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bhakti
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26/F/India,Indore https://www.instagram.com/lines_on_crumpled_paper/
बरसाती है नयन घटा , अम्बर जयकार गाता होगा लहू से सींची माटी का ,सीना चौड़ा हो जाता होगा टूटती होगी चूड़ियाँ पर,आँखो से गर्व झलकता होगा पिता के साये से जुदा,बचपन कोने में तड़पता होगा हाथ जोड़े ईश्वर राह पर खड़ा अश्रु बहाता होगा । जब माँ का वीर लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । होली के रंगों के बीच ,वो घर बेरंग रह जाता होगा अंधियारी होती दीवाली,जो चिराग बुझ जाता होगा खेलने की उम्र में पिता की अर्थी उठाता होगा । श्रृंगार करता वो हाथ जब सिंदूर मिटाता होगा । चीखती भारत भूमि , रक्त से आँचल नहाता होगा । जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । बूढ़ी माँ जब संतान की अर्थी को सजाती होगी । पुत्र को पिता अग्नि दे नीरस लड़खड़ाता होगा । क्या तब भी नेताओँ का दिल नहीं पिघलता होगा क्या तब भी सवालों का सिलसिला नहीं थमता होगा। इस गम में शैतान भी,श्रण भर शीश झुकाता होगा जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा.......
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Jul 2, 2018
Jul 2, 2018 at 6:18 AM UTC
जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा ।
बरसाती है नयन घटा , अम्बर जयकार गाता होगा लहू से सींची माटी का ,सीना चौड़ा हो जाता होगा टूटती होगी चूड़ियाँ पर,आँखो से गर्व झलकता होगा पिता के साये से जुदा,बचपन कोने में तड़पता होगा हाथ जोड़े ईश्वर राह पर खड़ा अश्रु बहाता होगा । जब माँ का वीर लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । होली के रंगों के बीच ,वो घर बेरंग रह जाता होगा अंधियारी होती दीवाली,जो चिराग बुझ जाता होगा खेलने की उम्र में पिता की अर्थी उठाता होगा । श्रृंगार करता वो हाथ जब सिंदूर मिटाता होगा । चीखती भारत भूमि , रक्त से आँचल नहाता होगा । जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । बूढ़ी माँ जब संतान की अर्थी को सजाती होगी । पुत्र को पिता अग्नि दे नीरस लड़खड़ाता होगा । क्या तब भी नेताओँ का दिल नहीं पिघलता होगा क्या तब भी सवालों का सिलसिला नहीं थमता होगा। इस गम में शैतान भी,श्रण भर शीश झुकाता होगा जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा । जब माँ का सपूत लिपट तिरंगे में आँगन को आता होगा.......
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अंजान बने , खामोश सब सहते रहे । शायद मेरे अश्कों से सुकून नसीब हो उन्हें , ये सोच बेपनाह वो पलकों से बहते रहे । वो खंजर से रूह जख्मी कर रहे मेरी , हम हार कर दुनियाँ को देख हसते रहे....
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May 17, 2018
May 17, 2018 at 5:12 AM UTC
pain
सूखा , बंजर पड़ा है नसीब मेरा , नेमत की बूंदों से नियति भीगा दे .। तृषित तकदीर मेरी कराहती बरसों से , उम्मीद के नीर का स्वाद चखा दे । लिख मेरी किस्मत में सुकून को ऐ खुदा , या बुलाके तेरे आशियानें में , जन्नत से रूबरू करा दे ।
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May 12, 2018
May 12, 2018 at 10:54 AM UTC
Luck
शिरोमणि , मातृभक्त , शूरवीर , सिसोदिया वंश के युवराज थे । किया समर्पित तन , मन , धन ऐसे महाराणा प्रताप थे । लोभ , मोह , भोग , विलास सब छू भी ना उनको पाता था स्वाभिमान देख उनका पाषाण भी शीश झुकाता था घर , परिवार , आराम का विचार भी ना हृदय तक आता था इतिहास का वो पन्ना भी सम्मान से लिखा जाता था काली मुगलिया छाया में वो उजले प्रभात थे मातृभूमि के तेजस्वी पुत्र वो महाराणा प्रताप थे चुनी घास की रोटियाँ , महलों का 56 भोग ठुकराया तिलक किया मातृभूमि को लहू से , विजय पताका फहराया हाथ जोड़ नतमस्तक है धरती का हर एक कण धरती माँ तेरे नाम किया जीवन का हर एक क्षण हीरे जवाहरात कब भाये पहने स्वाभिमान का ताज थे रक्त से लिखी स्वयं की गाथा वो महाराणा प्रताप थे वो महाराणा प्रताप थे
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May 9, 2018
May 9, 2018 at 6:50 AM UTC
Maharana Pratap's Birthday
शिरोमणि , मातृभक्त , शूरवीर , सिसोदिया वंश के युवराज थे । किया समर्पित तन , मन , धन ऐसे महाराणा प्रताप थे । लोभ , मोह , भोग , विलास सब छू भी ना उनको पाता था स्वाभिमान देख उनका पाषाण भी शीश झुकाता था घर , परिवार , आराम का विचार भी ना हृदय तक आता था इतिहास का वो पन्ना भी सम्मान से लिखा जाता था काली मुगलिया छाया में वो उजले प्रभात थे मातृभूमि के तेजस्वी पुत्र वो महाराणा प्रताप थे चुनी घास की रोटियाँ , महलों का 56 भोग ठुकराया तिलक किया मातृभूमि को लहू से , विजय पताका फहराया हाथ जोड़ नतमस्तक है धरती का हर एक कण धरती माँ तेरे नाम किया जीवन का हर एक क्षण हीरे जवाहरात कब भाये पहने स्वाभिमान का ताज थे रक्त से लिखी स्वयं की गाथा वो महाराणा प्रताप थे वो महाराणा प्रताप थे
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कत्ल किया है मुजरिम हूँ ?? ना कोई शिकंज ना कोई ग्लानी जानती हूँ ना कानून है इसका ना सजा-ए-मौत का ख़ौफ..... कत्ल हुए है मेरे जज़्बात, मेरे अरमान मेरे ख्वाब कत्ल किया है मुजरिम हूँ.....
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May 4, 2018
May 4, 2018 at 2:03 AM UTC
कत्ल
आओ बहनों फिर जोहर कुंड सजा लेते है । अग्नि के पावन तेज से ये जिस्म जला देते है कोई भाई हमें उस नर्क के दर्द से बचाने ना आ पायेगा। खोफ का ये मंजर अब नहीं सहा जाएगा । रूह कांप रही है सोच कर कैसे जुल्म अबलाओं ने झेला होगा । सतीत्व के साथ नीचों ने हस हस के खेला होगा । उम्मीद मर गई है मेरी इंसाफ और कानून से हर चोखट की इज़्ज़त को राजनीति में उछाला जाएगा। कुछ दिनों का किस्सा बन कर ये भी भूली बात होगी । ये लिखावट भी किसी भयानक दर्द की राख होगी । नहीं कर सकती अब कोई माँ बेटी की आबरू का बलिदान नहीं बन सकती अब कोई लड़की बदले का , हवस का सामान । खोफ से सनी रातों को अब ना ख्वाबों में देखा जाएगा सुनों मेरी अब हमें बचाने नहीं कोई कृष्णा आएगा आखरी श्रंगार कर मोत का मजा लेते है । आओ बहनों फिर जोहर कुंड सजा लेते है ।
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Apr 15, 2018
Apr 15, 2018 at 11:24 PM UTC
जोहर
आओ बहनों फिर जोहर कुंड सजा लेते है । अग्नि के पावन तेज से ये जिस्म जला देते है कोई भाई हमें उस नर्क के दर्द से बचाने ना आ पायेगा। खोफ का ये मंजर अब नहीं सहा जाएगा । रूह कांप रही है सोच कर कैसे जुल्म अबलाओं ने झेला होगा । सतीत्व के साथ नीचों ने हस हस के खेला होगा । उम्मीद मर गई है मेरी इंसाफ और कानून से हर चोखट की इज़्ज़त को राजनीति में उछाला जाएगा। कुछ दिनों का किस्सा बन कर ये भी भूली बात होगी । ये लिखावट भी किसी भयानक दर्द की राख होगी । नहीं कर सकती अब कोई माँ बेटी की आबरू का बलिदान नहीं बन सकती अब कोई लड़की बदले का , हवस का सामान । खोफ से सनी रातों को अब ना ख्वाबों में देखा जाएगा सुनों मेरी अब हमें बचाने नहीं कोई कृष्णा आएगा आखरी श्रंगार कर मोत का मजा लेते है । आओ बहनों फिर जोहर कुंड सजा लेते है ।
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Inspired from Punit Raja... खामोश था वो कमरा , एक टेबल ,कुर्सी ओर खिड़की थी जहाँ से सूरज की हल्की हल्की रोशनी सामने रखे काँच को छू कर कुछ समा रोशन कर रही थी , सन्नाटे में पंखे की आवाज का हल्का खलल नादान गुस्ताखी की तरह नजर आ रहा था । मैं वहां कुछ वक्त अपनी तन्हाइयो के साथ बिताने बैठ गई , आँखे मूंदे हुए मैं खुद से कुछ सवाल जवाब की मन्शा में थी । जिंदगी का एक बड़ा सफर बिताने के बाद ये वक्त था जहाँ में अपने हर दर्द की एहमियत जान सकू । सामान्य इंसानो की तरह मेरी जिंदगी भी कई जख्मो , अश्कों से हो कर गुजरी थी । स्वतः आज मन ने हर जख्म के आलंकन की ठानी सूची बनाते हुए मेने एक एक कर अपने हर दर्द से रूबरू हो उनकी पीड़ा सुनी । गरीबी का दर्द , अपनो के खो जाने का दर्द , इश्क का दर्द , आत्मसम्मान का दर्द ........ बेशक ये हर दर्द अपने आप मे भीषण जख्म का सैलाब है , पर उनसे मुलाकात के बाद मेने आत्मसम्मान , स्वाभिमान खो जाने के दर्द को सर्वोपरि जाना........ पर क्यों ??? की वक्त नही रुकता किसी के लिए ओर कोई नही रुकता वक्त के लिए अतः किसी को खोना इश्क में या जीवन मे भुलाया तो नही पर धुँधला सकता है जख्म मिट तो नही सकता पर भर सकता है धन संपदा तो हर महापुरुष के लिए निर्मूल्य है। परंतु जो स्वाभिमान मार दिया जाए तो शरीर जीता है , हर रोज अपनी आत्मा को छलनी कर के , हर दिन रक्त की एक ओझल बून्द शरीर का त्याग करती है । जैसे रूह स्वयं का गला दबा मृत्यु की के समक्ष गिड़गिड़ाती हो , ओर मोत मुस्कुरा कर सामने से गुजर जाती हो ...... की याद करो उन वीरो को जो स्वतंत्रता , आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कफन शीश पर ओढ़े निकल जाया करते थे , क्या उन्हें नही चाहत थी धन की , मोहोब्बत की , अपनो की ? पर शायद उन्होंने अपना स्वाभिमान छलनी होते देखा होगा और उनकी रूह ने दुत्कारा होगा कई मर्तबा... परंतु अगर ये शाश्वत है कि स्वाभिमान सर्वोपरि है , तो कैसे हमारा जीवन शोभनीय है ? जहाँ हमारे देश मे परदेश के जिंदाबाद के नारे लगाए जाते है और हम सुन कर चेन से सो जाते है । हमारी स्त्रियां बेआबरू हो जाती है और हम पन्ना पलट कहते है ये किस्से रोज आते है । की हम की आपने देश को आग में धकेल कर धरने ओर मानवता का नाम देते है शिरोमणि है देश उसके बाद धर्म फिर धर्म के नाम पर अपनी धरती का आँचल खून से सना देते है क्या हमारी आत्मा चीखती नही या मार दिया है हमने ही उसे निर्दयता से इस भीषण द्वंद से कपकपा कर मेरी आँखें खुली शरीर पसीने से युक्त , काँपते हुए हाथ ..... ये मेरी रूह थी जो मुझसे मेरे स्वाभिमान , मेरे देश का सम्मान मांग रही थी .... और आपकी रूह क्या माँगती है आपसे ????
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Apr 12, 2018
Apr 12, 2018 at 11:02 PM UTC
आपकी रूह क्या माँगती है आपसे ????
Inspired from Punit Raja... खामोश था वो कमरा , एक टेबल ,कुर्सी ओर खिड़की थी जहाँ से सूरज की हल्की हल्की रोशनी सामने रखे काँच को छू कर कुछ समा रोशन कर रही थी , सन्नाटे में पंखे की आवाज का हल्का खलल नादान गुस्ताखी की तरह नजर आ रहा था । मैं वहां कुछ वक्त अपनी तन्हाइयो के साथ बिताने बैठ गई , आँखे मूंदे हुए मैं खुद से कुछ सवाल जवाब की मन्शा में थी । जिंदगी का एक बड़ा सफर बिताने के बाद ये वक्त था जहाँ में अपने हर दर्द की एहमियत जान सकू । सामान्य इंसानो की तरह मेरी जिंदगी भी कई जख्मो , अश्कों से हो कर गुजरी थी । स्वतः आज मन ने हर जख्म के आलंकन की ठानी सूची बनाते हुए मेने एक एक कर अपने हर दर्द से रूबरू हो उनकी पीड़ा सुनी । गरीबी का दर्द , अपनो के खो जाने का दर्द , इश्क का दर्द , आत्मसम्मान का दर्द ........ बेशक ये हर दर्द अपने आप मे भीषण जख्म का सैलाब है , पर उनसे मुलाकात के बाद मेने आत्मसम्मान , स्वाभिमान खो जाने के दर्द को सर्वोपरि जाना........ पर क्यों ??? की वक्त नही रुकता किसी के लिए ओर कोई नही रुकता वक्त के लिए अतः किसी को खोना इश्क में या जीवन मे भुलाया तो नही पर धुँधला सकता है जख्म मिट तो नही सकता पर भर सकता है धन संपदा तो हर महापुरुष के लिए निर्मूल्य है। परंतु जो स्वाभिमान मार दिया जाए तो शरीर जीता है , हर रोज अपनी आत्मा को छलनी कर के , हर दिन रक्त की एक ओझल बून्द शरीर का त्याग करती है । जैसे रूह स्वयं का गला दबा मृत्यु की के समक्ष गिड़गिड़ाती हो , ओर मोत मुस्कुरा कर सामने से गुजर जाती हो ...... की याद करो उन वीरो को जो स्वतंत्रता , आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कफन शीश पर ओढ़े निकल जाया करते थे , क्या उन्हें नही चाहत थी धन की , मोहोब्बत की , अपनो की ? पर शायद उन्होंने अपना स्वाभिमान छलनी होते देखा होगा और उनकी रूह ने दुत्कारा होगा कई मर्तबा... परंतु अगर ये शाश्वत है कि स्वाभिमान सर्वोपरि है , तो कैसे हमारा जीवन शोभनीय है ? जहाँ हमारे देश मे परदेश के जिंदाबाद के नारे लगाए जाते है और हम सुन कर चेन से सो जाते है । हमारी स्त्रियां बेआबरू हो जाती है और हम पन्ना पलट कहते है ये किस्से रोज आते है । की हम की आपने देश को आग में धकेल कर धरने ओर मानवता का नाम देते है शिरोमणि है देश उसके बाद धर्म फिर धर्म के नाम पर अपनी धरती का आँचल खून से सना देते है क्या हमारी आत्मा चीखती नही या मार दिया है हमने ही उसे निर्दयता से इस भीषण द्वंद से कपकपा कर मेरी आँखें खुली शरीर पसीने से युक्त , काँपते हुए हाथ ..... ये मेरी रूह थी जो मुझसे मेरे स्वाभिमान , मेरे देश का सम्मान मांग रही थी .... और आपकी रूह क्या माँगती है आपसे ????
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आँखों मे आ गया पर छलका नहीं । ठहर गया दो पल पलकों पर , हूँ बस पानी पर हल्का नहीं । रुका में की नजर ना आये दर्द उसका भीड़ को । पर भीतर आये सेलाब ने सब्र को झंजोड दिया । कई मर्तबा जुंझा में उसकी इस कशमकश में... कई दफा उसने मुझे मुस्कुरा कर पी लिया । अबके जो पलकों पे आया तो रुका भी , सोच कर दुनिया का ये अश्क थोड़ा सूखा भी । ना कुसूर ना आदत उसकी तकदीर में था सहना । करता भी क्या मामूली अश्क हूँ , मेरी नियति है फकत बहना ......
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Apr 9, 2018
Apr 9, 2018 at 3:33 AM UTC
अश्क
स्याही बेताब है कलम पाने को पर अश्क इतने है कि शब्द नजर नहीं आ रहे । जस्बात माकूल है बेशक जताने को पर दर्द इतने है कि लफ्ज़ सम्हाले नहीं जा रहे ।
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Apr 2, 2018
Apr 2, 2018 at 4:08 AM UTC
words
तन्हाई में कुछ पल... खुद को हँसाना चाहती हूँ । बंद कमरे में सन्नाटे में क्यों भीड़ का शोर हैं । मेरे दर्द की हर चीख़ को कुछ पल दबाना चाहती हूँ । जो बीत गया के जख्मों से रूह लहूलुहान हैं । वक्त के उस दौर को कुछ पल भुलाना चाहती हूँ । मैं अपनी रूह के साथ कुछ वक्त बिताना चाहती हूँ ।
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Mar 30, 2018
Mar 30, 2018 at 12:05 PM UTC
मैं अपनी रूह के साथ कुछ वक्त बिताना चाहती हूँ ।