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Avanish maurya Mar 2019
अपनी तबियत सबसे यूँ मिलती ना थी...
कमरे में खिड़की तो थी, खुलती ना थी...

हम अपनी मर्जी के मालिक होते थे...
अच्छे-अच्छों की हम पर गलती ना थी...

पहले तो बस दिन होता था या की रात..
शाम कभी इस दर पे तो गलती ना थी...

यारों से मिलना-जुलना जो जाता था..
क़िल्लत भी होती थी तो गलती ना थी...

अब तुम इस को अहम कहो या खुद्दारी...
माफ़ी कैसे माँगता जब ग़लती ना थी..
Avanish maurya Mar 2019
हादसों की हक़ीक़त में
ख्वाबों की बात करते हो
खुद को है जलना अब
चिरागों की बात करते हो
फुरसत में हिसाब लगाना
रोटी और पोथी का
करोड़ों की गरीबी में
नवाबों की बात करते हो
Avanish maurya Mar 2019
तेरी यादों का अब कोई पेहरेदार नहीं मिलता,
बचपन की शामों सा अब इतवार नहीं मिलता..
Avanish maurya Feb 2019
हाँथो   में   यहाँ   नश्तर   है  कई,
इक   आईना  है  पत्थर   है  कई।

ऐ  ख़ुदा  ये  ग़ज़ब का घर है तिरा,
इक माह है फ़क़त अख़्तर है कई।

अब  जीना यहाँ मुमकिन ही नहीं,
इक  मैं  हूँ सफ-ए-लश्कर है कई।

ये  जो  सीढ़ियों   सी   है  जिंदगी,
उतरिये  संभल  के ठोकर है कई।

मेरी  ख़बर  ही  न  रही  यारों को,
कहने  को  मिरे  दिलबर  है  कई।

रंजन उलझन ये किसपर हो यकीं,
इक  राही   यहाँ   रहबर   है  कई।

नश्तर--नुकीला खंजर, माह-- चाँद,
अख़्तर-- सितारे, रहबर-- मार्गदर्शक
सफ-लश्कर-- दुश्मन के फौज़ की लाइने
Ghazal
Avanish maurya Sep 2018
बे-नूर पड़ा है शहर मेरा...
बरसों से दीवाली आई कहाँ?
.
.
.
चले हो जबसे यूँ होकर बेगाने,
फ़िर मुझमे रूहानी आयी कहाँ?..
Avanish maurya Sep 2018
अभी सूरज नहीं डूबा ज़रा सी
शाम होने
दो ''

मैं खुद लौट जाऊँगा मुझे
नाकाम होने दो ''

मुझे बदनाम करने का बहाना
क्यों ढूँढते हो ''

मैं खुद बदनाम हो जाऊंगा
पहले नाम
       तो होने दो ''
Poem
Avanish maurya Aug 2018
बर्फीली रातों में मुझे भागना  है
ज़िन्दगी जीने लायक मेरी आज ना है
पर यकीन है तक़दीर बदलेगी मेरी
सोना नहीं है मुझे जागना है


वज़ूद नहीं दुनिया की नज़र में कहीं
पर मिला के आँख सूरज को भी ताकना हैं
बिखर जाए किसी के पत्थर से हम वो काँच नहीं हैं
सोना नहीं हैं मुझे जागना है..
अर्श-
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