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Jab main padh raha tha Fluid mechanics ke jatil sutra Aur baandhon ke banane ke siddhant To tabhi meri kalpana mein aaya Baandh banne ke baad ka Vishaal jalashay Jalashay mein doobi bhoomi Aur bhoomi ke visthapit baashinde Main padh raha tha Earth fill dam Banane ke siddhant Aur mujhe dhyan aaya Tehri Aur uska wo antim din Jab uske log Dho rahe the apna saamaan Aur dekh rahe the Aakhiri baar apne gharon ko Jo thin unke pitaon ki Unko saumpi gayi Aakhiri zaagiren Jis din maine Seekhi nikalni Baandh ki center of gravity Us raat mere sapne mein aaye Tehri ke Wo doobe hue gaon Jo the baandh ki Center of gravity par Agle din Maine adhyapak se poochha Jinhone gadhe dam banane ke siddhant Kya unhone gadhe hai Visthapiton ke Dukh kam karne ke siddhant Unhone yah kehkar Ki visthapit nahin hain Hamare syllabus ka hissa Chup kara diya mujhe Waise hi Jaise itihas mein bane Tamaam baandhon ke visthapiton Ko kar diya gaya tha chup
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Apr 20
Apr 20, 2026 at 1:02 PM UTC
Baandh
रणपथ से जब लौटूँ मैं, तो दीये नये जलने चाहिए। जब आऊँ मैं शव बनकर, फिर भी दीप नही बुझने चाहिए। मृत्यु चाहे हर ले मेरे प्राण, तब भी शत्रु के गले घुटने चाहिए। चाहे यम ही क्यों न ले जाए, उम्मीदों के दीपक नही बुझने चाहिए। चाहे रक्त मेरा बहे, मेरे शत्रु तड़पके मरने चाहिए। श्वास मेरी हो अन्तिम चाहे, नरक का भय उनके हृदय में चाहिए।
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Nov 14, 2025
Nov 14, 2025 at 7:18 AM UTC
रणकर्कश
Kisi ko tutate dekha Akele mai Rona sikha 🥹 Kisi ko bhikarte huve dekha  Isi beech hamne umeed chhodna sikha  🥺 Hame to ful pasand  tha par 🌷 Murshad hamne bhi katon par chalna sikha 🥀.
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Apr 3, 2025
Apr 3, 2025 at 12:01 PM UTC
Umeed ka Zakhm
Kabhi kisi chehre ki muskan ka karan ban jao,   Jaise chaand ki roshni se raat roshan ** jai.   Is pal ka haqdar nasib, kabhi humara hota hai,   Jab khud se zyada, kisi ki khushi ka khayal rakhte hain.
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Jan 2, 2025
Jan 2, 2025 at 3:48 PM UTC
Untitled
Aaj phir es kadar ishq m, Apni haade bhul gayi, Tu aya meri Zindagi me, M khud ko jaan na hi bhul gayi. Tere khayalo m , Khud ko dekhna meri ek khawish ban gayi, Teri gaaliyo me, Khud ko kuch es kadar bhul gayi.
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Aug 29, 2020
Aug 29, 2020 at 3:48 AM UTC
Bhul gayi
मेरे पास छोड़ जाओ, अपनी खुशबू, अपनी बाते। उन्हें सम्भाल कर रखूंगी मैं, चाहे दिन हो या हो रातें।
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Aug 21, 2020
Aug 21, 2020 at 3:07 AM UTC
मेरे पास
Aaj azadi ka din h, Karo apni soch ko bhi aazad, Agar beet jaye ye din bhi, To raho apni nayi soch ke saath.
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Aug 15, 2020
Aug 15, 2020 at 2:11 AM UTC
Aazad karo
Tere har jazbaato ki kadar h, Intezaar me bitaani ye umaar h, Teri awaaz sun ne ko beete ye pal h, Har gham aur Khushi ki muje khabar h. Par ye waqt mera nahi, Jin yaado ko tum, Mere saath saza na sako, Sayad me es kabil nahi..
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Jun 24, 2020
Jun 24, 2020 at 9:58 AM UTC
Kabil nahi
Nazdeekiyo se mohbaat hua nahi karti, Khamosh rhene se dilo ki dooriya mita nahi karti, Tere saath gujra har pal yaad ane laga, Jab bhi khoshish ki bhulane ki , Doori chhat ki saza ban gayi, Uski yaad to jeene ki wjha ban gayi.
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Jun 24, 2020
Jun 24, 2020 at 11:58 AM UTC
Bhulane ki chhat
Bewajha Kisi raha pe , Ghum ** jau me to, Fr dhund ne Bhi mat ana.. Agar yaad aye mere alfazo ki, Meri Kavita ki khushboo Apne saath samjhna, Na ** ke bhi muskura dungi, Es bheegi raat me , Zindagi ki Kahani se vakhif kara dungi. Dhub te pao jab khudko, Khud se ek sawal karna, Aur bhul ke vo baat, Aaage zindagi ke aur badalo se mulakat karna.
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Jul 18, 2020
Jul 18, 2020 at 2:08 AM UTC
Zindagi
Tumahri khubi bhi kitni alag h na , Jab bhi tumare baare m likhne jati hu, To ye alfaz kam padh jate h. Aur jab tumare saath hoti hu , To ye waqt kam padh jata h..
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Aug 11, 2020
Aug 11, 2020 at 1:43 AM UTC
Kam pad jata h
Subha se sham ** gyi, Par tum na aye. Tumhari yaad aa gyi, Par tum na aye. Na aye tum, Aag ki lau bujhne tak. Meri saanas tham gyi, Par tum na aye.
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Jun 22, 2020
Jun 22, 2020 at 4:36 AM UTC
Tum na aye
Kuch kam hi sahi, Par is zindgi ne kuch diya to hai. Kitne hi gehre the ghaw, Par zindgi ne unhe siya to hai. Beshak the wo dard bhare fasane, Par is zindgi se humne kuch na kuch liya to hai. Pal pal jod kar hi sahi, Par is zindgi ko humne jiya to h.
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Jun 13, 2020
Jun 13, 2020 at 5:01 PM UTC
Zindgi
Ye raste jane hume kis or le jate hai, Zara sa apnate hai kabhi, To kabhi begane lagne lag jate h. Ye tedhe-medhe ulte-sidhe raste, Kis gali kis nukad par mud jate hai, Jaha bhi ye mud jate hai wahi se naye mod ban jate hai. Har mod har dagar par ye naye kisse nayi kahaaniyan sunate hai, Kabhi haste hai hume to kabhi hume rulate hai, Kabhi kisi ki zindgi ki shuruat to kabhi kisi ke kahaani ka ant ban jate hai. Yehi to hai jo hume zindgi ke har naye-purane pahlu se rubaru karwate hai, Jo ye girate hai to uth kar fir chalne ka sabab bi to hume yehi samjhate hai, Ye raste hi to hai jo musafiro ko unki manzil ki or le jate hai. Jo kabhi hote hai naraz to paas bhi ye khud hi bulate hai, Apno ki ehmiyat kya hai is zindgi me yehi to hume btate hai, Hai apnate kisko kabhi to kabhi kisiko bhul bhi ye jate hai. Zindgi hai chalte rahne ka naam ye raste hi to hume yaad dilate hai, Har pal har ghari kuch naya hume sikhate hai, Jo milate hai kisise kabhi to kabhi kisiko dur bhi to yehi le jate hai. Or agar gaur se dekha aur socha jaye to, Zindgi ke mayine aur is hasin falsafe ka ehsaas  waqt be waqt aksar ye raste hi hume karwate hai.
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Jun 12, 2020
Jun 12, 2020 at 2:38 PM UTC
Ye Raste
घूमने फिरने के जमाने मे एक ठहराव ढूँढ रही हूँ महलों की ख्वाहिश नहीं है मुझे जहाँ तू साथ हो ऐसा घर ढूंढ रही हूँ सिर्फ तुझसे चीज़े लेने की चाह नहीं कुछ तुझे देने की खुशी ढूँढ रही हूँ साथ खुश हो मेरे तू हर पल मैं तो एक ऐसा कल ढूँढ रही हूँ सबूत नहीं मेरे प्यार का मेरे पास जो तुझको मैं जवाब दे सकूँ पर तु समझे मेरे प्यार को एक बार मैं एक ऐसा पल ढूँढ रही हूँ महलो की ख़्वाहिश नहि है मुझे जहाँ तू साथ हो मैं तो ऐसा घर ढूँढ रही हूँ
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Dec 2, 2019
Dec 2, 2019 at 2:34 PM UTC
घर ढूँढ रही हूँ
जाके कोई क्या पुछे भी, आदमियत के रास्ते। क्या पता किन किन हालातों, से गुजरता आदमी। चुने किसको हसरतों , जरूरतों के दरमियाँ। एक को कसता है तो, दुजे से पिसता आदमी। जोर नहीं चल रहा है, आदतों पे आदमी का। बाँधने की घोर कोशिश और उलझता आदमी। गलतियाँ करना है फितरत, कर रहा है आदतन । और सबक ये सीखना कि, दुहराता है आदमी। वक्त को मुठ्ठी में कसकर, चल रहा था वो यकीनन, पर न जाने रेत थी वो, और फिसलता आदमी। मानता है ख्वाब दुनिया, जानता है ख्वाब दुनिया। और अधूरी ख्वाहिशों का, ख्वाब रखता आदमी। आया हीं क्यों जहान में, इस बात की खबर नहीं, इल्ज़ाम तो संगीन है, और बिखरता आदमी। "अमिताभ"इसकी हसरतों का, क्या बताऊं दास्ताँ। आग में जल खाक बनकर, राख रखता आदमी।
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Jun 24, 2019
Jun 24, 2019 at 3:21 AM UTC
राख़
जाके कोई क्या पुछे भी, आदमियत के रास्ते। क्या पता किन किन हालातों, से गुजरता आदमी। चुने किसको हसरतों , जरूरतों के दरमियाँ। एक को कसता है तो, दुजे से पिसता आदमी। जोर नहीं चल रहा है, आदतों पे आदमी का। बाँधने की घोर कोशिश और उलझता आदमी। गलतियाँ करना है फितरत, कर रहा है आदतन । और सबक ये सीखना कि, दुहराता है आदमी। वक्त को मुठ्ठी में कसकर, चल रहा था वो यकीनन, पर न जाने रेत थी वो, और फिसलता आदमी। मानता है ख्वाब दुनिया, जानता है ख्वाब दुनिया। और अधूरी ख्वाहिशों का, ख्वाब रखता आदमी। आया हीं क्यों जहान में, इस बात की खबर नहीं, इल्ज़ाम तो संगीन है, और बिखरता आदमी। "अमिताभ"इसकी हसरतों का, क्या बताऊं दास्ताँ। आग में जल खाक बनकर, राख रखता आदमी।
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कवि यूँ हीं नहीं विहँसता है, है ज्ञात तू सबमें बसता है, चरणों में शीश झुकाऊँ मैं, और क्षमा तुझी से चाहूँ मैं। दुविधा पर मन में आती है, मुझको विचलित कर जाती है , यदि परमेश्वर सबमें होते, तो कुछ नर क्यूँ ऐसे होते? जिन्हें स्वार्थ साधने आता है, कोई कार्य न दूजा भाता है, न औरों का सम्मान करें , कमजोरों का अपमान करें। उल्लू नजरें है जिनकी औ, गीदड़ के जैसा है आचार, छली प्रपंची लोमड़ जैसे, बगुले जैसा इनका प्यार। कौए सी है इनकी वाणी, करनी है खुद की मनमानी, डर जाते चंडाल कुटिल भी , मांगे शकुनी इनसे पानी। संचित करते रहते ये धन, होते मन के फिर भी निर्धन, तन रुग्ण है संगी साथी , पर परपीड़ा के अभिलाषी। जोर किसी पे ना चलता, निज-स्वार्थ निष्फलित है होता, कुक्कुर सम दुम हिलाते हैं, गिरगिट जैसे हो जाते हैं। कद में तो छोटे होते हैं , पर साये पे हीं होते है, अंतस्तल में जलते रहते, प्रलयानिल रखकर सोते हैं। गर्दभ जैसे अज्ञानी है, हाँ महामुर्ख अभिमानी हैं। पर होता मुझको विस्मय, करते रहते नित दिन अभिनय। प्रभु कहने से ये डरता हूँ, तुझको अपमानित करता हूँ , इनके भीतर तू हीं रहता, फिर जोर तेरा क्यूँ ना चलता? क्या गुढ़ गहन कोई थाती ये? ईश्वर की नई प्रजाति ये? जिनको न प्रीत न मन भाये, डर की भाषा हीं पतियाये। अति वैभव के हैं जो भिक्षुक, परमार्थ फलित ना हो ईक्छुक, जब भी बोले कर्कश वाणी, तम अंतर्मन है मुख दुर्मुख। कहते प्रभु जब वर देते हैं , तब जाके हम नर होते हैं, पर है अभिशाप नहीं ये वर, इनको कैसे सोचुं ईश्वर? ये बात समझ ना आती है, किंचित विस्मित कर जाती है, क्यों कुछ नर ऐसे होते हैं, प्रभु क्यों नर ऐसे होते हैं? अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jun 15, 2019
Jun 15, 2019 at 2:45 AM UTC
क्यों नर ऐसे होते हैं ?
कवि यूँ हीं नहीं विहँसता है, है ज्ञात तू सबमें बसता है, चरणों में शीश झुकाऊँ मैं, और क्षमा तुझी से चाहूँ मैं। दुविधा पर मन में आती है, मुझको विचलित कर जाती है , यदि परमेश्वर सबमें होते, तो कुछ नर क्यूँ ऐसे होते? जिन्हें स्वार्थ साधने आता है, कोई कार्य न दूजा भाता है, न औरों का सम्मान करें , कमजोरों का अपमान करें। उल्लू नजरें है जिनकी औ, गीदड़ के जैसा है आचार, छली प्रपंची लोमड़ जैसे, बगुले जैसा इनका प्यार। कौए सी है इनकी वाणी, करनी है खुद की मनमानी, डर जाते चंडाल कुटिल भी , मांगे शकुनी इनसे पानी। संचित करते रहते ये धन, होते मन के फिर भी निर्धन, तन रुग्ण है संगी साथी , पर परपीड़ा के अभिलाषी। जोर किसी पे ना चलता, निज-स्वार्थ निष्फलित है होता, कुक्कुर सम दुम हिलाते हैं, गिरगिट जैसे हो जाते हैं। कद में तो छोटे होते हैं , पर साये पे हीं होते है, अंतस्तल में जलते रहते, प्रलयानिल रखकर सोते हैं। गर्दभ जैसे अज्ञानी है, हाँ महामुर्ख अभिमानी हैं। पर होता मुझको विस्मय, करते रहते नित दिन अभिनय। प्रभु कहने से ये डरता हूँ, तुझको अपमानित करता हूँ , इनके भीतर तू हीं रहता, फिर जोर तेरा क्यूँ ना चलता? क्या गुढ़ गहन कोई थाती ये? ईश्वर की नई प्रजाति ये? जिनको न प्रीत न मन भाये, डर की भाषा हीं पतियाये। अति वैभव के हैं जो भिक्षुक, परमार्थ फलित ना हो ईक्छुक, जब भी बोले कर्कश वाणी, तम अंतर्मन है मुख दुर्मुख। कहते प्रभु जब वर देते हैं , तब जाके हम नर होते हैं, पर है अभिशाप नहीं ये वर, इनको कैसे सोचुं ईश्वर? ये बात समझ ना आती है, किंचित विस्मित कर जाती है, क्यों कुछ नर ऐसे होते हैं, प्रभु क्यों नर ऐसे होते हैं? अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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कह रहे हो तुम ये , मैं भी करूँ ईशारा, सारे जहां से अच्छा , हिन्दुस्तां हमारा। ये ठीक भी बहुत है, एथलिट सारे जागे , क्रिकेट में जीतते हैं, हर गेम में है आगे। अंतरिक्ष में उपग्रह प्रति मान फल रहें है, अरिदल पे नित दिन हीं वाण चल रहें हैं, विद्यालयों में बच्चे मिड मील भी पा रहें है, साइकिल भी मिलती है सब गुनगुना रहे हैं। हाँ ठीक कह रहे हो, कि फौजें हमारी, बेशक जीतती हैं, हैं दुश्मनों पे भारी। अब नेट मिल रहा है, बड़ा सस्ता बाजार में, फ्री है वाई-फाई , फ्री-सिम भी व्यवहार में। पर होने से नेट भी गरीबी मिटती कहीं? बीमारों से समाने फ्री सिम टिकती नहीं। खेत में सूखा है और तेज बहुत धूप है, गाँव में मुसीबत अभी, रोटी है , भूख है। सरकारी हॉस्पिटलों में, दौड़ के हीं ऐसे, आधे तो मर रहें हैं, इनको बचाए कैसे? बढ़ रही है कीमत और बढ़ रहे बीमार हैं, बीमार करें छुट्टी तो कट रही पगार हैं। राशन हुआ है महंगा, कंट्रोल घट रहा है, बिजली हुई न सस्ती, पेट्रोल चढ़ रहा है। ट्यूशन फी है हाई, उसको चुकाए कैसे? इतनी सी नौकरी में, रहिमन पढ़ाए कैसे? दहेज़ के अगन में , महिलाएं मिट रही है , बाज़ार में सजी हैं , अबलाएँ बिक रहीं हैं। क्या यही लिखा है , मेरे देश के करम में, सिसकती रहे बेटी , शैतानों के हरम में ? मैं वो ही तो चाहूँ , तेरे दिल ने जो पुकारा, सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दुस्तां हमारा। पर अभी भी बेटी का बाप है बेचारा , कैसे कहूँ है बेहतर , है देश ये हमारा? अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jun 12, 2019
Jun 12, 2019 at 1:47 AM UTC
कैसे कहूँ है बेहतर , ये हिंदुस्तान हमारा
कह रहे हो तुम ये , मैं भी करूँ ईशारा, सारे जहां से अच्छा , हिन्दुस्तां हमारा। ये ठीक भी बहुत है, एथलिट सारे जागे , क्रिकेट में जीतते हैं, हर गेम में है आगे। अंतरिक्ष में उपग्रह प्रति मान फल रहें है, अरिदल पे नित दिन हीं वाण चल रहें हैं, विद्यालयों में बच्चे मिड मील भी पा रहें है, साइकिल भी मिलती है सब गुनगुना रहे हैं। हाँ ठीक कह रहे हो, कि फौजें हमारी, बेशक जीतती हैं, हैं दुश्मनों पे भारी। अब नेट मिल रहा है, बड़ा सस्ता बाजार में, फ्री है वाई-फाई , फ्री-सिम भी व्यवहार में। पर होने से नेट भी गरीबी मिटती कहीं? बीमारों से समाने फ्री सिम टिकती नहीं। खेत में सूखा है और तेज बहुत धूप है, गाँव में मुसीबत अभी, रोटी है , भूख है। सरकारी हॉस्पिटलों में, दौड़ के हीं ऐसे, आधे तो मर रहें हैं, इनको बचाए कैसे? बढ़ रही है कीमत और बढ़ रहे बीमार हैं, बीमार करें छुट्टी तो कट रही पगार हैं। राशन हुआ है महंगा, कंट्रोल घट रहा है, बिजली हुई न सस्ती, पेट्रोल चढ़ रहा है। ट्यूशन फी है हाई, उसको चुकाए कैसे? इतनी सी नौकरी में, रहिमन पढ़ाए कैसे? दहेज़ के अगन में , महिलाएं मिट रही है , बाज़ार में सजी हैं , अबलाएँ बिक रहीं हैं। क्या यही लिखा है , मेरे देश के करम में, सिसकती रहे बेटी , शैतानों के हरम में ? मैं वो ही तो चाहूँ , तेरे दिल ने जो पुकारा, सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दुस्तां हमारा। पर अभी भी बेटी का बाप है बेचारा , कैसे कहूँ है बेहतर , है देश ये हमारा? अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम, खुद हीं अब खुद के, सहारे बनो तुम। किनारों पे चलना है , आसां बहुत पर, गिर के सम्भलना है, आसां बहुत पर, डूबे हो दरिया जो, मुश्किल हो बचना, तो खुद हीं बाहों के, सहारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम। जो चंदा बनोगे तो, तारे भी होंगे, औरों से चमकोगे, सितारें भी होंगे, सूरज सा दिन का जो, राजा बन चाहो, तो दिनकर के जैसे, अंगारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। दिवस के राही, रातों का क्या करना, दिन के उजाले में, तुमको है चढ़ना, सूरजमुखी जैसी, ख़्वाहिश जो तेरी ऊल्लू सदृष ना, अन्धियारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। अभिनय से कुछ भी, ना हासिल है होता, अनुनय से भी कोई, काबिल क्या होता? अरिदल को संधि में, शक्ति तब दिखती, जब संबल हाथों के, तीक्ष्ण धारें बनों तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। विपदा हो कैसी भी, वो नर ना हारा, जिसका निज बाहू हो, किंचित सहारा । श्रम से हीं तो आखिर, दुर्दिन भी हारा, जो आलस को काटे, तलवारें बनो तुम । मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम। खुद हीं अब खुद के, सहारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jun 10, 2019
Jun 10, 2019 at 6:41 AM UTC
खुद के सहारे बनो तुम
मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम, खुद हीं अब खुद के, सहारे बनो तुम। किनारों पे चलना है , आसां बहुत पर, गिर के सम्भलना है, आसां बहुत पर, डूबे हो दरिया जो, मुश्किल हो बचना, तो खुद हीं बाहों के, सहारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम। जो चंदा बनोगे तो, तारे भी होंगे, औरों से चमकोगे, सितारें भी होंगे, सूरज सा दिन का जो, राजा बन चाहो, तो दिनकर के जैसे, अंगारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। दिवस के राही, रातों का क्या करना, दिन के उजाले में, तुमको है चढ़ना, सूरजमुखी जैसी, ख़्वाहिश जो तेरी ऊल्लू सदृष ना, अन्धियारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। अभिनय से कुछ भी, ना हासिल है होता, अनुनय से भी कोई, काबिल क्या होता? अरिदल को संधि में, शक्ति तब दिखती, जब संबल हाथों के, तीक्ष्ण धारें बनों तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। विपदा हो कैसी भी, वो नर ना हारा, जिसका निज बाहू हो, किंचित सहारा । श्रम से हीं तो आखिर, दुर्दिन भी हारा, जो आलस को काटे, तलवारें बनो तुम । मौजो से भिड़े हो , पतवारें बनो तुम। खुद हीं अब खुद के, सहारे बनो तुम, मौजो से भिड़े हो, पतवारें बनो तुम। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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फिल्म वास्ते एक दिन मैंने, किया जो टेलीफोन। बजने घंटी ट्रिंग ट्रिंग औ, पूछा है भई कौन ? पूछा है भई कौन कि, तीन सीट क्या खाली है? मैं हूँ ये मेरी बीबी है और, साथ में मेरे साली है । उसने कहा सिर्फ तीन की, क्यूं करते हो बात ? पुरी जगह ही खाली है, घर बार लाओ जनाब। परिवार लाओ साथ कि, सुनके खड़े हो गए कान। एक बात है ईक्छित मुझको, क्षमा करे श्रीमान। क्षमा करे श्रीमान कि सुना, होती अतुलित भीड़। निश्चिन्त हो श्रीमान तुम कैसे, इतने धीर गंभीर? होती अतुलित भीड़ है बेशक, तुम मेरे मेहमान। आ जाओ मैं प्रेत अकेला, घर मेरा शमशान। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 15, 2019
May 15, 2019 at 6:20 AM UTC
हाय रे टेलीफोन
Me bhi tumhari tarah 1 aam insaan hu Pareshaniya mene bhi dekhi hai, takleefe mene bhi sahi h Kuch waqt k liye khud Ko kamzor bhi paya hai Mera bhi man mushkilo ko dekhkar ghbraya hai, Par inhi sab chizo se 1 tajurba paaya hai Jisne Zindagi ko jeena ka 1 naya rang sikhaya hai Sangharsh aur musibatein to jivan ka ek hissa hai Aage bhi badna hai sangharsh bhi nahi krna hai ye to galat kissa hai Sangharsh ke bina tajurba kaha se laoge Aur tajurbe ke bina kya sikhoge aur sikhaoge Ab waqt aa gaya hai tumhe himmat dikhani hogi, Apni kathinaiyo par apni asfaltao par tumko Vijay Pani hogi Apne irado ko or majbut banana hoga Kuch karna hai kuch karna hai in jazbato ko dil me utarna hoga Ye zindagi ki ladai hai tumhe khud hi ladni hogi Apni kamiyo ko taqat banane ki kala tumhe sikhni hogi Tum chaho to duniya jeet skte ** Apne har sapne ko haqueeqat me badal skte ** !!! :)
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Dec 27, 2017
Dec 27, 2017 at 7:26 AM UTC
Sangharsh
Chalo ! Chalo aaj kuch esa kiya jae, Apne Sapno ko Haqeeqat se Joda jae, Ye dono 1 dusre se bilkul alag hai, par dono hi apni kabiliyat ke liye mashoor hai, Sapne, Sapne to Aasman hai, Jinki koi seema hi nahi, Par Haqeeeqat to Aag se Bhare angaare hai, Jin par chal pana itna aasan nahi. Sapne to woh raah hai, Jo hume kuch karne k liye prerit karti hai, par haqeeqat, haqeeqat to un sapno ko bhi tod deti hai. To kya ab haqeeqat ko dekhkr, sapne dekhna chod de, ya apni khwaisho ke rukh ko hi mod le, Agar Nahi, To fir chalo haqeeqat ko swikarte hai, Apne sapno ko haqeeqat banane me jutt jate hai, Mehnat kar apni kabiliyat ke rang sajate hai, Apne sapno ko apni Manjil tak lekar jate hai, Apne khwabo ke pankho ko or feltate hai, Thoda Haste hai, Thoda hasate hai, Chalo na !!! Apni zindagi ko thoda or kamyab banate hai !!!!.. Written By : SHIVAM PORWAL
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Sep 13, 2017
Sep 13, 2017 at 7:55 AM UTC
Sapne Aur Haqeeqat
अब खतों के जल्द जवाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? पता या लोग? अब दरिया में वो सैलाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? बहाव या ग़हराव? अब रातों में वो ख्वाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? लगाव या तनाव? अब खैरियत के तलबदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? झुकाव या चुनाव? चाँद से वो ज्वार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? आफ़ताब या खिंचाव? अब इस घर में किरायेदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? हिसाब या रखरखाब?
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Jun 1, 2017
Jun 1, 2017 at 8:12 AM UTC
पता नहीं क्या बदल गया है?