Submit your work, meet writers and drop the ads. Become a member
हाज़िरजवाब
प्रतिस्पर्धी
किसी खुशकिस्मत को
नसीब होता है ,
वरना
ढीला ढाला प्रतिद्वंद्वी
आदमी को
लापरवाह बना देता है ,
आगे बढ़ने की
दौड़ में
रोड़े अटकाकर
भटका देता है ,
चुपके चुपके से
थका देता है।
वह किसी को न ही मिले तो अच्छा ,
ताकि जीवन में
कोई दे कर गच्चा
कर न सके
दोराहे और चौराहे पर
कभी हक्का बक्का।
अच्छा और सच्चा प्रतिद्वंद्वी
बनने के लिए
आदमी सतत प्रयास करता रहे ,
वह न केवल अथक परिश्रम करे ,
बल्कि समय समय पर
समझौता करने के निमित्त
खुद को तैयार करता रहे।
संयम से काम करना
प्रतिस्पर्धी का गुण है ,
और विरोधी को अपने मन मुताबिक
व्यवहार करने को बाध्य करना
कूटनीतिक सफलता है।

प्रतिस्पर्धा में
कोई हारता और जीतता नहीं,
मन में कोई वैर भाव रखना,
यह किसी को शोभा देता नहीं।
प्रतिद्वंद्विता की होड़ में
यह कतई सही नहीं।
आदमी जीवन पथ की राह में
मिले अनुभवों के आधार पर
स्वयं को परखे तो सही ,
तभी प्रतिभा के समन्वय से
प्रतिस्पर्धा में टिका जाता है ,
जीवन के उतार चढ़ावों के बीच
प्रगति को गंतव्य तक पहुंचाया जाता है।
०४/०४/२०२५.
राजनीति में
मुद्दाविहीन होना
नेतृत्व का
मुर्दा होना है।
नेतृत्व
इसे शिद्दत से
महसूस कर गया।
अब इस सब की खातिर
कुछ कुछ शातिर बन रहा है।
यही समकालीन
राजनीतिक परिदृश्य में
यत्र तत्र सर्वत्र
चल रहा है।
बस यही रोना धोना
जी का जंजाल
बन रहा है।
नेता दुःखी है तो बस
इसीलिए कि
उसका हलवा मांडा
पहले की तरह
नहीं मिल रहा है।
उसका और उसके समर्थकों का
काम धंधा ढंग से
नहीं चल रहा है।
जनता जनार्दन
अब दिन प्रतिदिन
समझदार होती जा रही है।
फलत:
आजकल
उनकी दाल
नहीं गल रही है।
समझिए!
ज़िन्दगी दुर्दशा काल से
गुज़र रही है।
राजनीति
अब बर्बादी के
मुहाने पर है!
बात बस अवसर
भुनाने भर की है ,
दुकानदारी
चलाने भर की है।
मुद्दाविहीन
हो जाना तो बस
एक बहाना भर है।
असली दिक्कत
ज़मीर और किरदार के
मर जाने की है ,
हम सब में
निर्दयता के
भीतर भरते जाने की है।
इसका समाधान बस
गड़े मुर्दों को
समय रहते दफनाना भर है ,
मुद्दाविहीन होकर
निर्द्वंद्व होना है
ताकि मुद्दों के न रहने के बावजूद
सब सार्थक और सुरक्षित
जीवन पथ पर चलते रहें।
वे सकारात्मक सोच के साथ
जीवन में दुविधारहित होकर आगे बढ़ सकें ,
आपातकाल में
डटे रहकर संघर्ष कर सकें।
०४/०४/२०२५.
वह कितना चतुर हैं!
झटपट झूठ
परोस कर
बात का रुख
बदल देता है ,
जड़ से समस्या को
खत्म करता है।
यह अलग बात है कि
झूठ को छिपाने की
एक और समस्या को
दे देता है
जन्म !
जो भीतर की
ऊर्जा को करती रहती है
धीरे धीरे कम !
किरदार को
कमजोर करती हुई ,
आदमी को
अंदर तक
इस हद तक
निर्मोही करती हुई
कि उसका वश चले
तो हरेक विरोधी को
जीते जी एक शव में
कर दे तब्दील !
उसे झंड़े की तरह लहरा दे !
उसे एक कंदील में बदल
झूठे सच्चे के स्वागतार्थ
तोरण बना लटका दे !
झूठा आदमी ख़तरनाक होता है।
वह हर पल सच्चे के कत्ल का गवाह
बनने के इरादे में मसरूफ रहता है
और दिन रात
न केवल साजिशें रचता है
बल्कि मतवातर
गड़बड़ियां करता है,
ताकि वह हड़बड़ी फैला सके ,
मौका मिलने पर
हर सच्चे और पक्के को
धमका सके ,
मिट्टी में मिला सके।

०४/०४/२०२५.
आज के तेज रफ़्तार के
दौर में
अंदर व्यापे
अशांत करने वाले
शोर में
अचानक लगे
ट्रैफिक जाम में
धीरे धीरे
वाहनों का आगे बढ़ना
किसी को भी अखर सकता है ,
तेज़ रफ़्तार का आदी आदमी
अपना संयम खोकर
भड़क सकता है।
वह
अचानक
क्रोध में आकर
दुर्घटनाग्रस्त हो ,
जाने पर परेशान हो ,
तनावग्रस्त हो जाता है।
इस दयनीय अवस्था में
आज का आदमी
सचमुच
नरक तुल्य जीवन में फंसकर
अपना सुख चैन गंवा लेता है।
ऐसी मनोस्थिति में
वह क्या करे ?
वह कैसे अपने भीतर धैर्य भरे ?
वह कैसे संयमित होने का प्रयास करे ?
आओ इस बाबत
हम सब मिलकर विचार करें।

संयम के
अभाव में
धीमी गति
असह होती है ,
यह मन में
झुंझलाहट भरती है।
कभी कभी तो यह
आदमी को
बिना उद्देश्य से चलने वाली
एक ब्रेक फेल गाड़ी की तरह
व्यवहार करने को
बाध्य करती है ,
इस अवस्था में
आदमी की बुद्धि के कपाट
बंद हो जाते हैं ।
आदमी
लड़ने झगड़ने पर
आमादा हो जाते हैं।
अच्छी भली ज़िन्दगी में
गतिहीनता का अहसास
पहले से व्याप्त घुटन में
इज़ाफ़ा कर देता है।
आदमी
रुकी हुई जीवन स्थिति का
न चाहकर भी
बन जाता है शिकार!
वह कुंठित होकर
जाने अनजाने
बढ़ा लेता है
अपने भीतर व्यापे मनोविकार,
जिन्हें वह सफ़ाई से
छुपाता आया है,
वे सब मनोविकार
धीरे-धीरे
लड़ने झगड़ने की स्थिति में
होने लगते हैं प्रकट !
जीवन के आसपास
फैल जाता है कूड़ा कर्कट!
धीमी गति से
आज के तेज़ रफ़्तार
जीवन में
स्थितियां परिस्थितियां
बनतीं जाती हैं विकट !
विनाश काल भी
लगने लगता है अति निकट !!
कभी कभी
जीवन में धीमी गति
कछुए को विजेता
बना देती है।
परन्तु
जिसकी संभावना
आज के तेज़ तर्रार रफ़्तार भरे जीवन में
है बहुत कम।
तेज़ रफ़्तार जीवन
आदमी को
न चाहकर भी
बना देता है निर्मम!
और जीवन में व्याप्त  धीमी गति
आदमी को बेशक
दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाती है!
यह निर्विवाद सब को
गंतव्य तक पहुंचाती है !
तेज़ रफ़्तार वाले युग का मानस
इस सच को कभी तो समझे !
वह जीवन में
धीमी गति होने के बावजूद
किसी से न उलझे !
बल्कि वह शांत चित्त होकर
अपनी अन्य समस्याओं को सुलझाए।
व्यर्थ ही जीवन को
और  ज़्यादा  उलझाता न जाए।
वह अपने क़दम धीरे धीरे आगे बढ़ाए।
ताकि जीवन में
सुख समृद्धि और शांति को तलाश पाए।
०३/०४/२०२५.
बिगड़ैल का सुधरना
किसी सुख के मिलने जैसा है ,
किसी का बिगड़ना
विपदा के आगमन जैसा है।
इस बाबत
आप की सोच क्या है ?
बिगड़े हुए को सुधारना
कभी होता नहीं आसान।
वे अपने व्यवहार में
समय आने पर
करते हैं बदलाव।
इसके साथ साथ
वे रखते हैं आस ,
उनकी सुनवाई होती रहे।
वे सुधर बेशक गए ,
इसे भी अहसान माना जाए।
उनका कहना माना जाए।
वरना वे बिगड़ैल उत्पात मचाने
फिर से आते रहेंगे।

कुछ मानस
बिगड़े बच्चों को
लठ्ठ से सुधारना चाहते हैं,
आजकल यह संभव नहीं।
आज भी उनकी सोच है कि डर
अब भी उन सब पर कायम रहना चाहिए।
ऐसी दृष्टि रखने वालों को आराम दे देना चाहिए।
बिगड़ैल को पहले प्यार मनुहार से
सुधरने का मौका देना चाहिए।
फिर भी न मानें वे,
तो उन्हें अपने माता पिता से
मिला प्रसाद दे ही देना चाहिए।
कठोर दंड या तो सुधार देता है
अथवा बदमाश बना देता है।
उन्हें कभी कभी ढीठ बना देता है।
कई बार सुधार के चक्कर में
आदमी खुद को बिगाड़ लेता है।
हरेक ऐसे सुधारवादी पर हंसता है,
चुपके चुपके चुटकियां भरता है,
और कभी कभी अचानक फब्तियां भी कसता है।
किसी किसी समय आदमी को
उसकी सुधारने की जिद्द महंगी पड़ जाती है,
सारी अकड़ धरी धराई रह जाती है,
छिछालेदारी अलग से हो जाती है।
आप बताइए,
ऐसे मानस की इज्ज़त
कहां तक बची रह पाती है ?
०२/०४/२०२५.
कल अख़बार में
एक सड़क दुर्घटना में
मारे गए तीन कार सवार युवकों की
दुखद मौत की बाबत पढ़ा।
लिखा था कि
दुर्घटना के समय
बैलून खुल नहीं पाए थे,
बैलून खुलते तो उन युवाओं के असमय
काल कवलित होने से बचने की संभावना थी।
इसके बाद
एक न्यूज बॉक्स में
ऑटो एक्सपर्ट की राय छपी थी कि
सीट बैल्ट बांधने पर ही
बैलून खुलते हैं , अन्यथा नहीं।
मेरे जेहन में
एक सवाल कौंधा था ,
आखिर सीट बैल्ट बांधने में
कितना समय लगता है ?
चाहिए यह कि
कार की अगली सीटों पर बैठे सवार
न केवल सीट बैल्ट लगाएं
बल्कि पिछली सीट पर
सुशोभित महानुभाव भी
सीट बैल्ट को सेफ़्टी बैल्ट मानकर
सीट बैल्ट को बांधने में
कोई कोताही न करें ।
सब सुरक्षित यात्रा का करें सम्मान ,
ताकि कोई गवाएं नहीं कभी जान माल।
सब समझें जीवन का सच
दुर्घटनाग्रस्त हुए नहीं कि
हो जाएंगे हौंसले पस्त !
साथ ही सपने भी ध्वस्त !!

अतः यह बात पल्ले बांध लो
कि किसी वाहन पर सवार  होते ही
सीट  बैल्ट और अन्य सुरक्षा उपकरणों को पहन लो।
आप भी सुरक्षित रहो ,
साथ ही जनधन भी बचा रहे।
ज़िन्दगी का सफ़र भी आगे बढ़ता रहे।
आकस्मिक दुर्घटना का दंश भी न सहना पड़े।
०२/०४/२०२५.
उम्र बढ़ने के साथ साथ
भूलना एकदम स्वाभाविक है ,
परन्तु अस्वाभाविक है ,
विपरीत हालातों में
आदमी की
जिजीविषा का
कागज़ की पुड़िया की तरह
पानी में घुल मिल जाना ,
उसका लड़ने से पीछे हटते जाना ,
लड़ने , संघर्ष करने की वेला में ,
भीतर की उमंग तरंग का
यकायक घट जाना ,
भीतर घबराहट का भर जाना ,
छोटी छोटी बातों पर डर जाना।
ऐसी दशा में
आदमी अपने को कैसे संभाले ?
क्या वह तमाम तीर
और व्यंग्योक्तियों को
अपने गिरते ढहते ज़मीर पर आज़मा ले ?
क्या वह आत्महंता बन कर धीरू कहलवाना पसंद करे ?
क्यों न वह मूल्यों के गिरते दौर में
धराशाई होने से पहले
खुद को अंतिम संघर्ष के लिए तैयार करे ?
जीवन में अपने आप को
विशिष्ट सिद्ध करने के लिए हाड़ तोड़ प्रयास करे ?

वह जीवन में
लड़ना कतई न भूले ,
वरना सर्वनाश सुनिश्चित है ,
त्रिशंकु बनकर लटके रहना , पछताना भी निश्चित है।
अनिश्चित है तो खुद की नज़रों में फिर से उठ पाना।
ऐसे हालातों से निकल पाने के निमित्त
तो फिर
आदमी अपने आप को
क्यों न जीवन पथ पर लड़ने के काबिल बनाए ?
वह बिना लड़े भिड़े ही क्यों खुद को पंगु बनाए ?
वह अपने को जीवन धारा के उत्सव से जोड़े।
जीवन की उत्कृष्टता के साक्षात दर्शनार्थ
अपने भीतर उत्साह,उमंग तरंग,
अमृत संचार के भाव
निज के अंदर क्यों न समाहित करे ?
वह बस बिना लड़े घुटने टेकने से ही जीवन में डरे।
अतः मत भूलो तुम जीवन में मनुष्योचित लड़ना।
लड़ना भूले तो निश्चित है ,
आदमजात की अस्मिता का
अज्ञानता के नरक में जाकर धंसना।
पल पल मृत्यु से भी
बदतर जीवन को
क़दम क़दम पर अनुभूत करना।
खुद को सहर्ष हारने के लिए प्रस्तुत करना।
भला ऐसा कभी होता है ?
आदमी विजेता कहलवाने के लिए ही तो जीता है !
०२/०४/२०२५.
हरेक क्षेत्र में
हरेक जगह एक मसखरा मौजूद है
जो ढूंढना चाहता
अपना वजूद है
वह कोई भी हो सकता है
कोई ‌मसखरा
या फिर
कोई तानाशाह
जो चाहे बस यही
सब करें उसकी वाह! वाह!
अराजकता की डोर से बंधे
तमाम मसखरे और तानाशाह
लगने लगे हैं आज के दौर के शहंशाह!
जिन्हें देखकर
तमाशबीन भीड़
भरने को बाध्य होगी
आह और कराह!
शहंशाह को सुन पड़ेगी
यह आह भरी कराहने की आवाजें
वाह! वाह!! ...के स्वर से युक्त
करतल ध्वनियों में बदलती हुईं !
तानाशाह के
अहंकार को पल्लवित पुष्पित करती हुईं !!
०१/०४/२०२५.
मच गया हड़कंप
जब सत्तासीन हुआ ट्रम्प ,
डोंकी मोंकी रूट हुए डम्प।
यह सब अब तक ज़ारी है।
साधन सम्पन्न देश में अब
राष्ट्र प्रथम की अवधारणा को
क्रियान्वित करने की बारी है।
यह लहर चहुं ओर फैल रही है ,
दुनिया सार्थक परिवर्तन के निमित्त
अब
धीरे धीरे
अपनी सुप्त शक्ति को
करने लग पड़ी है
मौन रहकर संचित,
ताकि सकारात्मक ऊर्जा कर सके
देश दुनिया और समाज को
ढंग से संचालित ,
जिससे कि
निर्दोष न हों सकें
अब और अधिक
कभी भी
अन्याय के शिकार,
वे न हों सकें कभी
किसी जन विरोधी
व्यवस्था के हाथों
असमय प्रताड़ित।
वे श्रम,धन,बल,संगठन से
प्राप्त कर सकें
अपने सहज और स्वाभाविक
मानवीय जिजीविषा से
ओत प्रोत मानवाधिकार।
०१/०४/२०२५.
तुम कभी
बहुत ताकतवर रहे होंगें कभी ,
समय आगे बढ़ा ,
तुम ने भी तरक्की की होगी कभी ,
जैसे जैसे उम्र बढ़ी ,
वैसे वैसे शक्ति का क्षय ,
सामर्थ्य का अपव्यय
महसूस हुआ हो कभी !
बरबस आंखों में से
झरने सा बन कर
अश्रु टप टप टपकने
लगने लगे हों कभी।
अपनी सहृदयता ही
कभी लगने  लगी हो
अपनी कमज़ोरी और कमी।
इसके विपरीत
धुर विरोधियों ने
कमीना कह कर
सतत् चिढ़ाया हो
और भावावेश में आकर
भीतर बाहर
यकायक
गुस्सा आन समाया हो।
इस बेबसी ने
समर्थवान को आन रुलाया हो।

समर्थ के आंसू
पत्थर को
पिघलाने का
सामर्थ्य रखते हैं ,
पर जनता के बीच होने के
बावजूद
ये आंसू
समर्थ को सतत्
असुरक्षित करते रहते हैं ,
सत्तासीन सर्वशक्तिमान होने पर भी
निष्ठुर बने रहते हैं।
वे स्वयं असुरक्षित होने का बहाना
बना लेते हैं ,
वे बस जाने अनजाने
अपना उपहास उड़वा लेते हैं ,
मगर उन पर
अक्सर
कोई हंसता नहीं ,
उन्हें
अपने किरदार की
अच्छे से
समझ है कि
यदि कोई  
स्वभावतया भी हंस पड़ता है
तो झट से धड़
अलग हुआ नहीं ,
सब वधिक को ,
उसके आका को
ठहरायेंगे सही।
समर्थ को सतत् सक्रिय रहकर
आगे बढ़ना पड़ता है ,
क़दम क़दम पर
जीवन के विरोधाभासों से
निरंतर लड़ना पड़ता है।
समर्थ के आंसू
कभी बेबसी का
समर्थन नहीं करते हैं।
ये तो सहजता से
बरबस निकल पड़ते हैं।
हां,ये जरूर
मन के भीतर पड़े
गर्दोगुब्बार को धोकर
एक हद तक शांत करते हैं।
वरना समर्थ जीवन पर्यन्त
समर्थ न बना रहे।
वह अपने अंतर्विरोधों का
स्वयं ही शिकार हो जाए।
आप ही बताइए कि
वह कहां जाए ?
वह कहां ठौर ठिकाना पाए ?
०१/०४/२०२५.
हमने अज्ञानता वश
कर दी है एक भारी भरकम भूल ,
जिस भूल ने
जाने अनजाने
चटा दी है बड़े बड़ों को धूल
और जो बनकर शूल
सबको मतवातर
बेचारगी का अहसास
करवा रही है ,
अंदर ही अंदर
हम सब को
कमजोर
करती जा रही है।

हमने
लोग क्या कहेंगे ,
जैसी क्षुद्रता में फंसे रहकर
जीवन के सच को
छुपा कर रखा हुआ है ,
अपने भीतर
अनिष्ट होने के डर को भर
स्वयं को
सहज होने से
रोक रखा है।
यही असहजता
हमें भटकाती रही है ,
दर दर की ठोकरें खाने को
करती रही है बाध्य ,
जीवन के सच को
छुपाना
सब पर भारी पड़ गया है !
यह बन गया है
एक रोग असाध्य !!
आदमी
आजतक हर पल
सच को झूठलाने की
व्यर्थ की दौड़ धूप
करता रहा है ,
वह
स्वयं को छलता रहा है ,
निज चेतना को
छलनी छलनी कर रहा है !
स्व दृष्टि में
गया गुजरा बना हुआ सा
इधर उधर डोल रहा है ,
चाहकर भी
मन की घुंडी खोल
नहीं  रहा है ,
वह
एक बेबस और बेचारगी भरा
जीवन बिता रहा है ,
और
अपने भीतर पछतावा
भरता जा रहा है।
अतः
यह जरूरी है कि वह
जीवन के
सच को  
बेझिझक
बेरोक टोक
स्वीकार करे ,
जीवन में छुपने छुपाने का खेल
खेलने से गुरेज करे।
वह
इर्द गिर्द फैली
जीवन की खुली किताब को
रहस्यमय बनाने से परहेज़ करे।
इसे सीधी-सादी ही रहने दे।
इसे अनावृत्त ही रहने दे।
ताकि
सब सरल हृदय बने रह कर
इसे पढ़ सकें ,
जीवन पथ पर
आगे बढ़ सकें।
आओ , इस की खातिर
सब चिंतन मनन करें।
जीवन में कुछ भी छिपाना ठीक नहीं,
ताकि हम अपनी नीयत को रख सकें सही।
०१/०४/२०२५.
बाज़ार में
ऋण उपलब्ध करवाने की
बढ़ रही है होड़ ,
बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान
ऋण आसानी से
देने के  
कर रहे हैं प्रयास।
लोग खुशी खुशी
ऋण लेकर
अनावश्यक पदार्थों का
कर रहे हैं संचय।
ऋण लेना
सरल है ,
पर उसे
समय रहते
चुकाना भी होता है ,
समय पर ऋण चुकाया नहीं,
तो आदमी को
प्रताड़ना और अपमान के लिए
स्वयं को कर लेना चाहिए तैयार।
ऋण को न मोड़ने की
सूरत में  
ब्याज पर ब्याज लगता जाता है ,
यह न केवल
मन पर बोझ की वज़ह बनता है ,
बल्कि यह आदमी को
भीतर तक
कमजोर करता है,
आदमी हर पल आशंकित रहता है।
उसके भीतर
अपमानित होने का डर भी
मतवातर भरता जाता है।
उसका सुकून बेचैनी में बदल जाता है।

यह तो ऋणग्रस्त आदमी की
मनोदशा का सच है ,
परन्तु ऋणग्रस्त देश का
हाल तो और भी अधिक बुरा होता है,
जब आमजन का जीना दुश्वार हो जाता है,
तब देश में असंतोष,कलह और क्लेश, अराजकता का जन्म होता है,
जो धीरे-धीरे देश दुनिया को मरणासन्न अवस्था में ले जाता है,
और एक दिन देश विखंडन के कगार पर पहुंच जाता है ,
देश का काम काज
ऋण प्रदायक देश और संस्थान के इशारों पर होने लगता है।
यह सब एक नई गुलामी की व्यवस्था की वज़ह बनता जा रहा है ,
ऋण का दुष्चक्र विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को
विकास के नाम पर
विनाश की ओर ले जाता है।
इस बाबत बहुत देर बाद
समझ में आता है ,
जब सब कुछ छीन लिया जाता है,
तब ... क्या आदमी और क्या देश...
लूटे पीटे नज़र आते हैं ,
वे केवल नैराश्य फैलाने के लिए
पछतावे के साये में लिपटे नज़र आते हैं।
वे एक दिन आतंकी
और आतंकवाद फैलाने की नर्सरी में बदलते जाते हैं।
बिना उद्देश्य और जरूरत के
ऋण के जाल में फंसने से बचा जाए।
क्यों न
चिंता और तनाव रहित जीवन को जीया जाए !
सुख समृद्धि और शांति की खातिर चिंतन मनन किया जाए !
सार्थक जीवन धारा को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ा जाए !!
ऋण मुक्ति की बाबत समय रहते सोच विचार किया जाए ।
३१/०३/२०२५.
प्यार
जब एक जादूगर
सरीखा
लगने लगता है ,
तब जीवन
अत्यंत मनमोहक और
सम्मोहक
लगने लगता है,
इसका
जीवन में होना
मादकता का
कराने लगता है
अहसास,
आदमी का अपना होना
लगता है
भीतर तक
खासमखास।

किसी के जीवन में
प्यार की बदली
बरसे या न बरसे।
यह सच है कि
यह हरेक को
लगती रही है
अच्छी और सम्मोहक।

अहसास
प्यार का
जीवन घट में
कभी झलके या न झलके।
यह सच है कि
हरेक इस की चाहत
अपने भीतर
रखता रहा है,
यह उदासीनता की
कारगर दवा है।
इसकी उपस्थिति मात्र से
मन का नैराश्य
पलक झपकते ही
होने लगता है दूर !
बल्कि आंतरिक खुशी से
बढ़ जाता है नूर !!
यही वजह है कि सब
इसके लिए
लालायित रहते हैं,
इसकी प्राप्ति की खातिर
सतरंगी स्वप्न बुनते रहते हैं।
कोई कोई
इसकी खातिर ताउम्र
तरसता रह जाता है।
वह प्यार के जादू से
वंचित रह जाता है।
पता नहीं क्यों
प्यार एक जादूगर बनकर
कुछ लोगों के जीवन में
आने से रह जाता है ?
उनके हृदय में
हरदम कोहराम
मचा रहता है।
खुशकिस्मत हो!
जो यह जीवन में
अपनी उपस्थिति का
अहसास करा रहा है ,
तुम्हें और आसपास को
अपनी जादूगरी के रंग ढंग
सिखला रहा है ,
जीवन को सार्थक दिशा में
सतत् ले कर जा रहा है।
३०/०३/२०२५.
(मूल विचार ०७/०७/२००७ ).
जीवन भर भागता रहा
कृत्रिम खुशियों के पीछे।
हरेक तरीके से
अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए
छल प्रपंच का सहारा लिया,
अब भीतर तक गया हूं ‌रीत
सो सबने किनारा कर लिया।
आपाधापी
और
मारामारी के दौर में
चहुं ओर
मचा था शोर ।
बस यह कोलाहल
बाहर बाहर तक सीमित रहा,
कभी भी भीतर नहीं गया।
भीतर भी कुछ है,
इस तरफ़ नहीं गया ध्यान।
बस भागता रहा
जीवन में
पगलाया हुआ।
अब शरीर कमजोर है,
रहा नहीं मन और तन पर
नियंत्रण !
यातना शिविर का अहसास
कराता है अब
पल पल रीतता जाता जीवन।
अपने बीते को याद कर
अक्सर सोचता हूं,
व्यर्थ ही माया मोह में बंधा रहा ,
सारी उम्र अंधा बना रहा।
मैं कब किसी के लिए
उपयोगी बना ?
कुछ उसका काज संवरें,
इस खातिर
कभी सहयोगी बना।
नहीं न!
फिर  पछतावा कैसे?
फिर फिर घूम घाम कर
पछतावा आए न क्यों ?
यह रुलाए न क्यों ?
शायद
कोई भीतर व्यापा
अन्त:करण का सच
रह रह कर पूछता हो ,
आज मानसजात
जा रही किस ओर !
आदमी को
दुःख की लंबी अंधेरी
रात के बाद
कब दर्शन देगी भोर ?
....कि उसका
खोया आत्मविश्वास जगे ,
वह कभी तो संभले ,
उसे जीने के लिए
संबल मिले।
आदमी
इस जीवन यात्रा में
अध्यात्म के पथ पर बढ़े ।
या फिर वह
अति भौतिकवादी होकर
पतन के गर्त में
गिरता चला जाएगा।
क्या वह कभी संभल नहीं पाएगा ?
यदि आपाधापी का यह दौर
यूं ही अधिक समय तक चलता रहा,
तो आदमी कब तक पराजय से बच पाएगा।
यह भी सच है कि रह रह कर मिली हार
आदमजात को भीतर तक झकझोर देती है,
उसे कहीं गहरे तक तोड़ दिया करती है,
भीतर निराशा हताशा भर दिया करती है,
आत्मविश्वास को कमजोर कर
आंशका से भर , असमय मृत्यु का डर भर कर
भटकने के लिए निपट अकेला छोड़ दिया करती है।
ऐसी मनोस्थिति में
आदमी भटक जाया करता है ,
वह जीवन में
असंतुलन और असंतोष का
शिकार हो कर
अटक जाया करता है।
आजकल
बाहर फैला शोरगुल
धीरे-धीरे
अंदर की ओर
जाने को उद्यत है ,
यह भीतर डर भर कर
आदमजात को
तन्हां और बेघर करता जा रहा है।
आदमी अब पल पल
रीतता और विकल होता जाता है।
उसे अब सतत्
अपने अन्तःकरण में
शोरगुल सुनाई देता है।
इससे डरा और थका आदमी
आज जाए तो जाए कहां ?
अब शांति की तलाश में
वह किस की शरण में जाए ?
अति भौतिकता ने
उसे समाप्त प्रायः कर डाला है।
अब उसका निरंकुशता से पड़ा पाला है।
भीतर का शोर निरंतर
बढ़ता जा रहा है ,
काल का गाल
उसे लीलता ही नहीं
बल्कि छीलता भी जा रहा है।
वह मतवातर कराहता जा रहा है।
पता नहीं कब उसे इस अजाब से छुटकारा मिलेगा ?
अब तो अन्तःकरण में बढ़ता शोरगुल सुनना ही पड़ेगा...सुन्न होने तक!
२९/०३/२०२५.
ध्यान से सुनें ,
अपने इर्द गिर्द
तामझाम का मुलम्मा
चढ़ाने वाले ,
दिखावे का
महाप्रसाद तैयार करने वाले।
यह सब क्या है ?
इस आडंबर रचने की
वज़ह क्या है ?
इस दिखावे की बीमारी की
दवा कहां है ?
यह सब कुछ क्या है ?
आप सबको हुआ क्या है ?
दिखावे से क्षुब्ध
आदमी के अंदर
बहुत से सवालात
भीतर पैदा होते रहते हैं !
उसे दिन रात सतत
मथते रहते हैं !!
सवालात की हवालात में बंद करके,
उसे बेचैन करते रहते हैं !!
आज आदमी क्या करे ?
किस पर वह अपना आक्रोश निकाले ?
अच्छा हो कि देश दुनिया और समाज
दिखावा करने वालों को
निर्वासित कर दे
ताकि वे अप्रत्याशित ही
किसी साधारण मनुष्य को
कुंठित न कर सकें।
दिखावे और आडंबर के
मकड़जाल में उलझाकर
अशांति और अराजकता को फैलाकर
जीवन को अस्त व्यस्त कर
आदमी के भीतर तक
असंतोष और डर न भर दें।
एक हद तक
तामझाम अच्छा लग सकता है ,
परन्तु इसकी अति होने पर
यह विकास की गति को बाधित करता है।
अच्छा रहे कि लोग इससे बचें।
वे सादगीपूर्ण जीवन जीने की ओर बढ़ें।
बल्कि वे आपातकाल में संघर्षरत रहकर
जीवन धारा को स्वाभाविक रूप से बहने दें !
इस की खातिर
वे स्वयं को संतुलित भी करें ,
ताकि जीवन में सब सहजता से आगे बढ़ ‌सकें।
तामझाम का आवरण
अधिक समय तक
टिक नहीं पाता है ,
यह आदमी ‌को दुर्दशा की तरफ धकेल कर ,
सुख समृद्धि और सम्पन्नता से
वंचित कर देता है ,
भटकने के लिए
अकेलेपन से जूझने के निमित्त
असहाय,दीन हीन अवस्था में छोड़
प्रताड़ित करता है ,
सतत् डर भरकर
आदमी को बेघर करता है।
२८/०३/२०२५.
ज़िन्दगी के सफ़र में
बहुत से
उतार चढ़ाव आना
अनिवार्य है ,
पर क्या तुम्हें
ज़िन्दगी के सफ़र में
रपटीली सड़क पर
गड्ढे स्वीकार्य हैं ?
जो बाधित कर दें
तुम्हारी स्वाभाविक गति,
जीवन में होने वाली प्रगति।
अभी अभी
एक स्वाभिमानी
आटो चालक
कुशलनगर के
गुलज़ार बेग की बाबत पढ़ा है ,
जिन्होंने
प्रशासन के अधिकारियों से
सड़क सुरक्षा को
ध्यान में रखकर की थीं
शिकायतें कि
भर दो
क़दम क़दम पर
आने वाले सड़क के गड्ढे
ताकि अप्रत्याशित दुर्घटनाग्रस्त होने से
बचा जा सके।
परन्तु प्रशासन उदासीन बना रहा ,
उसने अपना अड़ियल रवैया न छोड़ा।
बल्कि फंड की कमी को
गड्ढे न भर सकने की वजह बताया।
इस पर
उन्होंने ठान लिया कि
अब वे कोई शिकायत नहीं करेंगे,
वह स्वयं ही सड़क के गड्ढे भरेंगे।
उस दिन से लेकर आज तक
अकेले अपने दम पर
उन्होंने साठ हजार से अधिक
सड़क के गड्ढे भर कर
जीवन को सुरक्षित किया है।
वह जिजीविषा की
बन गए हैं एक अद्भुत मिसाल।
अभी अभी पढ़ा है कि
गुलज़ार बेग साहब
रीयल लाइफ हीरो हैं।
सोचता हूं कि
यदि हमने उनसे कोई सीख न ली
तो हम सब जीरो हैं ,
आओ हम सार्थक जीवन वरें,
लोग क्या कहेंगे ?,
जैसी क्षुद्रता को नकारते हुए
जीवन पथ पर अग्रसर होने की ओर बढ़ें।
हम अपने भीतर की आवाज़ को सुनें।
उसके अनुसार कर्म करते हुए
अपने और आसपास के जीवन को सार्थक करें।
२७/०३/२०२५.
किसी के
उकसावे में
आकर बहक जाना
कोई अच्छी बात नहीं।
यह तो बैठे बिठाए
मुसीबत मोल लेना है !
ठीक परवाज़ भरने से पहले
अपने पंखों को घायल कर लेना है !
लोग अक्सर हरदम
अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए
उकसावे को हथियार बना कर
अपना मतलब निकालते हैं !
जैसे ही कोई उनका शिकार बना
वे अपना पल्लू झाड़ लेते हैं !
वे एकदम अजनबियत का लबादा ओढ़ कर
एकदम भोले भाले बने से
मुसीबत में पड़ चुके
आदमी की बेबसी पर
पर मन ही मन खुश होते हैं।
ऐसे लोग किसके हितचिंतक होते हैं ?
किसी के उकसाने पर
भूले से भी बहक जाना
कोई अक्लमंदी नहीं,
दोस्त ! थोड़ा होशियार बनो तो सही।
अपने को परिस्थितियों के अनुरूप
ढालने का प्रयास करो तो सही।
देखना, धीरे धीरे सब कमियाँ दूर हो जाएंगी।
सुख समृद्धि और संपन्नता भी बढ़ती जाएगी।
किसी के कहने में आने से सौ गुणा अच्छा है ,
अपनी योग्यता और सामर्थ्य पर भरोसा करना ,
जीवन यात्रा के दौरान
अपने प्रयासों को संशोधित करते रहना।
जीवन में मनमौजी बनकर अपनी गति से आगे बढ़ना।
किसी के भी उकसावे में आना अक्ल पर पर्दा पड़ना है।
अतः जीवन में संभल कर चलना बेहद ज़रूरी है ,
अन्यथा आदमी की स्वयं तक से बढ़ जाती दूरी है।
वह धीरे धीरे अजनबियत के अजाब में खो जाता है।
आदमी के हाथ से जीने का उद्देश्य और उत्साह फिसलता जाता है।
उकसावा एक छलावा है बस!
इसे समय रहते समझ!
और अपनी डगर चलता जा!
ताकि अपनी संभावना को सके ढूंढ !!
२६/०३/२०२५.
इतिहास के
बारे में
कुछ पूर्वाग्रह से युक्त
कोई धारणा बनाना
ख़तरे से
खाली नहीं ,
इसे कालखंड के
संदर्भ में
पढ़ा जाना चाहिए।
यह अपने अतीत का
मूल्यांकन भर है,
इसे वर्तमान के
घटनाचक्र से
पृथक रखा जाना चाहिए।
इतिहास जीवन का
मार्गदर्शक बन सकता है,
बशर्ते इसे लचीलेपन से
संप्रकृत किया जाए ,
इसे भविष्य के परिवर्तन से
जोड़ते हुए
एक संभावना के रूप में
महसूस किया जाए ,
इतिहास के संदर्भ में
इसे सतर्कता और जागरूकता के साथ
देखा और पढ़ा जाए ,
इतिहास की समझ की बाबत
आपस में लड़ा न जाए,
प्राचीन जीवन के उज्ज्वल पक्षों को तलाशा जाए ,
इनसे सीख लेकर
अपने वर्तमान को तराशा जाए ,
ताकि भविष्य में
संभावनाओं का स्वागत
आदमी अपनी चेतना के स्तर पर
करने के लिए
स्वयं को तैयार कर पाए !
जीवन यात्रा में
समय की धारा के संग
सतत अग्रसर हो सके ,
अतीत के विवादों को पीछे छोड़ सके ,
वह सार्थकता से
अपनी जीवन की संवेदना को जोड़ सके ,
अपना अड़ियल रवैया छोड़ सके ,
जिससे कि उसकी जीवन धारा नया मोड़ ले सके,
उसके भीतर इतिहास की समझ विकसित हो सके।
२५/०३/२०२५.
संसार में कौन भला और कौन बुरा ?
यहाँ जीवन का ताना बाना,
संघर्षों के इर्द गिर्द
है गया बुना।
इस जीवन में
पल पल
जन्म मरण का
सिलसिला है चलता आया।
यहाँ कोई अपना नहीं,न ही पराया !
जीवन के संघर्षों में बना रहना चाहिए
हमसाया!
जिसकी सोहबत से
और मतवातर सहयोग से
आदमी जीवनधारा को
चलायमान कर पाया।
जीवन का ताना बाना बड़ा अलबेला है ,
यहाँ हार जीत,सुख दुःख भरे क्षण
आते और जाते रहते हैं !
जीवन के रंगमंच पर
सब सब अपनी भूमिका निभाते हैं,
सब अपने समय में
आगमन और प्रस्थान का खेल,खेल
समय के समन्दर में खो जाते हैं !
काल के गाल में समा जाते हैं !!
अनंत काल से
यह सिलसिला है चल रहा !
जीवन मरण का खेल
जादुई सम्मोहन से लिपटा
जीवन का ताना बना बुन रहा।
इस डगर पर हर कोई मतवातर चलकर
जन्म दर जनम स्वयं को परिमार्जित कर रहा।
२५/०३/२०२५.
आजकल
कुछ नेतागण
सनातनी अस्मिता को
धूमिल करने के निमित्त
दे देते हैं उलटे सीधे बयान।
जिनसे झलकता है
अक्सर उनका मिथ्याभिमान।
ऐसे बयानों पर
बिल्कुल ध्यान न दो ,
अगर ऐसा नहीं किया
तो वे बरसाती मेंढ़क बनकर
और ज़्यादा टर्राहट करेंगें ,
जन साधारण को भयभीत करेंगें ,
और जान बूझ कर
अट्टहास करेंगें ,
यही नहीं मौका मिलेगा
तो जन का उपहास करेंगे !
जन धन पर कुदृष्टि रखेंगे !
आप उनकी बाबत क्या कहेंगें ?
कब तक सब अन्याय सहेंगें ?

ऐसे बयान
अचानक जुबान फिसलने से
निर्मित नहीं हुआ करते।
इनके पीछे सोची समझी
रणनीति हुआ करती है।
सोचा समझा बयान
भले किसी को
बुरा न लगे ,
पर यह गहरे घाव किया करता है ,
धुर अंदर तक मार किया करता है।
यह कभी कभी क्या हमेशा
जन मानस को विरोध के लिए
चुपके चुपके तैयार किया करता है।
अचानक
छोटी सी बात
अराजकता फैलने की
वज़ह बन जाया करती है ,
अनाप शनाप बयान देने वालों की
चाँदी हो जाया करती है।
इसे जनता जर्नादन
गहरे आघात के बाद समझती है ,
पर तब तक
जनतंत्र की गरिमा
धूमिल हो चुकी होती है।
अतः ऐसे बयान के आघात को
कभी मत भूलो तुम ,
ये जन मानस में पैदा कर देते हैं मति भ्रम। काश !समय आने पर ,
काश!
जनता
लोकतंत्र का पर्व मनाने वाले दिन
वोट से चोट देना
जल्द ही सीख जाए ,
तो उन उपद्रवियों के
परखच्चे
बिना गोला बारूद के
उड़ जाएं ,
निरीह पंछी
उन्मुक्त होकर
जीवनाकाश में
उड़ पाएं ।
वे गंतव्य तक
पहुँच जाएं।
सोच समझ कर
नेतृत्वकर्ता को देना
चाहिए बयान
अन्यथा अनजाने ही
जनता की म्यान ,
जनता जर्नादन का का आंतरिक ज्ञान
चुपके चुपके
अपने भीतर छुपी
असंतोष की तलवार को
धार लगा दिया करती है।
वह समय के साथ बढ़ती हुई
सत्ता पक्ष को
हतप्रभ , स्तब्ध , वध के लिए बाध्य करती हुई ,
संघर्ष पथ पर बढ़कर
परिवर्तन लाया करती है ,
देश दुनिया और समाज में
जिजीविषा भर जाया करती है।
अतः सब सजग हो जाएं ,
कम से कम
अपनी जुबां पर
समय रहते लगाम लगाएं !
वे असमय काल कवलित होने से
स्वयं को बचाएं !
आजकल
नेतागण
सोच समझ कर
अपने बयान दें ,
व्यर्थ ही बाद विवाद को
हवा भूल कर भी न दें !
वे अपने आचरण को
शिष्टता का स्पर्श कराएं !
अशिष्ट बनकर कड़वाहट न फैलाएं !!
२४/०३/२०२५.
मेरे घर हरेक सोमवार
जो अख़बार
आता है ,
वह
सकारात्मकता का
सन्देश मन तक
पहुंचाता है।
मुझे अक्सर
इस अख़बार का
इंतज़ार
रहता है ,
बेशक दिन
कोई सा भी रहा हो ,
सकारात्मकता वाला सोनवार
या फिर नकारात्मकता वाली
ख़बरों से भरे अन्य दिन !
मुझे अब
नकारात्मकता में भी
सकारात्मकता  
खोज लेने की विधि
आ गई है ,
यह मन को
भा गई है ।
वज़ह  
सोमवार का
सकारात्मक सच
सप्ताह के
बाकी दिनों में भी
मुझे उर्जित रखता है !
रविवार आने तक
मुझे सोमवार के सकारात्मकता भरपूर
अख़बार पढ़ने का
रहता है इंतज़ार !
सच कहूँ ,
सकारात्मकता में
निहित है
जीवन की रचनात्मकता का राज़ !
अच्छा रहे
सातों दिन सकारात्मकता से
भरपूर खबरें छपें !
नकारात्मकता वाली खबरें
अति ज़रूरी होने पर ही छपें !!
नकारात्मकता
यदि हद से ज्यादा
हम पर हावी हो जाती है ,
तो ज़िंदगी जीना दुरूह हो जाता है ,
समाज में अराजकता फैल  ही जाती है।
अच्छा है कि सब सकारात्मकता को अपनाएं !
नकारात्मकता को जड़ से लगातार खारिज़ करते जाएं !
ताकि सभी के मन और मस्तिष्क जीवन बगिया में उज्ज्वल फूल खिलाएं !
२४/०३/२०२५.
Mar 23 · 34
लताड़
इतिहास से खिलवाड़
करते हुए
आजकल
हमें कुछ चतुर सुजान लोगों
और बिकाऊ इतिहासकारों के लिखे
इतिहास को
पढ़ने को किया गया है
बाध्य।
ख़ूब ख़ूब उल्लू
बनाया गया हमें ,
इसे हम जड़ से समझें ,
ताकि हम अपनी अस्मिता को
पहचान सकें ,
भुला दी गई
गौरव गाथा का
स्मरण कर सकें ,
इसे अपनी स्मृतियों में
जीवंत बनाए रख सकें
और हम सब
अपने आप को
गंतव्य तक पहुंचा सकें।
ऐसा षडयंत्र
जिन्होंने किया ,
उनको लताड़ लगा सकें।
नव्य इतिहास लेखन
और खोजों के आधार पर
उपनिवेशवादी मानसिकता के
राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों को
सकें  समय रहते लताड़
ताकि वे
और ज़्यादा न कर सकें
जनभावनाओं और आकांक्षाओं के
साथ खिलवाड़।
हम सब सच का दें साथ ।
हम इतिहास से छेड़छाड़ होने देकर ,
न करें ,भूले से , सभी
कभी भी
राष्ट्र हितों पर कुठाराघात।
हम ऐसे दोगली मानसिकता पर
करें सतत् प्रहार।
२३/०३/२०२५.
यदि आपके मन में भरा हो गुब्बार,
व्यवस्था को लेकर
तो बग़ैर देरी किए
तंज़ कसने शुरू करो
सब पर
बिना कोई संकोच किए !
मगर ध्यान रहे।
जो भी तंज़ कसो,
जिस पर भी तंज़ कसो,
पूरे रंग में आकर
दिल से कसो !
ताकि मन में बस चुके गुब्बार
तनाव की वज़ह न बनें
और कहीं
अच्छाइयों की बाबत भी
नहीं ,नहीं ,कहते कहते,
और करते करते,
कुंठा के बोझ को सहते सहते,
अहंकार का गुब्बारा फट कर
सब कुछ को नेस्तनाबूद न कर दे,
समस्त प्रगति और विकास को
सिरे से बर्बाद न कर दे,
इसलिए तंज़ कसना ज़रूरी है,
यह गरीब गुरबे मानस की मज़बूरी है।
अतः तंज़ जी भर कर कसो,
अपने भीतर के तनावों को समय रहते हरो।
यही जीवन की बेहतरी के लिए मुफीद रहेगा।
कौन यहां अजनबियत से भरी पूरी दुनिया में घुटन सहे ?
क्यों न खुल कर, सब यहां ,तंज़ कसते हुए, जीवन यात्रा पूरी करें ?
२३/०३/२०२५.
पत्नी
यदि अच्छी है
तो जोरू का गुलाम
बनने और कहलाने में
काहे का हर्ज़ है,
यह तो डरपोक और कुटिल
इंसानों के भीतर पैदा हुआ मर्ज़ है,
इस रोग से
जितना जल्दी बचा जाए,
उतना अच्छा है!
पत्नी सेवा करना
हर बहादुर पति का फ़र्ज़ है।
यह समझ
सुलझे इंसानों के धुर भीतर दर्ज़ है।
सचमुच जोरू का गुलाम
शांति प्रिय होता है,
बेशक
वह दोस्तों की
आँखों में
हरदम खटकता है।
वह आसानी से कहाँ भटकता है ?
उसका मन
पत्नी सेवा में ही
जो
अटकता है।
ख़ुशी ख़ुशी
जोरू का गुलाम बनिए ,
जीवन में खुशियों को वरिए।
22/03/2025.
यह सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि
जल है तो कल है,
सुखद भविष्य के लिए
जल का संचयन करें ,
कुदरत माँ को समृद्ध करें।
परंतु आदमी के क्रिया कलाप
विपरीत ही ,
पूर्णतः विरोधाभासी होते हैं,
समय पर वर्षा न होने पर
सब रोते कुरलाते हैं,
उन्हें अपने कर्म याद आते हैं।
आज विश्व जल दिवस के दिन
माली जी ने मुझे चेताया कि
साहब , मैं छुट्टियां लेकर क्या घर गया !
पौधों को पानी न मिलने के कारण
सारा बगीचा मुरझा गया।
आप जो लीची का जो पौधा लेकर आए हैं ,
यह भी सूख गया है !
आप का पैसा बर्बाद हुआ।

अब गर्मी आ गई है ,
पानी ज़्यादा  चाहिएगा ,
वरना पौधे कुमल्हा जायेंगे!
वे बिन आई मौत मारे जायेंगे!!
जैसे लीची का पौधा
पानी न मिलने से मर गया।

मुझे ख्याल आया कि
जल का संरक्षण कितना अपरिहार्य है।
यह जीने की शर्त अनिवार्य है।
फिर हम सब क्यों कोताही करें?
क्यों न सब अपनी संततियों के लिए
कुछ समझदार बनें ,
जल को यूं ही न बर्बाद करें।


माली जी ने मुझे चेताया था।
कुछ कुछ अक्लमंद बनाया था।
थोड़ी सी लापरवाही ने लीची के पौधे की
जान ले ली थी।
भविष्य की समृद्धि पर भी
कुछ रोक लग गई थी।
बेशक इसे आदमी चंद रुपयों का नुकसान समझे,
पर सच यह है ,
पेड़ एक बार पल जाने पर
सालों साल समृद्धि का उपहार देते हैं!
वे जीवन को खुशहाली का वरदान भी देते हैं!!
२२/०३/२०२५.
Mar 22 · 38
अनुभव
जीवन में अनुभव
मित्र सरीखा होता है ,
बगैर अनुभव के
जीवन फीका फीका सा लगता है ,
इसमें प्रखरता
और तीखापन लाने के लिए
अनुभव का होना बहुत जरूरी है।
अनुभव
एक दिन में नहीं आता,
इसके लिए
जीवन की भट्ठी में
खुद को है तपाना पड़ता है,
तब कहीं जाकर
जीवन कुंदन बनता है,
वह सुख,समृद्धि और संपन्नता का
आधार बनता है।
अनुभव युक्त होने से
संसार का कारज व्यवहार
आगे बढ़ता है।
इस को अनुभूत करने के निमित्त
होना चाहिए शांत चित्त।
अतः मनुष्य अपनी दिनचर्या में
कठोर मेहनत को शामिल करे,
ताकि जीवन में आदमी
निरंतर आगे बढ़ता रहे।
आदमी अनुभव के बूते
सदैव चेतना युक्त
प्रगतिशील बना रहे,
वह संतुलित दृष्टिकोण
अपने जीवन में
विकसित कर सके ,
अपने व्यक्तित्व में निखार लाता रहे
और सब्र ,संतोष ,संतुष्टि को प्राप्त कर सके।
22/03/2025.
Mar 21 · 26
बेचना
किसी को
किसी के
ख़्वाब बेचना
आजकल
चोरी चकारी
कतई नहीं है,
यह अब एक कला है!
जिससे वह
तथाकथित जीनियस पला है !!
बुरा मत मानना
न ही बुरे को भूले से मनाना
यहाँ मना है ,
यहाँ हर कोई
निर्दोष के खून से सना है।
अब सब यहाँ व्यापारी हैं,
जिनके जेहन में
चोरी सीनाजोरी ही
नहीं बसी है,
वरन रग रग में मक्कारी है।
इस दुनिया के बाज़ार में
शराफ़त पग पग पर हारी है !
चोर चोर मौसेरे भाइयों से
लगा रखी मुनाफाखोरों ने यारी है  !!
मन में कहीं गहरे बसी अय्यारी है  !!
उनका वश चले तो आका को बेच खाएं !
यही नहीं बस ! वे गरीब के घर में भी सेंध लगाएं !
वे हर पल सुविधा ही नहीं ,दुविधा तक को बेचना चाहते हैं !
वे पक्के व्यापारी हैं, हर नायाब और वाहियात चीज़ को बेचने का हुनर रखते हैं !
वे बेचना चाहते हैं सब कुछ !
क्या श्रेष्ठ और क्या तुच्छ !
वे मोटी खाल वाले व्यापारी हैं !
और हम सब उनके मुनाफे की वज़ह !
जिन्हें वे भिखारी और आसान शिकार समझ करना चाहते जिब्ह बेवजह !!
बेचना पड़ेगा सभी को अपना सुख चैन, एक दिन उनके हाथों !
बचा ले अपना ईमान समय रहते ,भाई साधो !
बना न रह देर तक , कभी भी , मिट्टी का माधो !
वे चाहते हैं तुम्हे बेचना ,पर तुम सस्ते में खुद को न कभी बेचना।
बचा कर रख अपने पास ,अपना अनमोल धन चेतना।
अगर यह भी बिक गई तो बचेगी अपने पास महज वेदना।
अपनी संवेदना को आज सहेज कर रखना बेहद ज़रूरी है।
२१/०३/२०२५.
आदमी अपने अंतर्विरोधों से लड़े।
वह कभी तो
इनके खिलाफ़ खड़े होने का साहस जुटाए,
अन्यथा उसका जीवनाधार धीरे धीरे दरकता जाए।
इसे समझकर,
विषम परिस्थितियों में खुद को परखकर
जीवन के संघर्षों में जुटा जाता है,
हारी हुई बाज़ी को पलटा जाता है।
इतनी सी बात
यदि किसी की समझ में न आए,
तो क्या किया जा सकता है ?
ऐसे आदमी की बुद्धि पर तरस आता है।
जब आदमी को हार के बाद हार मिलती रहे,
तो उसे लगातार डराने लगता सन्नाटा है।
इस समय लग सकता है कि
कोई जीवन की राह में रुकावट बन आन खड़ा है,
जिसने यकायक स्तंभित करने वाला
झन्नाटेदार चांटा जड़ा है !!
गाल और अंतर्मन तक लाल हुआ है !!
मन के भीतर बवाल मचा है !!

आदमी को चाहिए कि
अब तो वह नैतिक साहस के साथ
जीवन में जूझने के निमित्त खड़ा हो
ताकि जीवन में पनप रहे
अंतर्विरोधों का सामना
वह कभी तो सतत् परिश्रम करते हुए करे,
कहीं यह न हो कि वह जीवन पर्यंत डरता रहे,
जीवन में कभी कुछ साहसिक और सार्थक न कर सके।
ऐसा मन को शांत रखना सीख कर सम्भव है।
इसकी खातिर शान्त चित्त होना अपरिहार्य है,
ताकि आदमी बेरोक टोक लक्ष्य सिद्धि कर सके,
वह जीवन की विषमताओं से मतवातर लड़ सके,
जीवन धारा के संग संघर्ष रत रहकर आगे बढ़ सके।
20/03/2025.
व्यर्थ का भाषा विवाद
न केवल
संवाद में
बाधक सिद्ध होता है ,
बल्कि
यह एक झूठ बोलने से भी अधिक
ख़तरनाक है ,
जो देश, दुनिया में
आदमी की अस्मिता पर
करता कुठाराघात है।
यही नहीं
यह समाज विशेष की
प्रगति को भी देता है रोक।
यह प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों में
उत्पन्न कर देता है
आदमी को
झकझोर देने में सक्षम
अंतर्चेतना को उद्वेलित करती
शोक की लहरें।

इस समय देश में
भाषा विवाद को
भड़काया जा रहा है ,
हिंदी का भय दिखलाकर
अपनी राजनीतिक रोटियों को
सेका जा रहा है।
कितना अच्छा हो , हिंदीभाषी भी
दक्षिण की भाषाएं सीख लें।
वे हिंदी में डब्ब की
दक्षिण भारत की फिल्में
मूल भाषा में देखकर
संस्कृति का आनंद उठाएं,
अपनी समझ बढ़ाएं।

एक  ऐसे समय में
जब कुछ भाषाएं
मरण शैय्या के नजदीक
विलुप्ति की कगार पर हैं,
तो क्यों न उनको अपनाया जाए।
क्यों व्यर्थ के भाषा प्रकरण पर
विवाद बढ़ाया जाए ?
आओ इस बाबत संवाद रचाया जाए।
राष्ट्रीय एकता के स्वरों से
देश को आगे बढ़ाया जाए।
२०/०३/२०२५.
कभी सुना था कि
आदमी की पहली शिक्षक
उसकी माँ है
जो उसे जीने का सलीका सिखाती है।
अभी अभी एक सुविचार
अख़बार के माध्यम से पढ़ा है कि
आपका सबसे अच्छा शिक्षक
वह व्यक्ति है , जो आपको सबसे
बड़ी चुनौती देता है।
सोचता हू
यह  विचार कितना विरोधाभास
मेरे भीतर भर गया।
माँ
अक्सर
बच्चे की बेहतरीन शिक्षिका होती है,
जो जन्म से जीवन में आगे बढ़ने तक
जीवन में निरन्तर
प्रेरणा बनी रहती है।
वह तो कभी चुनौती देती नहीं !
हाँ, किसी द्वारा चुनौती दिए जाने पर
संबल अवश्य बनती है।
माँ और समय,
दोनों को ही
इस विचार को
जीवन में कसौटी पर
खरा उतरते जरूर देखता हूँ।
जीवन यात्रा में
सबसे खरा शिक्षक समय है,
जो न केवल आदमी को चुनौती देता है,
बल्कि उसे उत्तरोत्तर समझदार और प्रखर बनाता है ,
और एक दिन जीवन वैतरणी के पार पहुँचा देता है।
समय सभी को सफलता की राह दिखा देता है।
२०/०३/२०२५.
धर्म का अर्थ जीवन को गति देने वाले नियमों और सिद्धांतों को अपनाना है।
उनको बिना किसी विरोध के मानते जाना है।
धार्मिक होना कुछ और ही होना है ,
यह किसी हद तक कांटों के बिछौने पर सोना है।
धार्मिक आदमी कतई सांप्रदायिक नहीं होता है,
उसे कभी इतनी फुर्सत नहीं होती कि किसी शर्त से बंध सके,
समाज में हिंसा और अराजकता फैला कर तनाव भर दे।
उसका रास्ता तो तनाव मुक्ति का पथ अपनाना है।
जो इस राह में रोड़ा बने ,उसे दरकिनार करते हुए अपने को आगे ले जाना है।
इसलिए मैं मानता हूं कि धार्मिक होना सरल नहीं है ,
यह अपने जीते जी जीने की इच्छा का अंत करना है,
यह गरल पीना है और खुल कर खुली किताब बनकर जीना है।
किसी किसी में धार्मिक बनने का जिगरा होता है ,
वरना सांप्रदायिक और अधार्मिक यानिकि नास्तिक हर कोई होता है,
बल्कि कह लीजिए एक भेड़चाल का शिकार होकर
अपने आप को नास्तिक कहना एक फैशन सा हो गया है।
हर प्राणी नचिकेता नहीं हो सकता ,
जो धर्म का मूल जान गया था,
अपने अहंकार को मिटा पाया था,
सच्ची धार्मिक विभूति बन पाया था।
बेशक आज हमें अपने इर्द गिर्द धार्मिकों की भीड़ नहीं जुटानी है,
जीवन धारा आगे गंतव्य पथ पर बढ़ानी है
ताकि आदमी की मनमानी रुके और वह सत्य के सम्मुख ही झुके।
१९/०३/२०२५.
अपनी ही मौज में आकर
यदि कोई
अपनी संभावना की खोज में
अग्रसर होना चाहता है
तो इससे अच्छी क्या बात होगी।
वह क्षण कितना महत्वपूर्ण होगा
जब आदमी की खुद से मुलाकात होगी।
आदमी अपनी संभावना का पता लगाएगा ,
वह अपने भीतर निहित
ऊर्जा का रूपांतरण कर पाएगा,
जीवन में
नव संचार कर जाएगा ,
वह अपने जीवन को सार्थक कर पाएगा।
हरेक स्थिति में आदमी जूझता रहे ,
जीवन के उतार चढ़ावों के बावजूद
वह सतत् आगे ही आगे बढ़ता रहे ,
देखना , वह अपनी संभावना को खोज पाएगा।
वह अपनी प्रसन्नता और संतोष के
मूल स्रोतों को ढूंढ ही लेगा।
वह अपनी अस्मिता को जान ही लेगा।
तदनंतर वह अपना कायाकल्प स्वत: कर लेगा।
जीवन संभावना की खोज से बंधा है।
यदि यह बंधन न रहे तो आदमजात भटक जाए !
वह जीवन की विषम परिस्थितियों में विचलित हो जाए !
उसकी घर वापसी की संभावना  संभवतः धूमिल हो जाए !
इसलिए यह जरूरी है कि आदमी शिद्दत से
जीवन में सफलता हासिल करने के प्रयास करे !
वह अपने जीवन की दिशा को निर्धारित करने की खातिर उद्यम करे !!
१८/०३/२०२५.
कुर्सी का आकर्षण
कितना प्रबल होता है, यह कुर्सी पर काबिज़
मानुष अच्छे से जानता है,
वह इसे अपने पास रखने की खातिर
सच्चे पर लांछन लगाता है,
और जब सच्चा घायल पंछी सा तड़पता है,
वह ज़ोर आजमाइश के साथ साथ
करता है उपहास और अट्टहास!
परन्तु सच्चा कुछ भी नहीं कर पाता है,
वह अपना सा मुँह लेकर रह जाता है।
कुर्सी की चाहत में
इतिहास की किताबें
कत्ल ओ गैरत की अनगिनत कहानियां
कहती हैं ,
बड़ी मुश्किल से
संततियां इस ज़ुल्मो सितम को सहती हैं।
आज इस देश में
हरेक आम और ख़ास आदमी
कुर्सी का सताया है,
जब तक समझते समझते समझ आती है
सत्ता की अंदरूनी बात
तब तक आदर्शों का सफ़ाया
हो जाता है,
आदमी के हिस्से पछतावा आता है।
कुर्सी की चाहत
मनुष्य को दानव बना देती है,
वह अपने आदर्शों और सिद्धांतों को
भूल भालकर समझौता करने को
होता है बाध्य।
कुर्सी को साधना बड़ा कठिन होता है,
जिसे यह मिल जाए ,
वह इस से बंध जाता है।
फिर कुर्सी ही सगी हो जाती है ,
बाकी सब कुछ पराया और अप्रासंगिक हो जाता है।
इसे बनाए रखने की खातिर
आदमी शतरंजी चालें चलने में
होना चाहता माहिर,
इस के लिए स्वतः आदमी
दिन प्रति दिन होता जाता शातिर।
जब अंततः एक दिन
कुर्सी अपनी वफादारी बदलती है,
तब कुर्सी का न होना अखरता है,
यह भीतर तरह तरह के डर भर देती है,
तब जाँच का आतंक भी
मतवातर मन के भीतर दहशत भरता है,
यह अंतिम श्वास तक न केवल नींद हरता है ,
बल्कि यह आदमी को हैरान,परेशान,अवाक करता है।
फिर भी दुनिया भर में कुर्सी की चाहत बढ़ रही है।
वह आदमी को देश, दुनिया और समाज से बेदखल भी करती है।
आदमी आजकल कुर्सीदास हो गया है ,
जिसे मिले कुर्सी ,वह कोहिनूर सा अनमोल नजर आता है।
वहीं मानस आजकल सभी को भाता है।
नहीं जानते कुर्सी के प्रशंसक कि
कुर्सी का क्रूरता से अटूट नाता है।
यह किसी पर दया नहीं करती।
कुर्सी बेशक देखने में कोमल लगे ,
यह निर्णय लेते समय कठोरता की मांग करती है।
१८/०३/२०२५.
पिता पुत्र में
होता है
हमेशा प्यार
और अगाध विश्वास !
कभी कभी
इस हद तक
कि दोनों लगते
एक साथ ले रहे हैं श्वास !
पिता पुत्र के बीच
कभी कभी
होता  है विवाद !
लेकिन थोड़ी देर में
वे मतभेद भुला कर
जीवन यात्रा की बाबत
स्थापित कर लेते संवाद !

अभी अभी
मेरे पिता ने
मुझे एक बिस्किट दिया ,
जिसे मैंने लेने से मना किया।
वज़ह बस यही कि
आज मेरा व्रत है ,
मैने उन्हें याद दिलाया कि...!
वे सब समझ गए कि...!
... मैं एक बार अन्न ग्रहण कर चुका हूँ ,
बेशक ! मैं आज्ञा पालन में अभी चुका नहीं हूँ !
जीवन में कुछ सिद्धांतों से
निज को बांधना भी व्रत होता है!
पिता और पुत्र का रिश्ता
नेह और स्नेह के बंधनों से बंधा है ,
जिससे से जीवन का सन्मार्ग साधे सधा है ,
पिता पुत्र का पवित्र रिश्ता बना है।

सोचिए ज़रा ,
उन के बीच होता है
कितना प्यार ?
उन्हें एक दूसरे का हित
जीने का आधार लगता है।
इस सूत्र से बंधा उनका जीवन
धीरे धीरे मान मनव्वल के संग बढ़ता है।
17/03/2025.
संबंध बड़े कोमल होते हैं
ये बनते बनते,बनते हैं
थोड़ी सी गफलत
हुई नहीं कि
धरधराकर
रेत से झर
जाते हैं,
यह
कभी हो
नहीं सकता कि
ये फिर से दृढ़ता की
डोर में बंध जाएं,
हम पूर्ववत
बेतकुल्ल्फी से
एक दूसरे से
खुलकर
मिल पाएं !
अब
आप ही बता दो
हम परस्पर
विश्वास को
दृढ़ करें
कि लड़ें !
क्यों न हम
एक दूसरे से
सहयोग करें ,
परस्पर
पुष्पित पल्लवित
होने के मौके
मयस्सर
करते रहें ,
आगे बढ़ें ,
सुध बुध
लेते रहें,
ताकि
दृढ़ होती रहें
संबंधों की जड़ें !
संबंध नाजुक होते हैं ,
गफलत हुई नहीं कि
ये मुरझा जाते हैं !
ऐसे में
सब तने तने रहते हैं !
भीतर , भीतर कुढ़ते रहते हैं !
न चाहकर भी
अंदर सहम भर जाता है !
अनिष्ट का वहम भरता रहता है !
आदमी हरपल सड़ता रहता है !!
१७/०३/२०२५.
Mar 17 · 42
जंगल राज
जंगल राज का ताज
जिसके पुरखों के सिर पर
कभी सजा था ,
उस वंश के
नौनिहाल के
मुखारविंद से
सुनने को मिले कि
राज में कानून व्यवस्था
चौपट है ।
यह सब कई बार अजीब सा
लगता है।
शुक्र है कि यह नहीं कहा गया ...
यह जंगलराज
राज के नसीब में
लिखा गया लगता है।
हर दौर में
व्यवस्था सुधार की और
बढ़ती है,परंतु कुटिलता
विकास को पटरी से
उतार दिया करती है।
ऐसे में सुशासन भी
कुशासन की प्रतीति
कराने लगता है !
यह आम आदमी के भीतर
डर पैदा कर देता है।
आदमी बदलाव के स्वप्न
देखने लगता है।
बदलाव हो भी जाता है ,
यह बदलाव बहुधा
जंगल राज लेकर आता है ,
इसका अहसास भी  बहुत देर बाद होता है ,
तब तक चमन लुटपिट चुका होता है,
जीवन का हरेक कोना
अस्त व्यस्त हो चुका होता है।
अच्छा है कि
नेतागण बयान देने से पहले
अपने गिरेबान में झांकें ,
और तत्पश्चात देश समाज और राज्य को
विकसित करने का बीड़ा उठाएं।
जीवन को सुख, समृद्धि और संपन्नता से भरपूर बनाएं।
जीवन को जंगल राज के गर्त में जाने से बचाएं।
१७/०३/२०२५.
इस बार होली पर
खूब हुड़दंग हुआ ,
पर मैं सोया रहा
अपने आप में खोया रहा।
कोई कुछ नया घटा ,
आशंका का कोई बादल फटा!
यह सब सोच बाद दोपहर
टी.वी.पर समाचार देखे सुने
तो मन में इत्मीनान था ,
देश होली और जुम्मे के दिन शांत रहा।
होली रंगों का त्योहार है ,
इसे सब प्रेमपूर्वक मनाएं।
किसी की बातों में आकर
नफ़रत और वैमनस्य को न फैलाएं।

बालकनी से बाहर निकल कर देखा।
प्रणव का मोटर साइकिल रंगों से नहाया था।
उस पर हुड़दंगियों ने खूब अबीर गुलाल उड़ाया था।

इधर उमर बढ़ने के साथ
रंगों से होली खेलने से करता हूँ परहेज़।
घर पर गुजिया के साथ शरबत का आनंद लिया।
इधर हुड़दंगियों की टोली उत्साह और जोश दिखलाती निकल गई।

दो घंटे के बाद प्रणव होली खेल कर घर आया था।
उसके चेहरे और बदन पर रंगों का हर्षोल्लास छाया था।
जैसे ही वह खुद को रंगविहीन कर बाथरूम से बाहर आया,
उसकी पुरानी मित्र मंडली ने उसे रंगों से कर दिया था सराबोर।

मैं यह सब देख कर अच्छा महसूस कर रहा था।
मन ही मन मैंने सौगंध खाई ,अगली होली पर
मैं कुछ अनूठे ढंग से होली मनाऊंगा।
कम से कम सोए रहकर समय नहीं गवाऊंगा।
कैनवास पर अपने जीवन की स्मृतियों को संजोकर
एक अद्भुत अनोखा अनूठा कोलाज बनाने का प्रयास करूंगा।

और हाँ, रंग पंचमी से एक दिन पूर्व होलिका दहन पर
एक  संगीत समारोह का आयोजन घर के बाहर करवाऊंगा।
उसमें समस्त मोहल्ला वासियों को आमंत्रित करूंगा।
उनके उतार चढ़ावों भरे जीवन में खुशियों के रंग भरूंगा।
१७/०३/२०२५.
वह इस भरे पूरे
संसार में
दुनियावी गोरखधंधे सहित
अपने वजूद के
अहसास के बावजूद
कभी कभी
खुद को
निपट अकेलेपन से
संघर्ष करते ,
जूझते हुए
पाता है ,
पर कुछ नहीं कर
पाता है,
जल्दी ही
थक जाता है।
वह ढूंढ रहा है
अर्से से सुख
पर...
उसकी चेतना से
निरन्तर दुःख लिपटते जा रहे हैं ,
उसे दीमक बनकर
चट करते जा रहे हैं।
जिन्हें वह अपना समझता है,
वे भी उससे मुख मोड़ते जा रहे हैं।
काश! उसे मिल सके
जीवन की भटकन के दौर में
सहानुभूति का कोई ओर छौर।
मिल सके उसे कभी
प्यार की खुशबू
ताकि मिट सके
उसके अपने किरदार के भीतर
व्यापी हुई बदबू और सड़ांध!
वह पगलाए सांड सा होकर
भटकने से बचना चाहता है ,
जीवन में दिशाहीन हो चुके
भटकाव से छुटकारा चाहता है।

कभो कभी
वह इस दुनियावी झंझटों से
उकता कर
एकदम रसविहीन हो जाता है ,
अकेला रह जाता है,
वह दुनिया के ताम झाम से ऊब कर
दुनिया भर की वासनाओं में डूबकर
घर वापसी करना चाहता है,
पर उस समझ नहीं आता है,
क्या करे ?
और कहां जाए ?
वह दुनिया के मेले को
एक झमेला समझता आया है।
फलत:
वह भीड़ से दूर
रहने में
जीवन का सुख ढूंढ़ रहा है,
अपना मूल भूल गया है।
वह अपने अनुभव से
उत्पन्न गीत
अकेले गाता आया है,
अपनी पीड़ा दूसरों तक नहीं
पहुँचा पाया है।
सच तो यह है कि
वह आज तक
खुद को व्यक्त नहीं कर पाया है।
यहाँ तक कि वह स्वयं को समझ नहीं पाया है।
खुद को जानने की कोशिशों को
मतवातर जारी रखने के बावजूद
निराश होता आया है।
वह नहीं जान पाया अभी तक
आखिर वह चाहता क्या है?
उसका होने का प्रयोजन क्या है?
निपट अकेला मानुष
कभी कभी
किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है,
वह खुद को असंमजस में पाता है।
अपनी बाबत कोई निर्णय नहीं कर पाता है।
सदैव उधेड़ बुन में लगा रहता है।
१६/०३/२०२५.
( १६/१२/२०१६).
Mar 16 · 32
काला दौर
आज से सालों पहले
मेरे विद्यार्थी जीवन के दौर में
मेरा शहर और राज्य
आतंक से ग्रस्त था ,
इससे हर कोई त्रस्त था।
किसान धरना लगाने के बहाने
शहर की सड़कों पर उतर आते थे,
जमकर उत्पात मचाते थे।
हम स्कूल और ट्यूशन से भागकर
तमाशा देखने जाते थे।
आगजनी, पथराव ,भाषणबाजी का
लुत्फ़ उठाते थे।
इससे भी पहले नक्सली लहर का
रहा सहा असर थोड़ा बहुत दिख जाता था,
उसके बाद पड़ोसी देश के साथ युद्ध ,
ब्लैक आउट डेज,
महंगाई ,
गरीबी हटाओ के नारे की आड़ में
गरीब हटाओ का काम ,
लड़ाई , झगड़ा , असंतोष ,
मिट्टी के तेल से खुद को आग लगाने का सिलसिला,
समाज में बढ़ता गिला शिकवा और शिकायत
और अंततः आपातकाल का दौर ,
फिर समाज में सत्ता परिवर्तन लेकर आया था नई भोर।
कुछ इस तरह के कालखंड से निकल
कॉलेज में पहुँचा था
तो उस समय आतंकवाद
चरम पर था,
हरेक के भीतर
डर भर गया था ,
जन साधारण को बसों से उतार
मारा जाने लगा था।
कुछ ऐसे उथल पुथल के
दौर से गुजरते हुए
अचानक एक समय
उच्च शिक्षा भी गई थी रुक।
और...
बेरोजगारी के दौर से गुज़र
एक अदद नौकरी का मिलना,
तन मन का खिलना
अब बीता समय हो गया है।
पर इस सब से पिछड़ने का अहसास
अब सेवा निवृत्ति के बाद भी
कभी कभी मन को अशांत करता है।

आज पॉडकास्ट का समय है
अभी अभी सुना है कि
विगत चार माह में
सूबे में आतंक की बारह के लगभग
बंब विस्फोट ,आतंक , आगजनी,कत्ल की वारदात
घटने और उसका प्रशासन पर दुष्प्रभाव की बाबत
सुन रहा था विचार विमर्श।
इसके साथ ही
पुलिस कर्मियों पर मुकदमा चलाए जाने ,
कुछ मामलों में आला और साधारण पुलिस कर्मियों के कैदी बनने की बात चली
तो मुझे आतंक के दमन का वह सुनहरा दौर याद आया ,
जब कांटे को कांटे से हटाया गया था,
धीरे धीरे अमन चैन , सामान्य हालात को क़ायम किया गया था।
आज भी उस नेक काम का दुष्परिणाम लोग भुगत रहे हैं ,
अब भी राज्य की अर्थ व्यवस्था कर्ज़े के जाल में धंसी है।
इस हालात में कौन प्रशासनिक नियन्त्रण क़ायम करे ?
वोट बैंक की राजनीति के चलते
मुफ़्त के लाभ देकर , ढीला ढाला शासन चलाया जा रहा है।
कोई मुख्य मंत्री को कोस रहा है तो कोई अधिकारियों को।
जबकि हकीकत यह है कि अच्छा काम करने वाला बुरा बनता है और पिटता है।
उस समय का काला दौर अब भी ज़ारी है।
यह दौर रोका जा सकता है!
अपराधी को टोका जा सकता है!!
जैसे को तैसा की नीति से ठोका जा सकता है!!!
पर सब के मन में डर है !
अच्छा करने के बावजूद यदि उपहास और त्रास मिला तो क्या होगा ?
स्वार्थों से चालित इस व्यवस्था का अंजाम दलदल में धंसने जैसा तो नहीं होगा !
सो काला दौर ज़ारी है।
अच्छे और सच्चे दौर की आमद के लिए
जन जागरण का हो रहा है इंतजार !
यह सच है कि देश दुनिया और समाज शुचिता की ओर बढ़ रहा है।
काला दौर भी किसी हद तक अपनी समाप्ति से भीतर ही भीतर डर रहा है।
१६/०३/२०२५.
हरेक को समझनी होगी
अपनी जिम्मेदारी।
हर पल करनी नहीं होगी
चालाकी और होशियारी।
यदि चाहते हैं सब,
जीवन पथ पर
आगे बढ़ना,
संघर्ष करना।
जीवन कभी नहीं रहा सरल,
बेशक इसमें बहुत कुछ दिख पड़ता है जटिल।
जिम्मेदारी का निर्वाह
जीवन के प्रवाह को गतिमान रखता है।
यह जीवन धारा को आगे बढ़ाने का कार्य करता है।
जिम्मेदार बनो।
इससे न टलो।
जवाबदेह बनो।
कर्मठ बनकर सम्पन्नता को
अपने जीवन में ले आओ।
दरिद्रता से छुटकारा पाने की करो कोशिश !
ताकि जीवन में बनी रहे गरिमा और कशिश !!
१६/०३/२०२५.
जीवन में
किसी से अपेक्षा रखना
ठीक नहीं,
यह है
अपने को ठगना।
यदि कोई आदमी
आपकी अपेक्षा पर
खरा उतरता नहीं है,
तो उसकी उपेक्षा करना,
है नितांत सही।
कभी कभी अपेक्षा
आदमी द्वारा
अचानक ही जब
जीवन की कसौटी पर
परखी जाती है
और यह सौ फीसदी
खरी उतरती नहीं है,
तब अपेक्षा उपेक्षा में बदल कर
मन के भीतर विक्षोभ
करती है उत्पन्न !
आदमी रह जाता सन्न !
वह महसूसता है स्वयं को विपन्न !
ऐसे में अनायास
उपेक्षा का जीवन में
हो जाता है प्रवेश!
जीवन पथ के
पग पग पर
होने लगता है कलह क्लेश !!

आदमी इस समय क्या करे ?
क्या वह निराशा में डूब जाए ?
नहीं ! वह अपना संतुलन बनाए रखे।
वह मतवातर खुद को तराशता जाए।
वह स्वयं को वश में करे !
वह उदास और हताश होने से बचे !
अपने इर्द गिर्द और आसपास से
हर्गिज़ हर्गिज़ उदासीन होने की
उसे जरूरत नहीं।
ऐसी किसी की कुव्वत नहीं कि
उसे उपेक्षा एक जिंदा शव में बदल दे ।
ऐसा होने से पहले ही आदमी अपने में
साहस और हिम्मत पैदा करे ,
वह अपनी आंतरिक मनोदशा को दृढ़ करे।
वह जीवन के उतार चढ़ावों और कठिनाइयों से न डरे।

अच्छा यही रहेगा कि वह कभी भी
अपेक्षा और उपेक्षा के पचड़ों में न ही पड़े ,
ताकि उसे ऐसी कोई अकल्पनीय समस्या
जीवन नदिया में बहते बहते झेलनी ही न पड़े।
मनुष्य को सदैव यह चाहिए कि
वह जीवन में किसी से भी
कभी कोई अपेक्षा न ही करे ,
जिससे समस्त मानवीय संबंध सुरक्षित रहें !
उसके सब संगी साथी जीवन की रणभूमि में डटे रहें !!
१५/०३/२०२५.
मटर छिलते समय
कभी नहीं आते आंसू ,
जबकि प्याज काटते समय
आँखें आंसुओं को बहाती है !
ऐसा क्यों ?
कुदरत भी अजीब है,
यह सब और सच के करीब है !
कोई बनता है मटर ,
कोई रुलाने वाला,
कोई कोई प्याज और टमाटर भी।
यह सब कुदरत का है खेल।
इसे देखता जा, और सीखता जा।
जीवन सभी से कहता है,
वह मतवातर समय के संग बहता है।

मटर छिलते समय
कोई कोई दाना छिपा रह जाता है,
मटर के छिलके
कूड़ेदान में फेंकते समय
मटर का दाना
अचानक दिख जाता है ,
आदमी सोचता है कभी कभी
यह कैसे बच गया ?
बिल्कुल इसी तरह
सच भी
स्वयं को
अनावृत्त करने से
रह जाता है,
वह मटर के दाने की तरह
पकड़ में आने से बच जाता है।
15/03/2025.
छोटी और लाडली कार को
होली का कोई हुड़दंगी
चोट पहुँचा गया
जब अचानक,
दर्द से बेहाल
अंदर से
आवाज़
आई तब,
"होली मुबारक !"
मन में
उस समय
क्रोध उत्पन्न हुआ ,
मैं थोड़ा सा खिन्न हुआ !
मैंने खुद से  कहा ,
" कमबख्त पाँच हज़ार की
चपत लगा गया !
होली के दिन
मन के भीतर
सुख सुविधा से उत्पन्न
अहंकार की वाट लगा गया !"
मेरी तो होली हो ली जी!
अब सी सी कर के
क्या मिलेगा जी!
यह सोच मन को समझा लिया
और पल भर में
दुनियादारी में
मन लगा
लिया।
१४/०३/२०२५.
यदि कोई अच्छा हो या बुरा ,
वह पूरा हो या आधा अधूरा।
उसे कोसना कतई ठीक नहीं ,
संभव है वह धूरा बने कभी।

हर जीव यहाँ धरा पर है कुछ विशेष
अच्छे के निमित्त,हुआ हो वह अवतरित।
हो सकता है वह अभी भटक रहा हो ,
उसे मंज़िल पर पहुंचाओ, करें पथ प्रदर्शित।

सब लक्ष्य सिद्धि को हासिल कर सकें ,
आओ , हम उनकी राह को आसान करें।
हम उनकी संभावना को सदैव टटोलते रहें ,
इसके लिए सब मतवातर प्रयास करते रहें।

किसी को कोसना और कुछ करने से से रोकना,
कदापि सही नहीं, हम प्रोत्साहित करें तो सही।
१४/०३/२०२५.
कभी कभी
रंगों से गुरेज़ करने वाले को
अपने ऊपर
रंगों की बौछार
सहन करनी पड़ती है।
यही होली की
मस्ती है।
अपने को एक कैनवास में
बदलना पड़ता है
कि कोई चुपके से आए ,
रंग लगाए ,
अपनी जगह बनाए ,
और रंग लगा
चोरी चोरी
खिसक जाए ,
इस डर से
कि कोई सिसक न जाए।
विरह में सिसकारी ,
मिलन में पिचकारी ,
होली के रंग ही तो हैं।
ये अबीर और गुलाल बनकर
कब अंतर्मन को रंग देते हैं !
पता ही नहीं चलता !!
कभी कभी
होली आती है
और हो ली होकर
निकल जाती है।
पता ही नहीं चलता !
जब तक मन में
मौज है,
उमंग तरंग है ,
खेल ली जाए होली ।
जीवन में रंगों और बेरंगों के
बीच चलती रहे
आँख मिचौली !
ऐसी  कामना कीजिए !
अबीर की सौगात
ख़ुशी ख़ुशी
जिन्दगी की झोली में
डालिए
और हो सके तो
आप अपने भीतर
जीवन के रंगों सहित
अपने भीतर झांकिए
ताकि अंतर्मन से मैल धुल जाए !
चेहरा भी मुस्कुराता हुआ खिल पाए !!
अब की होली सब डर
पीछे छोड़कर
मस्ती कर ली जाए!
क्या पता अनिश्चितता के दौर में
कब आदमी की
हस्ती मिट जाए!
क्या पता पछतावा भी
हाथ न आए !
क्यों न जिन्दगी खुलकर
जी ली जाए !
होली भी हो ली हो जाए !!
१४/०३/२०२५.
आदमी
जब तक
नासमझ बना
रहता है ,
छोटी छोटी बातों पर
अड़ा रहता है ।
जैसे ही
वह समझता है
जीवन का सच ,
वह एक सुरक्षा कवच में
सिमट जाता है ,
जिंदगी में
समय रहते
समझौता करना
सीख जाता है ,
सुखी और सुरक्षित
रहता है।
भूल कर भी
बात बात पर
अकड़ दिखाने से
करता है गुरेज।
वह जीवन की
समझ निरंतर
बढ़ाता रहता है।
एक समय आता है ,
वह समझौता
बेहद आसानी से
कर पाता है ,
वह बिना कोई हेर फेर किए
स्वयं को संतुलित और
समायोजित कर लेता है ,
शांत रहना सीख जाता है ,
दिल और दिमाग से
समझौताबाज़ बन जाता है।
वह किसी भी हद तक
सहनशील बना रहता है ,
फल स्वरूप जीवन भर
फलता फूलता जाता है ,
समझौता करने में
गनीमत समझता है।
अतः सुख का आकांक्षी
जीवन में समझौता कर ले ,  
समय रहते समझदारी वर ले।
यह सच है कि
यदि वह समय पर समझौता कर ले ,
तो स्वत: स्वयं को सुखी कर ले।
१४/०३/२०२५.
" हमें
जीवन में  
ज़ोर आजमाइश नहीं
बल्कि
जिन्दगी की
समझाइश चाहिए ।"
सभी से
कहना चाहता है
आदमी का इर्द गिर्द
और आसपास ,
ताकि कोई बेवजह
जिन्दगी में न हो कभी जिब्ह ,
उसके परिजन न हों कभी उदास।
पर कोई इस सच को
सुनना और मानना नहीं चाहता।
सब अपने को सच्चा मानते हैं
और अपने पूर्वाग्रहों की खातिर
अड़े खड़े हैं, वे स्वयं को
जीवन से भी बड़ा मानते हैं।
और जीवन उनकी हठधर्मिता को
निहायत गैर ज़रूरी मानता है ,
इसलिए
कभी कभी वह
नाराज़गी के रुप में
अपनी भृकुटि तानता है ,
पर जल्दी ही
चुप कर जाता है।
उसे आदमी की
इस कमअक्ली पर तरस आता है।
पर कौन
उसकी व्यथा को
समझ पाता है ?
क्या जीवन कभी
हताश और निराश होता है ?
वह स्वत: आगे बढ़ जाता है।
जीवन धारा का रुकना मना है।
जीवन यात्रा रुकी तो समय तक ख़त्म !
इसे जीवन भली भांति समझता है,
अतः वह आगे ही आगे बढ़ता रहता है।
समय भी उसके साथ क़दम ताल करता हुआ
अपने पथ पर  सतत अग्रसर रहता है।
Mar 13 · 76
फीकी चाय
जिन्दगी से मिठास
यकायक चली जाए
तो यह किसे भाए ?
यह फीकी चाय जैसी हो जाए।
कीजिए आप सब
अपने सम्मिलित प्रयासों से
जीवन में मधुरता लाने का उपाय।
जिन्दगी से मिठास
कभी भी यकायक
नहीं जाया करती ,
यह जाने से पहले
दिनचर्या से जुड़े
छोटे छोटे इशारे
अवश्य है किया करती।
यह भी सच है कि
जिन्दगी अपनी रफ़्तार
और अंदाज़ से
है सदैव
आगे बढ़ा करती।
आप से अनुरोध है कि
जीवन में
न किया कीजिए
सकारात्मक सोच का विरोध
बात बात पर
ताकि सहिष्णुता बची रहे ,
जिन्दगी में उमंग तरंग बची रहे।
जीवन की मिठास आसपास बनी रहे।
जीवन यात्रा में सुख समृद्धि की आस बनी रहे।
१३/०३/२०२५.
आज किसान बेचारा नज़र आता है।
वह शोषण का शिकार बनाया जा रहा है।
ऐसा क्यों ? सोचिए , इस बाबत कुछ करिए ज़रा।
किसान कब तक बना रहेगा बेचारा और बेसहारा ?

उसकी मदद कैसे हो ?
उसकी लाचारी कैसे दूर हो ?
यदि उस की उपज खेत से
सीधे बाज़ार भाव पर खरीद ली जाए ?
और थोड़ा खर्चा करके उपभोक्ता से वसूल ली जाए
तो क्या हो ?
कम से कम किसान इससे सुखी रहेगा।
उपभोक्ता अपने द्वारा की गई
अनावश्यक भोजन की बर्बादी को रोक ले ,
तो यकीनन देश की आर्थिकता दृढ़ होगी।
किसान की चिंताएं धीरे धीरे खत्म होंगी।
इसके साथ ही भ्रष्टाचार में भी शनै: शनै: कमी होगी।
किसान की मदद
उपभोक्ता की सदाशयता से
बिना किसी तनाव ,दुराव ,छिपाव के की जा सकती है।
इस राह पर बढ़ कर ही किसान और समाज की तक़दीर
बदली जा सकती है।
संपन्नता,सुख , समृद्धि और सुविधाएं
बगैर किसी देरी किए खोजी जा सकती हैं।
१३/०३/२०२५.
सच है
आजकल
हर कोई
कर्ज़ के जाल में
फँस कर छटपटा रहा है ,
वह इस अनचाहे
जी के जंजाल से
बच नहीं पा रहा है।

दिखावे के कारण
कर्ज़ के मर्ज में जकड़े जाना,
किसी अदृश्य दैत्य के हाथों से
छूट न पाना करता है विचलित।
कभी कभी
आदमी
असमय
अपनी जीवन लीला
कर लेता है
समाप्त ,
घर भर में
दुःख जाता है
व्याप्त।
आत्महत्या है पाप ,
यह फैलाता है समाज में संताप।
सोचिए , इससे कैसे बचा जाए ?
क्यों न मन पर पूर्णतः काबू पाया जाए ?
दिखावा भूल कर भी न किया जाए ।
जिन्दगी को सादगी से ही जीया जाए।
कर्ज़ लेकर घी पीने और मौज करने से बचा जाए।
क्यों बैठे बिठाए ख़ुद को छला जाए ?
क्यों न मेहनत की राह से जीवन को साधन सम्पन्न किया जाए ?
कर्ज़ के मर्ज़ से
जहां तक संभव हो , बचा जाए !
महत्वाकांक्षाओं के चंगुल में न ही फंसा जाए !
कर्ज़ के पहाड़ के नीचे दबने से पीछे हटा जाए !!
कम खाकर गुजारा बेशक कर लीजिए।
हर हाल में कर्ज़ लेने से बचना सीखिए।
१३/०३/२०२५.
Next page