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Bhakti May 2018
शिरोमणि , मातृभक्त , शूरवीर , सिसोदिया वंश के युवराज थे ।
किया समर्पित तन , मन , धन ऐसे महाराणा प्रताप थे ।

लोभ , मोह , भोग , विलास सब छू भी ना उनको पाता था
स्वाभिमान देख उनका पाषाण भी शीश झुकाता था

घर , परिवार , आराम का विचार भी ना हृदय तक आता था
इतिहास का वो पन्ना भी सम्मान से लिखा जाता था

काली मुगलिया छाया में वो उजले प्रभात थे
मातृभूमि के तेजस्वी पुत्र वो महाराणा प्रताप थे

चुनी घास की रोटियाँ , महलों का 56 भोग ठुकराया
तिलक किया मातृभूमि को लहू से , विजय पताका फहराया

हाथ जोड़ नतमस्तक है धरती का हर एक कण
धरती माँ तेरे नाम किया जीवन का हर एक क्षण

हीरे जवाहरात कब भाये पहने स्वाभिमान का ताज थे
रक्त से लिखी स्वयं की गाथा वो महाराणा प्रताप थे
वो महाराणा प्रताप थे
YUKTI May 2018
I am walking in the hot summer wind
But I am shaking because the flowing tears were chilled.

My heart is running fast
And my head is aghast.

Hands are not free but held in the tight fist
I am afraid of seeing my bleeding wrist.

I feel someone's hand on my forehead
“Wake up sweety it was just a bad dream.”

My head is covered with sweat
But the firm hand of my mum abet.

In The battle with inner me
Days after days she wins
but
Today is the golden day cause I win..
Your comments are always appreciated.
Bhakti May 2018
कत्ल किया है मुजरिम हूँ ??
ना कोई शिकंज ना कोई ग्लानी
जानती हूँ ना कानून है इसका ना  सजा-ए-मौत का ख़ौफ.....

कत्ल हुए है मेरे जज़्बात, मेरे अरमान मेरे ख्वाब
कत्ल किया है मुजरिम हूँ.....
YUKTI Apr 2018
Someone has stolen my food,
Which I saved and made for my soul.

My soul is starving,
And the mind is crying.

I suddenly started asking for help,
I fell on the floor and yelp.

My soul is dying for the food
And I started feeling guilty for being so rude.


The stolen food was not fruits, vegetables or ice creams,
But they were my wishes desires and dreams.
Your comments are always appreciated.
YUKTI Apr 2018
do not make
too many memories
with someone.

Their absence
will eat you
from inside!!
Your comments are always appreciated.
YUKTI Apr 2018
No one gives a **** what is in your heart until
it comes out from your mouth!
YUKTI Apr 2018
You held my hand Before I stepped on the stage..
We took a few steps together..
While climbing the stairs of the stage you lightly tightened the grip and suddenly left.
Made a hand gesture and showed me the way, I had to walk alone..
You showed me a thumbs up and tried to encourage me..
And while holding the mic I smiled and realized that my imagination power is fabulous!!
Your comments are always appreciated :)
YUKTI Apr 2018
Sometimes shadow can
be your best friend,
When the sun shines
and hinders your vision,
shadow is the only one
who stands with you!
Your comments are always appreciated.
YUKTI Apr 2018
We remember the pain but not the happiness.

We remember the results but not the struggle behind that.

We remember the worst but not the best moment.

We remember the adulthood but not the puerility!!
Bhakti Apr 2018
Inspired from Punit Raja...
खामोश था वो कमरा , एक टेबल ,कुर्सी ओर खिड़की थी जहाँ से सूरज की हल्की हल्की रोशनी सामने रखे काँच को छू कर कुछ समा रोशन कर रही थी , सन्नाटे में पंखे की आवाज का हल्का खलल नादान गुस्ताखी की तरह नजर आ रहा था ।
मैं वहां कुछ वक्त अपनी तन्हाइयो के साथ बिताने बैठ गई , आँखे मूंदे हुए मैं खुद से कुछ सवाल जवाब की मन्शा में थी ।
जिंदगी का एक बड़ा सफर बिताने के बाद ये वक्त था जहाँ में अपने हर दर्द की एहमियत जान सकू ।
सामान्य इंसानो की तरह मेरी जिंदगी भी कई जख्मो , अश्कों से हो कर गुजरी थी ।

स्वतः आज मन ने हर जख्म के आलंकन की ठानी सूची बनाते हुए मेने एक एक कर अपने हर दर्द से रूबरू हो उनकी पीड़ा सुनी ।

गरीबी का दर्द , अपनो के खो जाने का दर्द , इश्क का दर्द , आत्मसम्मान का दर्द ........
बेशक ये हर दर्द अपने आप मे भीषण जख्म का सैलाब है , पर उनसे मुलाकात के बाद मेने आत्मसम्मान , स्वाभिमान खो जाने के दर्द को सर्वोपरि जाना........ पर क्यों ???

की वक्त नही रुकता किसी के लिए ओर कोई नही रुकता वक्त के लिए अतः किसी को खोना इश्क में या जीवन मे भुलाया तो नही पर धुँधला सकता है
जख्म मिट तो नही सकता पर भर सकता है

धन संपदा तो हर महापुरुष के लिए निर्मूल्य है।
परंतु जो स्वाभिमान मार दिया जाए तो शरीर जीता है , हर रोज अपनी आत्मा को छलनी कर के ,
हर दिन रक्त की एक ओझल बून्द शरीर का त्याग करती है ।
जैसे रूह स्वयं का गला दबा मृत्यु की के समक्ष गिड़गिड़ाती हो , ओर मोत मुस्कुरा कर सामने से गुजर जाती हो ......
की याद करो उन वीरो को जो स्वतंत्रता , आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कफन शीश पर ओढ़े निकल जाया करते थे , क्या उन्हें नही चाहत थी धन की , मोहोब्बत की , अपनो की ?
पर शायद उन्होंने अपना स्वाभिमान छलनी होते देखा होगा और उनकी रूह ने दुत्कारा होगा कई मर्तबा...
परंतु अगर ये शाश्वत है कि स्वाभिमान सर्वोपरि है , तो कैसे हमारा जीवन शोभनीय है ?
जहाँ हमारे देश मे परदेश के जिंदाबाद के नारे लगाए जाते है और हम सुन कर चेन से सो जाते है ।
हमारी स्त्रियां बेआबरू हो जाती है और हम पन्ना पलट कहते है ये किस्से रोज आते है ।

की हम की आपने देश को आग में धकेल कर धरने ओर मानवता का नाम देते है
शिरोमणि है देश उसके बाद धर्म फिर धर्म के नाम पर अपनी धरती का आँचल खून से सना देते है
क्या हमारी आत्मा चीखती नही या मार दिया है हमने ही उसे निर्दयता से

इस भीषण द्वंद से कपकपा कर मेरी आँखें खुली
शरीर पसीने से युक्त , काँपते हुए हाथ .....
ये मेरी रूह थी जो मुझसे मेरे स्वाभिमान , मेरे देश का सम्मान मांग रही थी ....

और आपकी रूह क्या माँगती है आपसे ????
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