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उसके दु:साहस के समक्ष गन्धर्व यक्ष भी मांगे पानी, मर्यादा सब धूल धूसरित ऐसा था दम्भी अभिमानी ? संधि वार्ता के प्रति उत्तर  में कैसा वो सन्देश दिया ? दे डाल कृष्ण को कारागृह में उसने ये आदेश किया। प्रभु राम की पत्नी  का  जिसने मनमानी  हरण किया, उस अज्ञानी साथ राम ने प्रथम शांति का वरण किया। ज्ञात  उन्हें  था  अभिमानी को  मर्यादा का ज्ञान नहीं, वध करना था न्याय युक्त बेहतर कोई इससे त्राण नहीं। फिर भी मर्यादा प्रभु राम ने एक अवसर प्रदान किया, रण  तो होने को ही था पर अंतिम  एक निदान दिया। रावण भी दुर्योधन तुल्य हीं निरा मूर्ख था अभिमानी, पर मर्यादा पुरुष राम थे निज के प्रज्ञा की हीं मानी। था विदित राम को कि रण में भाग्य मनुज का सोता है, नर  जो  भी लड़ते कटते है अम्बर शोणित भर रोता है। इसी हेतु तो प्रभु राम ने अंतिम एक प्रयास किया, सन्धि में था संशय किंतु किंचित एक कयास किया। दूत बना के भेजा किस को रावण सम जो बलशाली, वानर श्रेष्ठ वो अंगद जिसका पिता रहा वानर बालि। महावानर बालि जिसकी क़दमों में रावण रहता था, अंगद के पलने में जाने नित क्रीड़ा कर फलता था। उसी बालि के पुत्र दूत बली अंगद को ये काम दिया, पैर डिगा ना पाया रावण  क्या अद्भुत पैगाम दिया। दूत  बली अंगद हो  जिसका सोचो राजा क्या होगा, पैर दूत का हिलता ना रावण रण में फिर क्या होगा? अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 19, 2021
May 19, 2021 at 10:47 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-3
उसके दु:साहस के समक्ष गन्धर्व यक्ष भी मांगे पानी, मर्यादा सब धूल धूसरित ऐसा था दम्भी अभिमानी ? संधि वार्ता के प्रति उत्तर  में कैसा वो सन्देश दिया ? दे डाल कृष्ण को कारागृह में उसने ये आदेश किया। प्रभु राम की पत्नी  का  जिसने मनमानी  हरण किया, उस अज्ञानी साथ राम ने प्रथम शांति का वरण किया। ज्ञात  उन्हें  था  अभिमानी को  मर्यादा का ज्ञान नहीं, वध करना था न्याय युक्त बेहतर कोई इससे त्राण नहीं। फिर भी मर्यादा प्रभु राम ने एक अवसर प्रदान किया, रण  तो होने को ही था पर अंतिम  एक निदान दिया। रावण भी दुर्योधन तुल्य हीं निरा मूर्ख था अभिमानी, पर मर्यादा पुरुष राम थे निज के प्रज्ञा की हीं मानी। था विदित राम को कि रण में भाग्य मनुज का सोता है, नर  जो  भी लड़ते कटते है अम्बर शोणित भर रोता है। इसी हेतु तो प्रभु राम ने अंतिम एक प्रयास किया, सन्धि में था संशय किंतु किंचित एक कयास किया। दूत बना के भेजा किस को रावण सम जो बलशाली, वानर श्रेष्ठ वो अंगद जिसका पिता रहा वानर बालि। महावानर बालि जिसकी क़दमों में रावण रहता था, अंगद के पलने में जाने नित क्रीड़ा कर फलता था। उसी बालि के पुत्र दूत बली अंगद को ये काम दिया, पैर डिगा ना पाया रावण  क्या अद्भुत पैगाम दिया। दूत  बली अंगद हो  जिसका सोचो राजा क्या होगा, पैर दूत का हिलता ना रावण रण में फिर क्या होगा? अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
रामायण में जिक्र आता है कि रावण के साथ युद्ध शुरू होने से पहले प्रभु श्रीराम ने उसके पास अपना दूत भेजा ताकि शांति स्थापित हो सके। प्रभु श्री राम ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि युद्ध विध्वंश हीं लाता है । वो जान रहे थे कि युद्ध में अनगिनत मानवों , वानरों , राक्षसों की जान जाने वाली थी । इसीलिए रावण के क्रूर और अहंकारी प्रवृत्ति के बारे में जानते हुए भी उन्होंने सर्वप्रथम शांति का प्रयास किया क्योंकि युद्ध हमेशा हीं अंतिम पर्याय होता है। शत्रु पक्ष पे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए अक्सर एक मजबूत व्यक्तित्व को हीं दूत के रूप में भेजा जाता रहा है। प्रभु श्रीराम ने भी ऐसा हीं किया, दूत के रूप में भेजा भी तो किसको बालि के पुत्र अंगद को। ये वो ही बालि था जिसकी काँख में रावण 6 महीने तक रहा।  कहने का तात्पर्य ये है कि शांति का प्रस्ताव लेकर कौन जाता है, ये बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता  "दुर्योधन कब मिट पाया" का तृतीय  भाग।
ajayamitabh7
Written by
40/M/Delhi, India
May 19, 2021
May 19, 2021 at 10:47 AM UTC
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