यों जहान में,
इस बात की खबर नहीं,
इल्ज़ाम तो संगीन है,
और बिखरता आदमी।
"अमिताभ"इसकी हसरतों का,
क्या बताऊं दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर,
राख रखता आदमी।
Jun 24, 2019
Jun 24, 2019 at 3:21 AM UTC
कवि यूँ हीं नहीं विहँसता है,
है ज्ञात तू सबमें बसता है,
चरणों में शीश झुकाऊँ मैं,
और क्षमा तुझी से चाहूँ मैं।
दुविधा पर मन में आती है,
मुझको विचलित कर जाती है ,
यदि परमेश्वर सबमें होते,
तो कुछ नर क्यूँ ऐसे होते?
जिन्हें स्वार्थ साधने आता है,
कोई कार्य न दूजा भाता है,
न औरों का सम्मान करें ,
कमजोरों का अपमान करें।
उल्लू नजरें है जिनकी औ,
गीदड़ के जैसा है आचार,
छली प्रपंची लोमड़ जैसे,
बगुले जैसा इनका प्यार।
कौए सी है इनकी वाणी,
करनी है खुद की मनमानी,
डर जाते चंडाल कुटिल भी ,
मांगे शकुनी इनसे पानी।
संचित करते रहते ये धन,
होते मन के फिर भी निर्धन,
तन रुग्ण है संगी साथी ,
पर परपीड़ा के अभिलाषी।
जोर किसी पे ना चलता,
निज-स्वार्थ निष्फलित है होता,
कुक्कुर सम दुम हिलाते हैं,
गिरगिट जैसे हो जाते हैं।
कद में तो छोटे होते हैं ,
पर साये पे हीं होते है,
अंतस्तल में जलते रहते,
प्रलयानिल रखकर सोते हैं।
गर्दभ जैसे अज्ञानी है,
हाँ महामुर्ख अभिमानी हैं।
पर होता मुझको विस्मय,
करते रहते नित दिन अभिनय।
प्रभु कहने से ये डरता हूँ,
तुझको अपमानित करता हूँ ,
इनके भीतर तू हीं रहता,
फिर जोर तेरा क्यूँ ना चलता?
क्या गुढ़ गहन कोई थाती ये?
ईश्वर की नई प्रजाति ये?
जिनको न प्रीत न मन भाये,
डर की भाषा हीं पतियाये।
अति वैभव के हैं जो भिक्षुक,
परमार्थ फलित ना हो ईक्छुक,
जब भी बोले कर्कश वाणी,
तम अंतर्मन है मुख दुर्मुख।
कहते प्रभु जब वर देते हैं ,
तब जाके हम नर होते हैं,
पर है अभिशाप नहीं ये वर,
इनको कैसे सोचुं ईश्वर?
ये बात समझ ना आती है,
किंचित विस्मित कर जाती है,
क्यों कुछ नर ऐसे होते हैं,
प्रभु क्यों नर ऐसे होते हैं?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
Jun 15, 2019
Jun 15, 2019 at 2:45 AM UTC
कह रहे हो तुम ये ,
मैं भी करूँ ईशारा,
सारे जहां से अच्छा ,
हिन्दुस्तां हमारा।
ये ठीक भी बहुत है,
एथलिट सारे जागे ,
क्रिकेट में जीतते हैं,
हर गेम में है आगे।
अंतरिक्ष में उपग्रह
प्रति मान फल रहें है,
अरिदल पे नित दिन हीं
वाण चल रहें हैं,
विद्यालयों में बच्चे
मिड मील भी पा रहें है,
साइकिल भी मिलती है
सब गुनगुना रहे हैं।
हाँ ठीक कह रहे हो,
कि फौजें हमारी,
बेशक जीतती हैं,
हैं दुश्मनों पे भारी।
अब नेट मिल रहा है,
बड़ा सस्ता बाजार में,
फ्री है वाई-फाई ,
फ्री-सिम भी व्यवहार में।
पर होने से नेट भी
गरीबी मिटती कहीं?
बीमारों से समाने फ्री
सिम टिकती नहीं।
खेत में सूखा है और
तेज बहुत धूप है,
गाँव में मुसीबत अभी,
रोटी है , भूख है।
सरकारी हॉस्पिटलों में,
दौड़ के हीं ऐसे,
आधे तो मर रहें हैं,
इनको बचाए कैसे?
बढ़ रही है कीमत और
बढ़ रहे बीमार हैं,
बीमार करें छुट्टी तो
कट रही पगार हैं।
राशन हुआ है महंगा,
कंट्रोल घट रहा है,
बिजली हुई न सस्ती,
पेट्रोल चढ़ रहा है।
ट्यूशन फी है हाई,
उसको चुकाए कैसे?
इतनी सी नौकरी में,
रहिमन पढ़ाए कैसे?
दहेज़ के अगन में ,
महिलाएं मिट रही है ,
बाज़ार में सजी हैं ,
अबलाएँ बिक रहीं हैं।
क्या यही लिखा है ,
मेरे देश के करम में,
सिसकती रहे बेटी ,
शैतानों के हरम में ?
मैं वो ही तो चाहूँ ,
तेरे दिल ने जो पुकारा,
सारे जहाँ से अच्छा ,
हिन्दुस्तां हमारा।
पर अभी भी बेटी का
बाप है बेचारा ,
कैसे कहूँ है बेहतर ,
है देश ये हमारा?
अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित
Jun 12, 2019
Jun 12, 2019 at 1:47 AM UTC