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#kavita
🇮🇳 शहीद के नाम 🇮🇳 कवि कलम से एहसास लिखता है, परमात्मा जीवन का हर विश्वास लिखता है। इंसान तो सिर्फ़ कहानी लिखता है, पर परमात्मा हर कहानी का अंजाम लिखता है। लिखने वाला काग़ज़ पर आग उतारता है, हर शब्द से ज़ुल्म को ललकारता है। सोच की ज़ंजीरें तोड़कर लिखता है, पर इतिहास क्रांति का हिसाब माँगता है। लिखने वाला काग़ज़ पर जज़्बात लिखता है, परमात्मा हर शहीद की कुर्बानी इतिहास में लिखता है। शहीद भगत सिंह लाहौर की जेल में, माँ को आख़िरी ख़त, अपने अरमान लिखता है। नेताजी ने आज़ादी की अलख जगाई, “तुम मुझे खून दो” बनी अमर सच्चाई। आज़ाद हिंद फ़ौज से सपना साकार हुआ, भारत माँ के लिए जिसने सब कुछ सौंप दिया। चंद्रशेखर आज़ाद थे आज़ादी का अभिमान, मरते दम तक न झुके, न बदला अपना नाम। अल्फ्रेड पार्क में गोली को गले लगाया, पर दुश्मन के हाथ कभी खुद को न थमाया। 26 जनवरी हमें यह याद दिलाए, संविधान, कर्तव्य और बलिदान समझाए। जब तक इस तन में प्राण रहेंगे, भारत माँ के लिए ही लिखेंगे, जिएँगे, मरेंगे |
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Jan 24
Jan 24, 2026 at 10:20 AM UTC
Untitled
🇮🇳 शहीद के नाम 🇮🇳 कवि कलम से एहसास लिखता है, परमात्मा जीवन का हर विश्वास लिखता है। इंसान तो सिर्फ़ कहानी लिखता है, पर परमात्मा हर कहानी का अंजाम लिखता है। लिखने वाला काग़ज़ पर आग उतारता है, हर शब्द से ज़ुल्म को ललकारता है। सोच की ज़ंजीरें तोड़कर लिखता है, पर इतिहास क्रांति का हिसाब माँगता है। लिखने वाला काग़ज़ पर जज़्बात लिखता है, परमात्मा हर शहीद की कुर्बानी इतिहास में लिखता है। शहीद भगत सिंह लाहौर की जेल में, माँ को आख़िरी ख़त, अपने अरमान लिखता है। नेताजी ने आज़ादी की अलख जगाई, “तुम मुझे खून दो” बनी अमर सच्चाई। आज़ाद हिंद फ़ौज से सपना साकार हुआ, भारत माँ के लिए जिसने सब कुछ सौंप दिया। चंद्रशेखर आज़ाद थे आज़ादी का अभिमान, मरते दम तक न झुके, न बदला अपना नाम। अल्फ्रेड पार्क में गोली को गले लगाया, पर दुश्मन के हाथ कभी खुद को न थमाया। 26 जनवरी हमें यह याद दिलाए, संविधान, कर्तव्य और बलिदान समझाए। जब तक इस तन में प्राण रहेंगे, भारत माँ के लिए ही लिखेंगे, जिएँगे, मरेंगे |
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प्रेम, तुम हो... मुझमें मेरी धड़कन बन कर धड़कते तुम हो। मानो, अब मैं भी तुम ही हो।
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Nov 13, 2025
Nov 13, 2025 at 11:31 PM UTC
प्रेम
क्या क्या काम बताओगे तुम, राम नाम पे राम नाम पे? अपना काम चलाओगे तुम, राम नाम पे राम नाम पे? --------- डीजल का भी दाम बढ़ा है, धनिया ,भिंडी भाव चढ़ा है। कुछ तो राशन सस्ता कर दो , राम नाम पे, राम नाम पे। ---------- कहने को तो छोटी रोटी, पर खुद पर जब आ जाये। सिंहासन ना चल पाता फिर , राम नाम पे राम नाम पे। ---------- पूजा भक्ति बहुत भली पर, रोजी रोटी काम दिखाओ। क्या क्या  चुप कराओगे तुम , राम नाम पे राम नाम पे। ----------- माना जनता बहली जाती, कुछ दिन काम चलाते जाओ। पर कब तक तुम फुसलाओगे, राम नाम पे राम नाम पे? ----------- अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Apr 3, 2022
Apr 3, 2022 at 12:08 AM UTC
सबको कब तक फुसलाओगे
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा । या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा का ओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:40 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-32
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा । या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा का ओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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क्या यत्न करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का मार्ग दिखाती थी। अकिलेश्वर को हरना दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था मार्ग अति दू:साध्य कहीं। अतिशय साहस संबल संचय करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। अति वेदना थी तन में निज मस्तक अग्नि धरने में , पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में? जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे? या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? हठ मेरा वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन को जिद मेरी थी कैसी पर था भान कहीं। हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। गणादिप का संबल पा था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने या उनसे लड़ मरने का। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:36 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-31
क्या यत्न करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का मार्ग दिखाती थी। अकिलेश्वर को हरना दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था मार्ग अति दू:साध्य कहीं। अतिशय साहस संबल संचय करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। अति वेदना थी तन में निज मस्तक अग्नि धरने में , पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में? जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे? या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? हठ मेरा वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन को जिद मेरी थी कैसी पर था भान कहीं। हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। गणादिप का संबल पा था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने या उनसे लड़ मरने का। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ , शिलाधिस्त हो तृणालंबितलक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ। एक पाद का दृढ़ालंबन ना कल्पों हो सकता था , नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी होना हो सकता था। ना सुयोग था ऐसा अर्जुन जैसा मैं पुरुषार्थ रचाता, भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता। अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे लाता? मंत्रोच्चारित यज्ञ रचाकर मन चाहा वर को पाता? इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु की बाहों में, अस्त्र शस्त्र प्रचंड अति होते प्रकटित निगाहों में। निज बाहू गांडीव पार्थ धर सज्जित होकर आ जाता, निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता। भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं, धर्म राज और सहदेव से था कतिपय अनजान नहीं। एक रात्रि हीं पहर बची थी उसी पहर का रोना था , शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था। अगर रात्रि से पहले मैने महाकाल ना तुष्ट किया, वचन नहीं पूरा होने को समझो बस अवयुष्ट किया। महादेव को उस हीं पल में मन का मर्म बताना था, जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:31 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:30
वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ , शिलाधिस्त हो तृणालंबितलक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ। एक पाद का दृढ़ालंबन ना कल्पों हो सकता था , नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी होना हो सकता था। ना सुयोग था ऐसा अर्जुन जैसा मैं पुरुषार्थ रचाता, भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता। अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे लाता? मंत्रोच्चारित यज्ञ रचाकर मन चाहा वर को पाता? इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु की बाहों में, अस्त्र शस्त्र प्रचंड अति होते प्रकटित निगाहों में। निज बाहू गांडीव पार्थ धर सज्जित होकर आ जाता, निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता। भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं, धर्म राज और सहदेव से था कतिपय अनजान नहीं। एक रात्रि हीं पहर बची थी उसी पहर का रोना था , शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था। अगर रात्रि से पहले मैने महाकाल ना तुष्ट किया, वचन नहीं पूरा होने को समझो बस अवयुष्ट किया। महादेव को उस हीं पल में मन का मर्म बताना था, जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया, भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया। अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ, आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ। भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता, वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता। एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा, नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा। सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी, भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी। उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया? पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया? कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है। पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था, कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था। विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे, अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे। बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था, यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:27 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-29
कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया, भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया। अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ, आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ। भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता, वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता। एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा, नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा। सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी, भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी। उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया? पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया? कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है। पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था, कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था। विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे, अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे। बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था, यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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तीव्र वेग से वह्नि आती क्या तुम तनकर रहते हो? तो भूतेश से अश्वत्थामा क्यों ठनकर यूँ रहते हो? क्यों युक्ति ऐसे रचते जिससे अति दुष्कर होता ध्येय, तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय? जो विपक्ष को आन खड़े है तुम भैरव निज पक्ष करो। और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष करो। निष्प्रयोजन लड़कर इनसे लक्ष्य रुष्ट क्यों करते हो? विरुपाक्ष भोले शंकर भी तुष्ट नहीं क्यों करते हो? और विदित हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी, रूद्रपति का अंश है तुझमे तुम अनश्वर अविनाशी। ध्यान करो जो अशुतोष हैं हर्षित होते अति सत्वर, वो तेरे चित्त को उत्कंठित दान नहीं क्यों करते वर? जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं, वक्त पड़े तो झुक जाने में ना खोता स्वाभिमान कहीं। अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ, महादेव परितुष्ट करो और मनचाहा तुम वर पाओ। तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना , स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना। निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व बाहु अभिमान रहा, पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:22 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-28
तीव्र वेग से वह्नि आती क्या तुम तनकर रहते हो? तो भूतेश से अश्वत्थामा क्यों ठनकर यूँ रहते हो? क्यों युक्ति ऐसे रचते जिससे अति दुष्कर होता ध्येय, तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय? जो विपक्ष को आन खड़े है तुम भैरव निज पक्ष करो। और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष करो। निष्प्रयोजन लड़कर इनसे लक्ष्य रुष्ट क्यों करते हो? विरुपाक्ष भोले शंकर भी तुष्ट नहीं क्यों करते हो? और विदित हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी, रूद्रपति का अंश है तुझमे तुम अनश्वर अविनाशी। ध्यान करो जो अशुतोष हैं हर्षित होते अति सत्वर, वो तेरे चित्त को उत्कंठित दान नहीं क्यों करते वर? जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं, वक्त पड़े तो झुक जाने में ना खोता स्वाभिमान कहीं। अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ, महादेव परितुष्ट करो और मनचाहा तुम वर पाओ। तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना , स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना। निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व बाहु अभिमान रहा, पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार? मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ? जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है? एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है? जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं, गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं। इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं , कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं। अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं, विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं। दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है, स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है। जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे , उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे? जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की, उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी। पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है, साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है। व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है, द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है? लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है , अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है। सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में , किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:18 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-27
एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार? मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ? जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है? एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है? जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं, गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं। इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं , कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं। अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं, विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं। दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है, स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है। जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे , उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे? जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की, उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी। पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है, साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है। व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है, द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है? लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है , अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है। सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में , किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ? आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ, महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से, वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से? ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला, चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला। ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा, नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा। अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला, मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला। हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था , नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था? मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का, पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का। जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे? महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे? विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था, हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था। निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी , उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी। कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया , निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया। युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई , विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:10 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-26
शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ? आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ, महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से, वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से? ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला, चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला। ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा, नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा। अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला, मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला। हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था , नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था? मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का, पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का। जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे? महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे? विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था, हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था। निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी , उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी। कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया , निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया। युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई , विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर मुझको फिर क्या होता भय,  जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का उसकी हीं होती जय। ======== त्रास नहीं था मन मे  किंचित निज तन मन व प्राण का, पर चिंता एक सता रही पुरुषार्थ त्वरित अभियान का। ======== धर्माधर्म  की  बात नहीं न्यूनांश ना मुझको दिखता था, रिपु मुंड के अतिरिक्त ना ध्येय अक्षि में टिकता था। ======== ना सिंह भांति निश्चित हीं  किसी एक श्रृगाल की भाँति, घात लगा हम किये प्रतीक्षा रात्रिपहर व्याल की भाँति।   ======== कटु  सत्य है दिन में लड़कर ना इनको हर सकता था, भला एक हीं  अश्वत्थामा  युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था? ======== जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर निज अस्त्र उठाया मैंने , निहत्थों पर चुनचुन कर हीं घातक शस्त्र चलाया मैंने। ======== दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल कर्म रचा जो बतलाता हूँ ,  ना चित्त में अफ़सोस बचा ना रहा ताप ना पछताता हूँ।  ======== तन मन पे भारी रहा बोझ अब हल्का  हल्का लगता है, आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना आज ह्रदय में फलता है।   ======== जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे उनके  प्राण प्रहारक  हूँ ,  शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक   धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ। ========  जो पितृवध से दबा हुआ जीता था कल तक रुष्ट हुआ, गाजर मुली सादृश्य  काट आज अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ।  ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 30, 2022
Jan 30, 2022 at 2:46 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:33
कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर मुझको फिर क्या होता भय,  जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का उसकी हीं होती जय। ======== त्रास नहीं था मन मे  किंचित निज तन मन व प्राण का, पर चिंता एक सता रही पुरुषार्थ त्वरित अभियान का। ======== धर्माधर्म  की  बात नहीं न्यूनांश ना मुझको दिखता था, रिपु मुंड के अतिरिक्त ना ध्येय अक्षि में टिकता था। ======== ना सिंह भांति निश्चित हीं  किसी एक श्रृगाल की भाँति, घात लगा हम किये प्रतीक्षा रात्रिपहर व्याल की भाँति।   ======== कटु  सत्य है दिन में लड़कर ना इनको हर सकता था, भला एक हीं  अश्वत्थामा  युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था? ======== जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर निज अस्त्र उठाया मैंने , निहत्थों पर चुनचुन कर हीं घातक शस्त्र चलाया मैंने। ======== दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल कर्म रचा जो बतलाता हूँ ,  ना चित्त में अफ़सोस बचा ना रहा ताप ना पछताता हूँ।  ======== तन मन पे भारी रहा बोझ अब हल्का  हल्का लगता है, आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना आज ह्रदय में फलता है।   ======== जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे उनके  प्राण प्रहारक  हूँ ,  शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक   धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ। ========  जो पितृवध से दबा हुआ जीता था कल तक रुष्ट हुआ, गाजर मुली सादृश्य  काट आज अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ।  ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा। ======= या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। ======= याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । ======= कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। ======= वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ======= ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा काओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। ======= अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। ======== क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। ======== पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। ======== सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 22, 2022
Jan 22, 2022 at 11:24 PM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:32
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा। ======= या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। ======= याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । ======= कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। ======= वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ======= ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा काओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। ======= अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। ======== क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। ======== पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। ======== सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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क्या  यत्न  करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं  आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का  मार्ग  दिखाती  थी।    ======== अकिलेश्वर को हरना  दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था  मार्ग अति  दू:साध्य कहीं। ========= अतिशय साहस संबल  संचय  करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। ======== अति  वेदना  थी तन  में  निज  मस्तक  अग्नि  धरने  में , पर निज प्रण अपूर्णित करके  भी  क्या  रखा लड़ने  में? ======== जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में  कोई  क्या  सम्मान रखे? ======== या अहन्त्य  को हरना था या शिव के  हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? ========= हठ मेरा  वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन  को  जिद  मेरी थी  कैसी पर था  भान कहीं। ========= हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से  बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। ========= त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य  प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। ========= गणादिप का संबल पा  था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने  या उनसे  लड़ मरने  का। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 16, 2022
Jan 16, 2022 at 4:26 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-31
क्या  यत्न  करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं  आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का  मार्ग  दिखाती  थी।    ======== अकिलेश्वर को हरना  दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था  मार्ग अति  दू:साध्य कहीं। ========= अतिशय साहस संबल  संचय  करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। ======== अति  वेदना  थी तन  में  निज  मस्तक  अग्नि  धरने  में , पर निज प्रण अपूर्णित करके  भी  क्या  रखा लड़ने  में? ======== जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में  कोई  क्या  सम्मान रखे? ======== या अहन्त्य  को हरना था या शिव के  हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? ========= हठ मेरा  वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन  को  जिद  मेरी थी  कैसी पर था  भान कहीं। ========= हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से  बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। ========= त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य  प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। ========= गणादिप का संबल पा  था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने  या उनसे  लड़ मरने  का। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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रोज उठकर सबेरे पेट के जुगाड़ में,  क्या न क्या करता रहा है आदमी बाजार में। सच का दमन पकड़ के घर से निकलता है जो, झूठ की परिभाषाओं से गश खा जाता है वो। औरों की बातें है झूठी औरों की बातों में खोट, और मिलने पे सड़क पे छोड़े ना दस का भी नोट। तो डोलते हुए जगत में डोलता इंसान है, डिग रहा है आदमी कि डिग रहा ईमान हैं। झूठ के बाज़ार में हैं  खुद हीं ललचाए हुए, रूह में चाहत बड़ी है आग लहकाए हुए। तो तन बदन में आग लेके चल रहा है आदमी, आरजू की ख़ाक में भी जल रहा है आदमी। टूटती हैं हसरतें जब रुठतें जब ख्वाब हैं, आदमी में कुछ बचा जो  लुटती अज़ाब हैं। इन दिक्कतों मुसीबतों में आदमी बन चाख हैं, तिस पे ऐसी वैसी कैसी आदतें गुस्ताख़ है। उलझनों में खुद उलझती ऐसी वैसी आदतें, आदतों पे खुद हैं रोती कैसी कैसी आदतें। जाने कैसी आदतों से अक्सर हीं लाचार है, आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है। अजय अमिताभ सुमन
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Feb 12, 2021
Feb 12, 2021 at 11:38 PM UTC
आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है
रोज उठकर सबेरे पेट के जुगाड़ में,  क्या न क्या करता रहा है आदमी बाजार में। सच का दमन पकड़ के घर से निकलता है जो, झूठ की परिभाषाओं से गश खा जाता है वो। औरों की बातें है झूठी औरों की बातों में खोट, और मिलने पे सड़क पे छोड़े ना दस का भी नोट। तो डोलते हुए जगत में डोलता इंसान है, डिग रहा है आदमी कि डिग रहा ईमान हैं। झूठ के बाज़ार में हैं  खुद हीं ललचाए हुए, रूह में चाहत बड़ी है आग लहकाए हुए। तो तन बदन में आग लेके चल रहा है आदमी, आरजू की ख़ाक में भी जल रहा है आदमी। टूटती हैं हसरतें जब रुठतें जब ख्वाब हैं, आदमी में कुछ बचा जो  लुटती अज़ाब हैं। इन दिक्कतों मुसीबतों में आदमी बन चाख हैं, तिस पे ऐसी वैसी कैसी आदतें गुस्ताख़ है। उलझनों में खुद उलझती ऐसी वैसी आदतें, आदतों पे खुद हैं रोती कैसी कैसी आदतें। जाने कैसी आदतों से अक्सर हीं लाचार है, आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है। अजय अमिताभ सुमन
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इस सृष्टि में हर व्यक्ति को, आजादी अभिव्यक्ति की, व्यक्ति का निजस्वार्थ फलित हो,नही चाह ये सृष्टि की। जिस नदिया की नौका जाके,नदिया के हीं धार बहे , उस नौका को किधर फ़िक्र कि,कोई ना पतवार रहे? लहरों से लड़ने भिड़ने में , उस नौका का सम्मान नहीं, विजय मार्ग के टल जाने से, मंजिल का अवसान नहीं। जिन्हें चाह है इस जीवन में,स्वर्णिम भोर उजाले  की, उन  राहों पे स्वागत करते,घटा टोप अन्धियारे भी। इन घटाटोप अंधियारों का,संज्ञान अति आवश्यक है, गर तम से मन में घन व्याप्त हो,सारे श्रम निरर्थक है। आड़ी तिरछी सी गलियों में, लुकछिप रहना त्राण नहीं, भय के मन में फल जाने से ,भला लुप्त निज ज्ञान कहीं? इस जीवन में आये हो तो,अरिदल के भी वाण चलेंगे, जिह्वा से अग्नि  की वर्षा , वाणि  से अपमान फलेंगे। आंखों में चिंगारी तो क्या, मन मे उनके विष गरल हो, उनके जैसा ना बन जाना,भाव जगे वो देख सरल हो। वक्त पड़े तो झुक  जाने में, खोता  क्या सम्मान कहीं? निज-ह्रदय प्रेम से रहे आप्त,इससे बेहतर उत्थान नहीं। अजय अमिताभ सुमन
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Jan 30, 2021
Jan 30, 2021 at 5:14 AM UTC
मंजिल का अवसान नहीं
इस सृष्टि में हर व्यक्ति को, आजादी अभिव्यक्ति की, व्यक्ति का निजस्वार्थ फलित हो,नही चाह ये सृष्टि की। जिस नदिया की नौका जाके,नदिया के हीं धार बहे , उस नौका को किधर फ़िक्र कि,कोई ना पतवार रहे? लहरों से लड़ने भिड़ने में , उस नौका का सम्मान नहीं, विजय मार्ग के टल जाने से, मंजिल का अवसान नहीं। जिन्हें चाह है इस जीवन में,स्वर्णिम भोर उजाले  की, उन  राहों पे स्वागत करते,घटा टोप अन्धियारे भी। इन घटाटोप अंधियारों का,संज्ञान अति आवश्यक है, गर तम से मन में घन व्याप्त हो,सारे श्रम निरर्थक है। आड़ी तिरछी सी गलियों में, लुकछिप रहना त्राण नहीं, भय के मन में फल जाने से ,भला लुप्त निज ज्ञान कहीं? इस जीवन में आये हो तो,अरिदल के भी वाण चलेंगे, जिह्वा से अग्नि  की वर्षा , वाणि  से अपमान फलेंगे। आंखों में चिंगारी तो क्या, मन मे उनके विष गरल हो, उनके जैसा ना बन जाना,भाव जगे वो देख सरल हो। वक्त पड़े तो झुक  जाने में, खोता  क्या सम्मान कहीं? निज-ह्रदय प्रेम से रहे आप्त,इससे बेहतर उत्थान नहीं। अजय अमिताभ सुमन
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जीवन  के   मधु प्यास  हमारे, छिपे किधर  प्रभु  पास हमारे? सब कहते तुम व्याप्त मही हो, पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो? नाना शोध करता रहता  हूँ, फिर भी  विस्मय  में रहता हूँ, इस जीवन को तुम धरते हो, इस सृष्टि  को  तुम रचते हो। कहते कण कण में बसते हो, फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ? सक्त हुआ मन निरासक्त पे, अभिव्यक्ति  तो हो भक्त पे । मन के प्यास के कारण तुम हो, क्यों अज्ञात अकारण तुम हो? न  तन  मन में त्रास बढाओ, मेघ तुम्हीं हो प्यास बुझाओ। इस चित्त के विश्वास  हमारे, दूर   बड़े   हो   पास  हमारे। जीवन   के  मधु  प्यास मारे, किधर छिपे प्रभु पास हमारे? अजय अमिताभ सुमन
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Dec 26, 2020
Dec 26, 2020 at 1:44 AM UTC
अभिलाष
गेहूँ       के   दाने    क्या   होते, हल   हलधर  के परिचय देते, देते    परिचय  रक्त   बहा  है , क्या हलधर का वक्त रहा है। मौसम   कितना  सख्त रहा है , और हलधर कब पस्त रहा है, स्वेदों के  कितने मोती बिखरे, धार    कुदालों   के  हैं निखरे। खेतों    ने  कई   वार  सहें  हैं, छप्पड़  कितनी  बार ढ़हें  हैं, धुंध   थपेड़ों   से   लड़   जाते , ढ़ह ढ़ह कर पर ये गढ़ जाते। हार   नहीं   जीवन  से  माने , रार   यहीं   मरण   से   ठाने, नहीं अपेक्षण भिक्षण का है, हर डग पग पे रण हीं माँगे। हलधर  दाने   सब  लड़ते हैं, मौसम  पे  डटकर अढ़ते हैं, जीर्ण  देह दाने भी क्षीण पर, मिट्टी   में   जीवन   गढ़तें हैं। बिखर  धरा पर जब उग  जाते , दाने     दुःख    सारे     हर जाते, जब    दानों    से   उगते   मोती, हलधर   के  सीने   की ज्योति। शुष्क होठ की प्यास  बुझाते , हलधर    में    विश्वास  जगाते, मरु   भूमि   के  तरुवर  जैसे, गेहूँ       के     दाने    हैं   होते। अजय अमिताभ सुमन
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Dec 21, 2020
Dec 21, 2020 at 7:41 PM UTC
गेहूँ के दाने
गेहूँ       के   दाने    क्या   होते, हल   हलधर  के परिचय देते, देते    परिचय  रक्त   बहा  है , क्या हलधर का वक्त रहा है। मौसम   कितना  सख्त रहा है , और हलधर कब पस्त रहा है, स्वेदों के  कितने मोती बिखरे, धार    कुदालों   के  हैं निखरे। खेतों    ने  कई   वार  सहें  हैं, छप्पड़  कितनी  बार ढ़हें  हैं, धुंध   थपेड़ों   से   लड़   जाते , ढ़ह ढ़ह कर पर ये गढ़ जाते। हार   नहीं   जीवन  से  माने , रार   यहीं   मरण   से   ठाने, नहीं अपेक्षण भिक्षण का है, हर डग पग पे रण हीं माँगे। हलधर  दाने   सब  लड़ते हैं, मौसम  पे  डटकर अढ़ते हैं, जीर्ण  देह दाने भी क्षीण पर, मिट्टी   में   जीवन   गढ़तें हैं। बिखर  धरा पर जब उग  जाते , दाने     दुःख    सारे     हर जाते, जब    दानों    से   उगते   मोती, हलधर   के  सीने   की ज्योति। शुष्क होठ की प्यास  बुझाते , हलधर    में    विश्वास  जगाते, मरु   भूमि   के  तरुवर  जैसे, गेहूँ       के     दाने    हैं   होते। अजय अमिताभ सुमन
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In their eyes she, is the holy river and I, am a doubtful sinner. I drowned myself deep in Ganges. Now she, is a holier-than-thou and I, am a confessed sinner.
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Sep 29, 2020
Sep 29, 2020 at 7:52 AM UTC
Crows of Banaras
ye wakt chalta gaya.. zamaana badalta gaya.. tarakki mein insaan ghulta gaya... ghulte ghulte wo ye bhool sa gaya.. chod jaega ye jahan k din.. par iski mohobbat mein badalta gaya ~tazheen like if u like
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Sep 17, 2020
Sep 17, 2020 at 10:53 PM UTC
Badalta gaya!!
रे मेरे अनुरागी चित्त मन, सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण। क्या है तेरी काम पिपासा, थोड़ा सा कर ले तू मंथन। कर मंथन चंचल हर क्षण में, अहम भाव क्यों है कण कण में, क्यों पीड़ा मन निज चित वन में, तुष्ट नहीं फिर भी जीवन में। सुन पीड़ा का कारण है भय, इसीलिए करते नित संचय , निज पूजन परपीड़न अतिशय, फिर भी क्या होते निःसंशय? तो फिर मन तू स्वप्न सजा के, भांति भांति के कर्म रचा के। नाम प्राप्त हेतु करते जो, निज बंधन वर निज छलते हो। ये जो कति पय बनते  बंधन , निज बंधन बंध करते क्रंदन। अहम भाव आज्ञान है मानो, बंधन का परिणाम है जानो। मृग तृष्णा सी नाम पिपासा, वृथा प्यास की रखते आशा। जग से ना अनुराग रचाओ , अहम त्यज्य वैराग सजाओ। अभिमान जगे ना मंडित करना, अज्ञान फले तो दंडित करना। मृग तृष्णा की मात्र दवा है, मन से मन को खंडित करना। जो गुजर गया सो गुजर गया, ना आने वाले कल का चिंतन। रे मेरे अनुरागी चित्त मन, सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण।
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Sep 13, 2020
Sep 13, 2020 at 11:14 PM UTC
रे मेरे अनुरागी चित्तमन
रे मेरे अनुरागी चित्त मन, सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण। क्या है तेरी काम पिपासा, थोड़ा सा कर ले तू मंथन। कर मंथन चंचल हर क्षण में, अहम भाव क्यों है कण कण में, क्यों पीड़ा मन निज चित वन में, तुष्ट नहीं फिर भी जीवन में। सुन पीड़ा का कारण है भय, इसीलिए करते नित संचय , निज पूजन परपीड़न अतिशय, फिर भी क्या होते निःसंशय? तो फिर मन तू स्वप्न सजा के, भांति भांति के कर्म रचा के। नाम प्राप्त हेतु करते जो, निज बंधन वर निज छलते हो। ये जो कति पय बनते  बंधन , निज बंधन बंध करते क्रंदन। अहम भाव आज्ञान है मानो, बंधन का परिणाम है जानो। मृग तृष्णा सी नाम पिपासा, वृथा प्यास की रखते आशा। जग से ना अनुराग रचाओ , अहम त्यज्य वैराग सजाओ। अभिमान जगे ना मंडित करना, अज्ञान फले तो दंडित करना। मृग तृष्णा की मात्र दवा है, मन से मन को खंडित करना। जो गुजर गया सो गुजर गया, ना आने वाले कल का चिंतन। रे मेरे अनुरागी चित्त मन, सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण।
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आज़ादी तोह हमें मिल गयी है अंग्रेज़ो से, अब अपनो से बगावत का वक़्त आ चला हैं, मुख पे झूठी हँसी और आँसू पीके घटकने का आज अंतिम क्षण आ गया हैं, चोटें बोहत हैं शरीर पे, पर दिल पे लगी इस चोट पे मल्हम लगाने का समय अब आया हैं, चूँ ना निकलती मेरे मुँह से, पर अब अपने लिए खड़े होने और इंसाफ की लड़ाई लड़ने का युग आगया हैं, चूड़ियों में बंधी बेड़ियो को तोड़ने का ऐतिहासिक कल अब शुरू हो चुका हैं ।।
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Aug 16, 2020
Aug 16, 2020 at 5:03 PM UTC
आज़ादी
क्षणभर विश्रांती चा विचार केला की आठवणींची चाहुल मात्र लुडबुड करायाला लागते जनू खुप काळ निघुन गेला पण आठवण मात्र तशीच राहते, दडलेल एक पखरू मनातलं तसच मनात वावरत आहे आठवणींचे क्षण मात्र उमलू लागले आहेत आणी भेटण्यासाठी अततुरतेने वाट पाहत आहेत कळत नाही कसे सांगावे मनाला त्या क्षणभर विश्रांतीला आराम तरी कासा द्यावा क्षण असा यावा की नुक्ताच भेटुन खुप आनंद वाटावा, त्याचा हसरा चेहरा बघूनी मन आनंदाने फुलावे नजरेचा प्रत्येक तो अनमोल क्षण सरळ चेहरावर हस्य बनुन यावे यावे हे क्षण लवकरच ज्याने तुला पाहुनी मनाची आसना उमलावी क्षणातच
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Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:38 PM UTC
आठवणीतले क्षण
मन माझे अतूर झाले बोल तुझे ऐकण्यासाठी, का शरीर थकुनही मन मात्र थके ना ... रुंणगुणनारे गीत तुझे एकूनी रोज मी उठते, स्पर्श तुझा घेता मनी ते माझ्या रुजुनी जाते ... ये ना सख्या लवकर बघ मी आले, तोच किनारा तोच समुद्र जणू आपलीच वाट पाहत आहे ... दाटून आले क्षण असे फक्त तुझे नी माझे, सांगते मला हरवुनी जावे तुझ्यात कोवळे हे मन माझे ...
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Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:37 PM UTC
मन
सूर तूझे जुळले असे   मनी माझ्या रमले असे ताल तू घेता स्वर हि आले धावून आवाजाने तुझ्या मीच गेल गुंगून
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Aug 12, 2020
Aug 12, 2020 at 12:26 PM UTC
सूर
Tere kadam kya padhe dwar pe, Tanhai ne toh hume bewafaa karaar kar diya..
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Aug 7, 2020
Aug 7, 2020 at 3:23 AM UTC
Tanhaii