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#mahabharata
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा । या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा का ओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:40 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-32
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा । या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा का ओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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क्या यत्न करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का मार्ग दिखाती थी। अकिलेश्वर को हरना दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था मार्ग अति दू:साध्य कहीं। अतिशय साहस संबल संचय करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। अति वेदना थी तन में निज मस्तक अग्नि धरने में , पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में? जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे? या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? हठ मेरा वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन को जिद मेरी थी कैसी पर था भान कहीं। हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। गणादिप का संबल पा था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने या उनसे लड़ मरने का। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:36 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-31
क्या यत्न करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का मार्ग दिखाती थी। अकिलेश्वर को हरना दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था मार्ग अति दू:साध्य कहीं। अतिशय साहस संबल संचय करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। अति वेदना थी तन में निज मस्तक अग्नि धरने में , पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में? जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे? या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? हठ मेरा वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन को जिद मेरी थी कैसी पर था भान कहीं। हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। गणादिप का संबल पा था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने या उनसे लड़ मरने का। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ , शिलाधिस्त हो तृणालंबितलक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ। एक पाद का दृढ़ालंबन ना कल्पों हो सकता था , नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी होना हो सकता था। ना सुयोग था ऐसा अर्जुन जैसा मैं पुरुषार्थ रचाता, भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता। अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे लाता? मंत्रोच्चारित यज्ञ रचाकर मन चाहा वर को पाता? इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु की बाहों में, अस्त्र शस्त्र प्रचंड अति होते प्रकटित निगाहों में। निज बाहू गांडीव पार्थ धर सज्जित होकर आ जाता, निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता। भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं, धर्म राज और सहदेव से था कतिपय अनजान नहीं। एक रात्रि हीं पहर बची थी उसी पहर का रोना था , शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था। अगर रात्रि से पहले मैने महाकाल ना तुष्ट किया, वचन नहीं पूरा होने को समझो बस अवयुष्ट किया। महादेव को उस हीं पल में मन का मर्म बताना था, जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:31 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:30
वक्त नहीं था चिरकाल तक टिककर एक प्रयास करूँ , शिलाधिस्त हो तृणालंबितलक्ष्य सिद्ध उपवास करूँ। एक पाद का दृढ़ालंबन ना कल्पों हो सकता था , नहीं सहस्त्रों साल शैल वासी होना हो सकता था। ना सुयोग था ऐसा अर्जुन जैसा मैं पुरुषार्थ रचाता, भक्ति को हीं साध्य बनाके मैं कोई निजस्वार्थ फलाता। अतिअल्प था काल शेष किसी ज्ञानी को कैसे लाता? मंत्रोच्चारित यज्ञ रचाकर मन चाहा वर को पाता? इधर क्षितिज पे दिनकर दृष्टित उधर शत्रु की बाहों में, अस्त्र शस्त्र प्रचंड अति होते प्रकटित निगाहों में। निज बाहू गांडीव पार्थ धर सज्जित होकर आ जाता, निश्चिय हीं पौरुष परिलक्षित लज्जित करके हीं जाता। भीमनकुल उद्भट योद्धा का भी कुछ कम था नाम नहीं, धर्म राज और सहदेव से था कतिपय अनजान नहीं। एक रात्रि हीं पहर बची थी उसी पहर का रोना था , शिवजी से वरदान प्राप्त कर निष्कंटक पथ होना था। अगर रात्रि से पहले मैने महाकाल ना तुष्ट किया, वचन नहीं पूरा होने को समझो बस अवयुष्ट किया। महादेव को उस हीं पल में मन का मर्म बताना था, जो कुछ भी करना था मुझको क्षणमें कर्म रचाना था। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया, भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया। अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ, आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ। भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता, वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता। एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा, नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा। सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी, भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी। उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया? पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया? कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है। पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था, कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था। विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे, अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे। बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था, यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:27 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-29
कभी बद्ध प्रारब्द्ध काम ने जो शिव पे आघात किया, भस्म हुआ क्षण में जलकर क्रोध क्षोभ हीं प्राप्त किया। अन्य गुण भी ज्ञात हुए शिव हैं भोले अभिज्ञान हुआ, आशुतोष भी क्यों कहलाते हैं इसका प्रतिज्ञान हुआ। भान हुआ था शिव शंकर हैं आदि ज्ञान के विज्ञाता, वेदादि गुढ़ गहन ध्यान और अगम शास्त्र के व्याख्याता। एक मुख से बहती जिनके वेदों की अविकल धारा, नाथों के है नाथ तंत्र और मंत्र आदि अधिपति सारा। सुर दानव में भेद नहीं है या कोई पशु या नर नारी, भस्मासुर की कथा ज्ञात वर उनकी कैसी बनी लाचारी। उनसे हीं आशीष प्राप्त कर कैसा वो व्यवहार किया? पशुपतिनाथ को उनके हीं वर से कैसे प्रहार किया? कथ्य सत्य ये कटु तथ्य था अतिशीघ्र तुष्ट हो जाते है जन्मों का जो फल होता शिव से क्षण में मिल जाते है। पर उस रात्रि एक पहर क्या पल भी हमपे भारी था, कालिरात्रि थी तिमिर घनेरा काल नहीं हितकारी था। विदित हुआ जब महाकाल से अड़कर ना कुछ पाएंगे, अशुतोष हैं महादेव उनपे अब शीश नवाएँगे। बिना वर को प्राप्त किये अपना अभियान ना पूरा था, यही सोच कर कर्म रचाना था अभिध्यान अधुरा था। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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तीव्र वेग से वह्नि आती क्या तुम तनकर रहते हो? तो भूतेश से अश्वत्थामा क्यों ठनकर यूँ रहते हो? क्यों युक्ति ऐसे रचते जिससे अति दुष्कर होता ध्येय, तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय? जो विपक्ष को आन खड़े है तुम भैरव निज पक्ष करो। और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष करो। निष्प्रयोजन लड़कर इनसे लक्ष्य रुष्ट क्यों करते हो? विरुपाक्ष भोले शंकर भी तुष्ट नहीं क्यों करते हो? और विदित हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी, रूद्रपति का अंश है तुझमे तुम अनश्वर अविनाशी। ध्यान करो जो अशुतोष हैं हर्षित होते अति सत्वर, वो तेरे चित्त को उत्कंठित दान नहीं क्यों करते वर? जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं, वक्त पड़े तो झुक जाने में ना खोता स्वाभिमान कहीं। अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ, महादेव परितुष्ट करो और मनचाहा तुम वर पाओ। तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना , स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना। निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व बाहु अभिमान रहा, पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:22 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-28
तीव्र वेग से वह्नि आती क्या तुम तनकर रहते हो? तो भूतेश से अश्वत्थामा क्यों ठनकर यूँ रहते हो? क्यों युक्ति ऐसे रचते जिससे अति दुष्कर होता ध्येय, तुम तो ऐसे नहीं हो योद्धा रुद्र दीप्ति ना जिसको ज्ञेय? जो विपक्ष को आन खड़े है तुम भैरव निज पक्ष करो। और कर्म ना धृष्ट फला कर शिव जी को निष्पक्ष करो। निष्प्रयोजन लड़कर इनसे लक्ष्य रुष्ट क्यों करते हो? विरुपाक्ष भोले शंकर भी तुष्ट नहीं क्यों करते हो? और विदित हो तुझको योद्धा तुम भी तो हो कैलाशी, रूद्रपति का अंश है तुझमे तुम अनश्वर अविनाशी। ध्यान करो जो अशुतोष हैं हर्षित होते अति सत्वर, वो तेरे चित्त को उत्कंठित दान नहीं क्यों करते वर? जय मार्ग पर विचलित होना मंजिल का अवसान नहीं, वक्त पड़े तो झुक जाने में ना खोता स्वाभिमान कहीं। अभिप्राय अभी पृथक दृष्ट जो तुम ना इससे घबड़ाओ, महादेव परितुष्ट करो और मनचाहा तुम वर पाओ। तब निज अंतर मन की बातों को सच में मैंने पहचाना , स्वविवेक में दीप्ति कैसी उस दिन हीं तत्क्षण ये जाना। निज बुद्धि प्रतिरुद्ध अड़ा था स्व बाहु अभिमान रहा, पर अब जाकर शिवशम्भू की शक्ति का परिज्ञान हुआ। अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार? मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ? जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है? एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है? जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं, गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं। इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं , कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं। अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं, विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं। दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है, स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है। जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे , उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे? जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की, उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी। पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है, साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है। व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है, द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है? लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है , अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है। सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में , किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:18 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-27
एक प्रत्यक्षण महाकाल का और भयाकुल ये व्यवहार? मेघ गहन तम घोर घनेरे चित्त में क्योंकर है स्वीकार ? जीत हार आते जाते पर जीवन कब रुकता रहता है? एक जीत भी क्षण को हीं हार कहाँ भी टिक रहता है? जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं, गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं। इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं , कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं। अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं, विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं। दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है, स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है। जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे , उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे? जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की, उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी। पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है, साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है। व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है, द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है? लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है , अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है। सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में , किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ? आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ, महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से, वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से? ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला, चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला। ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा, नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा। अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला, मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला। हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था , नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था? मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का, पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का। जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे? महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे? विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था, हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था। निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी , उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी। कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया , निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया। युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई , विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:10 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-26
शिव शम्भू का दर्शन जब हम तीनों को साक्षात हुआ? आगे कहने लगे द्रोण के पुत्र हमें तब ज्ञात हुआ, महा देव ना ऐसे थे जो रुक जाएं हम तीनों से, वो सूरज क्या छुप सकते थे हम तीन मात्र नगीनों से? ज्ञात हमें जो कुछ भी था हो सकता था उपाय भला, चला लिए थे सब शिव पर पर मसला निरुपाय फला। ज्ञात हुआ जो कर्म किये थे उसमें बस अभिमान रहा, नर की शक्ति के बाहर हैं महा देव तब भान रहा। अग्नि रूप देदिव्यमान दृष्टित पशुपति से थी ज्वाला, मैं कृतवर्मा कृपाचार्य के सन्मुख था यम का प्याला। हिमपति से लड़ना क्या था कीट दृश जल मरना था , नहीं राह कोई दृष्टि गोचित क्या लड़ना अड़ना था? मुझे कदापि क्षोभ नहीं था शिव के हाथों मरने का, पर एक चिंता सता रही थी प्रण पूर्ण ना करने का। जो भी वचन दिया था मैंने उसको पूर्ण कराऊँ कैसे? महादेव प्रति पक्ष अड़े थे उनसे प्राण बचाऊँ कैसे? विचलित मन कम्पित बाहर से ध्यान हटा न पाता था, हताशा का बादल छलिया प्रकट कभी छुप जाता था। निज का भान रहा ना मुझको कि सोचूं कुछ अंदर भी , उत्तर भीतर छुपा हुआ है झांकूँ चित्त समंदर भी। कृपाचार्य ने पर रुक कर जो थोड़ा ज्ञान कराया , निजचित्त का अवबोध हुआ दुविधा का भान कराया। युद्ध छिड़े थे जो मन में निज चित्त ने मुक्ति दिलाई , विकट विघ्न था पर निस्तारण हेतु युक्ति सुझाई। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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किससे लड़ने चला द्रोण पुत्र थोड़ा तो था अंदेशा, तन पे भस्म विभूति जिनके मृत्युमूर्त रूप संदेशा। कृपिपुत्र को मालूम तो था मृत्युंजय गणपतिधारी, वामदेव विरुपाक्ष भूत पति विष्णु वल्लभ त्रिपुरारी। चिर वैरागी योगनिष्ठ हिमशैल कैलाश के निवासी, हाथों में रुद्राक्ष की माला महाकाल है अविनाशी। डमरूधारी के डम डम पर सृष्टि का व्यवहार फले, और कृपा हो इनकी जीवन नैया भव के पार चले। सृष्टि रचयिता सकल जीव प्राणी जंतु के सर्वेश्वर, प्रभु राम की बाधा हरकर कहलाये थे रामेश्वर। तन पे मृग का चर्म चढाते भूतों के हैं नाथ कहाते, चंद्र सुशोभित मस्तक पर जो पर्वत ध्यान लगाते। जिनकी सोच के हीं कारण गोचित ये संसार फला, त्रिनेत्र जग जाए जब भी तांडव का व्यापार फला। अमृत मंथन में कंठों को विष का पान कराए थे, तभी देवों के देव महादेव नीलकंठ कहलाए थे। वो पर्वत पर रहने वाले हैं सिद्धेश्वर सुखकर्ता, किंतु दुष्टों के मान हरण करते रहते जीवन हर्ता। त्रिभुवनपति त्रिनेत्री त्रिशूल सुशोभित जिनके हाथ, काल मुठ्ठी में धरते जो प्रातिपक्ष खड़े थे गौरीनाथ। हो समक्ष सागर तब लड़कर रहना ना उपाय भला, लहरों के संग जो बहता है होता ना निरुपाय भला। महाकाल से यूँ भिड़ने का ना कोई भी अर्थ रहा, प्राप्त हुआ था ये अनुभव शिवसे लड़ना व्यर्थ रहा। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:06 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया: भाग:25
किससे लड़ने चला द्रोण पुत्र थोड़ा तो था अंदेशा, तन पे भस्म विभूति जिनके मृत्युमूर्त रूप संदेशा। कृपिपुत्र को मालूम तो था मृत्युंजय गणपतिधारी, वामदेव विरुपाक्ष भूत पति विष्णु वल्लभ त्रिपुरारी। चिर वैरागी योगनिष्ठ हिमशैल कैलाश के निवासी, हाथों में रुद्राक्ष की माला महाकाल है अविनाशी। डमरूधारी के डम डम पर सृष्टि का व्यवहार फले, और कृपा हो इनकी जीवन नैया भव के पार चले। सृष्टि रचयिता सकल जीव प्राणी जंतु के सर्वेश्वर, प्रभु राम की बाधा हरकर कहलाये थे रामेश्वर। तन पे मृग का चर्म चढाते भूतों के हैं नाथ कहाते, चंद्र सुशोभित मस्तक पर जो पर्वत ध्यान लगाते। जिनकी सोच के हीं कारण गोचित ये संसार फला, त्रिनेत्र जग जाए जब भी तांडव का व्यापार फला। अमृत मंथन में कंठों को विष का पान कराए थे, तभी देवों के देव महादेव नीलकंठ कहलाए थे। वो पर्वत पर रहने वाले हैं सिद्धेश्वर सुखकर्ता, किंतु दुष्टों के मान हरण करते रहते जीवन हर्ता। त्रिभुवनपति त्रिनेत्री त्रिशूल सुशोभित जिनके हाथ, काल मुठ्ठी में धरते जो प्रातिपक्ष खड़े थे गौरीनाथ। हो समक्ष सागर तब लड़कर रहना ना उपाय भला, लहरों के संग जो बहता है होता ना निरुपाय भला। महाकाल से यूँ भिड़ने का ना कोई भी अर्थ रहा, प्राप्त हुआ था ये अनुभव शिवसे लड़ना व्यर्थ रहा। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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क्या तीव्र था अस्त्र आमंत्रण शस्त्र दीप्ति थी क्या उत्साह, जैसे बरस रहा गिरिधर पर तीव्र नीर लिए जलद प्रवाह। राजपुत्र दुर्योधन सच में इस योद्धा को जाना हमने, क्या इसने दु:साध्य रचे थे उस दिन हीं पहचाना हमने। लक्ष्य असंभव दिखता किन्तु निज वचन के फलितार्थ, स्वप्नमय था लड़ना शिव से द्रोण पुत्र ने किया यथार्थ। जाने कैसे शस्त्र प्रकटित कर क्षण में धार लगाता था, शिक्षण उसको प्राप्त हुआ था कैसा ये दिखलाता था। पर जो वाण चलाता सारे शिव में हीं खो जाते थे, जितने भी आयुध जगाए क्षण में सब सो जाते थे। निडर रहो पर निज प्रज्ञा का थोड़ा सा तो ज्ञान रहे , शक्ति सही है साधन का पर थोड़ा तो संज्ञान रहे। शिव पुरुष हैं महा काल क्या इसमें भी संदेह भला , जिनके गर्दन विषधर माला और माथे पे चाँद फला। भीष्म पितामह माता जिनके सर से झरझर बहती है, उज्जवल पावन गंगा जिन मस्तक को धोती रहती है। आशुतोष हो तुष्ट अगर तो पत्थर को पर्वत करते, और अगर हो रुष्ट पहर जो वासी गणपर्वत रहते। खेल खेल में बलशाली जो भी आते हो जाते धूल, महाकाल के हो समक्ष जो मिट जाते होते निर्मूल। क्या सागर क्या नदिया चंदा सूरज जो हरते अंधियारे, कृपा आकांक्षी महादेव के जगमग जग करते जो तारे। ऐसे शिव से लड़ने भिड़ने के शायद वो काबिल ना था, जैसा भी था द्रोण पुत्र पर कायर में वो शामिल ना था। अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:01 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:24
क्या तीव्र था अस्त्र आमंत्रण शस्त्र दीप्ति थी क्या उत्साह, जैसे बरस रहा गिरिधर पर तीव्र नीर लिए जलद प्रवाह। राजपुत्र दुर्योधन सच में इस योद्धा को जाना हमने, क्या इसने दु:साध्य रचे थे उस दिन हीं पहचाना हमने। लक्ष्य असंभव दिखता किन्तु निज वचन के फलितार्थ, स्वप्नमय था लड़ना शिव से द्रोण पुत्र ने किया यथार्थ। जाने कैसे शस्त्र प्रकटित कर क्षण में धार लगाता था, शिक्षण उसको प्राप्त हुआ था कैसा ये दिखलाता था। पर जो वाण चलाता सारे शिव में हीं खो जाते थे, जितने भी आयुध जगाए क्षण में सब सो जाते थे। निडर रहो पर निज प्रज्ञा का थोड़ा सा तो ज्ञान रहे , शक्ति सही है साधन का पर थोड़ा तो संज्ञान रहे। शिव पुरुष हैं महा काल क्या इसमें भी संदेह भला , जिनके गर्दन विषधर माला और माथे पे चाँद फला। भीष्म पितामह माता जिनके सर से झरझर बहती है, उज्जवल पावन गंगा जिन मस्तक को धोती रहती है। आशुतोष हो तुष्ट अगर तो पत्थर को पर्वत करते, और अगर हो रुष्ट पहर जो वासी गणपर्वत रहते। खेल खेल में बलशाली जो भी आते हो जाते धूल, महाकाल के हो समक्ष जो मिट जाते होते निर्मूल। क्या सागर क्या नदिया चंदा सूरज जो हरते अंधियारे, कृपा आकांक्षी महादेव के जगमग जग करते जो तारे। ऐसे शिव से लड़ने भिड़ने के शायद वो काबिल ना था, जैसा भी था द्रोण पुत्र पर कायर में वो शामिल ना था। अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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कुछ हीं क्षण में ज्ञात हुआ सारे संशय छँट जाते थे, जो भी धुँआ पड़ा हुआ सब नयनों से हट जाते थे। नाहक हीं दुर्योधन मैंने तुमपे ना विश्वास किया। द्रोणपुत्र ने मित्रधर्म का सार्थक एक प्रयास किया। ============================= हाँ प्रयास वो किंचित ऐसा ना सपने में कर पाते, जो उस नर में दृष्टिगोचित साहस संचय कर पाते। बुद्धि प्रज्ञा कुंद पड़ी थी हम दुविधा में थे मजबूर, ऐसा दृश्य दिखा नयनों के आगे दोनों हुए विमूढ़। ============================ गुरु द्रोण का पुत्र प्रदर्शित अद्भुत तांडव करता था, धनुर्विद्या में दक्ष पार्थ के दृश पांडव हीं दिखता था। हम जो सोचनहीं सकते थे उसने एक प्रयास किया , महाकाल को हर लेने का खुद पे था विश्वास किया। ============================= कैसे कैसे अस्त्र पड़े थे उस उद्भट की बाँहों में , तरकश में जो शस्त्र पड़े सब परिलक्षित निगाहों में। उग्र धनुष पर वाण चढ़ाकर और उठा हाथों तलवार, मृगशावक एक बढ़ा चलाथा एक सिंह पे करने वार। ============================= क्या देखते ताल थोक कर लड़ने का साहस करता, महाकाल से अश्वत्थामा अदभुत दु:साहस करता? हे दुर्योधन विकट विघ्न को ऐसे हीं ना पार किया , था तो उसके कुछ तोअन्दर महा देव पर वार किया । ============================= पितृप्रशिक्षण का प्रतिफलआज सभीदिखाया उसने, अश्वत्थामा महाकाल पर कंटक वाण चलाया उसने। शत्रु वंश का सर्व संहर्ता अरिदल जिससे अनजाना, हम तीनों में द्रोण पुत्र तब सर्व श्रेष्ठ हैं ये माना। ============================= अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 1:55 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया : भाग : 23
कुछ हीं क्षण में ज्ञात हुआ सारे संशय छँट जाते थे, जो भी धुँआ पड़ा हुआ सब नयनों से हट जाते थे। नाहक हीं दुर्योधन मैंने तुमपे ना विश्वास किया। द्रोणपुत्र ने मित्रधर्म का सार्थक एक प्रयास किया। ============================= हाँ प्रयास वो किंचित ऐसा ना सपने में कर पाते, जो उस नर में दृष्टिगोचित साहस संचय कर पाते। बुद्धि प्रज्ञा कुंद पड़ी थी हम दुविधा में थे मजबूर, ऐसा दृश्य दिखा नयनों के आगे दोनों हुए विमूढ़। ============================ गुरु द्रोण का पुत्र प्रदर्शित अद्भुत तांडव करता था, धनुर्विद्या में दक्ष पार्थ के दृश पांडव हीं दिखता था। हम जो सोचनहीं सकते थे उसने एक प्रयास किया , महाकाल को हर लेने का खुद पे था विश्वास किया। ============================= कैसे कैसे अस्त्र पड़े थे उस उद्भट की बाँहों में , तरकश में जो शस्त्र पड़े सब परिलक्षित निगाहों में। उग्र धनुष पर वाण चढ़ाकर और उठा हाथों तलवार, मृगशावक एक बढ़ा चलाथा एक सिंह पे करने वार। ============================= क्या देखते ताल थोक कर लड़ने का साहस करता, महाकाल से अश्वत्थामा अदभुत दु:साहस करता? हे दुर्योधन विकट विघ्न को ऐसे हीं ना पार किया , था तो उसके कुछ तोअन्दर महा देव पर वार किया । ============================= पितृप्रशिक्षण का प्रतिफलआज सभीदिखाया उसने, अश्वत्थामा महाकाल पर कंटक वाण चलाया उसने। शत्रु वंश का सर्व संहर्ता अरिदल जिससे अनजाना, हम तीनों में द्रोण पुत्र तब सर्व श्रेष्ठ हैं ये माना। ============================= अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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========================== मेरे भुज बल की शक्ति क्या दुर्योधन ने ना देखा? कृपाचार्य की शक्ति का कैसे कर सकते अनदेखा? दुःख भी होता था हमको और किंचित इर्ष्या होती थी, मानवोचित विष अग्नि उर में जलती थी बुझती थी। ========================== युद्ध लड़ा था जो दुर्योधन के हित में था प्रतिफल क्या? बीज चने के भुने हुए थे क्षेत्र परिश्रम ऋतु फल क्या? शायद मुझसे भूल हुई जो ऐसा कटु फल पाता था, या विवेक में कमी रही थी कंटक दुख पल पाता था। ========================== या समय का रचा हुआ लगता था पूर्व निर्धारित खेल, या मेरे प्रारब्ध कर्म का दुचित वक्त प्रवाहित मेल। या स्वीकार करूँ दुर्योधन का मतिभ्रम था ये कहकर, या दुर्भाग्य हुआ प्रस्फुटण आज देख स्वर्णिम अवसर। ========================== मन में शंका के बादल जो उमड़ घुमड़ कर आते थे, शेष बची थी जो कुछ प्रज्ञा धुंध घने कर जाते थे । क्यों कर कान्हा ने मुझको दुर्योधन के साथ किया? या नाहक का हीं था भ्रम ना केशव ने साथ दिया? ========================= या गिरिधर की कोई लीला थी शायद उपाय भला, या अल्प बुद्धि अभिमानी पे माया का जाल फला। अविवेक नयनों पे इतना सत्य दृष्टि ना फलता था, या मैंने स्वकर्म रचे जो उसका हीं फल पलता था? ========================== या दुर्बुद्धि फलित हुई थी ना इतना सम्मान किया, मृतशैया पर मित्र पड़ा था ना इतना भी ध्यान दिया। क्या सोचकर मृतगामी दुर्योधन के विरुद्ध पड़ा , निज मन चितवन घने द्वंद्व में मैं मेरे प्रतिरुद्ध अड़ा। ========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 1:51 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:22
========================== मेरे भुज बल की शक्ति क्या दुर्योधन ने ना देखा? कृपाचार्य की शक्ति का कैसे कर सकते अनदेखा? दुःख भी होता था हमको और किंचित इर्ष्या होती थी, मानवोचित विष अग्नि उर में जलती थी बुझती थी। ========================== युद्ध लड़ा था जो दुर्योधन के हित में था प्रतिफल क्या? बीज चने के भुने हुए थे क्षेत्र परिश्रम ऋतु फल क्या? शायद मुझसे भूल हुई जो ऐसा कटु फल पाता था, या विवेक में कमी रही थी कंटक दुख पल पाता था। ========================== या समय का रचा हुआ लगता था पूर्व निर्धारित खेल, या मेरे प्रारब्ध कर्म का दुचित वक्त प्रवाहित मेल। या स्वीकार करूँ दुर्योधन का मतिभ्रम था ये कहकर, या दुर्भाग्य हुआ प्रस्फुटण आज देख स्वर्णिम अवसर। ========================== मन में शंका के बादल जो उमड़ घुमड़ कर आते थे, शेष बची थी जो कुछ प्रज्ञा धुंध घने कर जाते थे । क्यों कर कान्हा ने मुझको दुर्योधन के साथ किया? या नाहक का हीं था भ्रम ना केशव ने साथ दिया? ========================= या गिरिधर की कोई लीला थी शायद उपाय भला, या अल्प बुद्धि अभिमानी पे माया का जाल फला। अविवेक नयनों पे इतना सत्य दृष्टि ना फलता था, या मैंने स्वकर्म रचे जो उसका हीं फल पलता था? ========================== या दुर्बुद्धि फलित हुई थी ना इतना सम्मान किया, मृतशैया पर मित्र पड़ा था ना इतना भी ध्यान दिया। क्या सोचकर मृतगामी दुर्योधन के विरुद्ध पड़ा , निज मन चितवन घने द्वंद्व में मैं मेरे प्रतिरुद्ध अड़ा। ========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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============================ शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल, तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल। निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं, कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं। ============================ मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ, निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ। खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है, जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है। ============================ विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर, किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर। भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन , अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन। =========================== लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार, धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार। द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में, पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में। =========================== पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा, प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा। हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा, दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा। =========================== अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा, सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा। क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को? एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को? =========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 1:35 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21
============================ शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल, तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल। निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं, कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं। ============================ मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ, निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ। खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है, जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है। ============================ विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर, किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर। भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन , अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन। =========================== लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार, धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार। द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में, पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में। =========================== पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा, प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा। हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा, दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा। =========================== अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा, सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा। क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को? एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को? =========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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=========================== क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला , प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला? नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया, मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया? =========================== सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे, दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे। कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव, कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव। =========================== सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर, समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर। अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव, निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव। =========================== और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान, कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान। संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय, छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय। =========================== उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा, होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा। मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार, शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार। =========================== मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था, किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था। किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार, अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार? =========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 1:12 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20
=========================== क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला , प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला? नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया, मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया? =========================== सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे, दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे। कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव, कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव। =========================== सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर, समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर। अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव, निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव। =========================== और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान, कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान। संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय, छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय। =========================== उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा, होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा। मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार, शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार। =========================== मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था, किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था। किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार, अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार? =========================== अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित
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============== विकट विघ्न जब भी आता , या तो संबल आ जाता है , या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल हो आता है। ============== भयाक्रांत संतप्त धूमिल , होने लगते मानव के स्वर , या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते , डग कुछ ऐसे होते नर । ============== विकट विघ्न अनुताप जला हो , क्षुधाग्नि संताप फला हो , अति दरिद्रता का जो मारा , कितने हीं आवेग सहा हो । ============== जिसकी माता श्वेत रंग के , आंटे में भर देती पानी, दूध समझकर जो पी जाता , कैसी करता था नादानी । ============== गुरु द्रोण का पुत्र वही , जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे , दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं , जीवन यापन लगता जैसे। ============== पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के , देख देखकर जीवन गाथा, अश्वत्थामा जान गया था , कैसी कमती जीवन व्यथा। ============== यही जानकर सुदर्शन हर , लेगा ये अपलक्षण रखता , सक्षम न था तन उसका , पर मन में आकर्षण रखता । ============== गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या , विघ्न बाधा से डर जाता , दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा , क्या भय से फिर भर जाता ? ============== थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर , हौले दुर्योधन से बोले , अश्वत्थामा के नयनों में , दहक रहे अग्नि के शोले । ============== घोर विघ्न को किंचित हीं , पुरुषार्थ हेतु अवसर माने , अश्वत्थामा द्रोण पुत्र , ले चला शरासन तत्तपर ताने। ============== अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 1:01 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19
============== विकट विघ्न जब भी आता , या तो संबल आ जाता है , या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल हो आता है। ============== भयाक्रांत संतप्त धूमिल , होने लगते मानव के स्वर , या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते , डग कुछ ऐसे होते नर । ============== विकट विघ्न अनुताप जला हो , क्षुधाग्नि संताप फला हो , अति दरिद्रता का जो मारा , कितने हीं आवेग सहा हो । ============== जिसकी माता श्वेत रंग के , आंटे में भर देती पानी, दूध समझकर जो पी जाता , कैसी करता था नादानी । ============== गुरु द्रोण का पुत्र वही , जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे , दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं , जीवन यापन लगता जैसे। ============== पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के , देख देखकर जीवन गाथा, अश्वत्थामा जान गया था , कैसी कमती जीवन व्यथा। ============== यही जानकर सुदर्शन हर , लेगा ये अपलक्षण रखता , सक्षम न था तन उसका , पर मन में आकर्षण रखता । ============== गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या , विघ्न बाधा से डर जाता , दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा , क्या भय से फिर भर जाता ? ============== थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर , हौले दुर्योधन से बोले , अश्वत्थामा के नयनों में , दहक रहे अग्नि के शोले । ============== घोर विघ्न को किंचित हीं , पुरुषार्थ हेतु अवसर माने , अश्वत्थामा द्रोण पुत्र , ले चला शरासन तत्तपर ताने। ============== अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित
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कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर मुझको फिर क्या होता भय,  जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का उसकी हीं होती जय। ======== त्रास नहीं था मन मे  किंचित निज तन मन व प्राण का, पर चिंता एक सता रही पुरुषार्थ त्वरित अभियान का। ======== धर्माधर्म  की  बात नहीं न्यूनांश ना मुझको दिखता था, रिपु मुंड के अतिरिक्त ना ध्येय अक्षि में टिकता था। ======== ना सिंह भांति निश्चित हीं  किसी एक श्रृगाल की भाँति, घात लगा हम किये प्रतीक्षा रात्रिपहर व्याल की भाँति।   ======== कटु  सत्य है दिन में लड़कर ना इनको हर सकता था, भला एक हीं  अश्वत्थामा  युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था? ======== जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर निज अस्त्र उठाया मैंने , निहत्थों पर चुनचुन कर हीं घातक शस्त्र चलाया मैंने। ======== दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल कर्म रचा जो बतलाता हूँ ,  ना चित्त में अफ़सोस बचा ना रहा ताप ना पछताता हूँ।  ======== तन मन पे भारी रहा बोझ अब हल्का  हल्का लगता है, आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना आज ह्रदय में फलता है।   ======== जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे उनके  प्राण प्रहारक  हूँ ,  शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक   धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ। ========  जो पितृवध से दबा हुआ जीता था कल तक रुष्ट हुआ, गाजर मुली सादृश्य  काट आज अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ।  ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 30, 2022
Jan 30, 2022 at 2:46 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:33
कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर मुझको फिर क्या होता भय,  जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का उसकी हीं होती जय। ======== त्रास नहीं था मन मे  किंचित निज तन मन व प्राण का, पर चिंता एक सता रही पुरुषार्थ त्वरित अभियान का। ======== धर्माधर्म  की  बात नहीं न्यूनांश ना मुझको दिखता था, रिपु मुंड के अतिरिक्त ना ध्येय अक्षि में टिकता था। ======== ना सिंह भांति निश्चित हीं  किसी एक श्रृगाल की भाँति, घात लगा हम किये प्रतीक्षा रात्रिपहर व्याल की भाँति।   ======== कटु  सत्य है दिन में लड़कर ना इनको हर सकता था, भला एक हीं  अश्वत्थामा  युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था? ======== जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर निज अस्त्र उठाया मैंने , निहत्थों पर चुनचुन कर हीं घातक शस्त्र चलाया मैंने। ======== दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल कर्म रचा जो बतलाता हूँ ,  ना चित्त में अफ़सोस बचा ना रहा ताप ना पछताता हूँ।  ======== तन मन पे भारी रहा बोझ अब हल्का  हल्का लगता है, आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना आज ह्रदय में फलता है।   ======== जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे उनके  प्राण प्रहारक  हूँ ,  शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक   धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ। ========  जो पितृवध से दबा हुआ जीता था कल तक रुष्ट हुआ, गाजर मुली सादृश्य  काट आज अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ।  ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा। ======= या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। ======= याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । ======= कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। ======= वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ======= ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा काओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। ======= अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। ======== क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। ======== पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। ======== सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 22, 2022
Jan 22, 2022 at 11:24 PM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:32
कुछ क्षण पहले शंकित था मन ना दृष्टित थी कोई आशा , द्रोणपुत्र के पुरुषार्थ से हुआ तिरोहित खौफ निराशा। ======= या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय, शत्रु शिविर को हुए अग्रसर हार फले कि या हो जय। ======= याद किये फिर अरिसिंधु में मर के जो अशेष रहा, वो नर हीं विशेष रहा हाँ वो नर हीं विशेष रहा । ======= कि शत्रुसलिला में जिस नर के हाथों में तलवार रहे , या क्षय की हो दृढ प्रतीति परिलक्षित संहार बहे। ======= वो मानव जो झुके नहीं कतिपय निश्चित एक हार में, डग योद्धा का डिगे नहीं अरि के भीषण प्रहार में। ======= ज्ञात मनुज के चित्त में किंचित सर्वगर्भा काओज बहे , अभिज्ञान रहे निज कृत्यों का कर्तव्यों की हीं खोज रहे। ======= अकम्पत्व का हीं तन पे मन पे धारण पोशाक हो , रण डाकिनी के रक्त मज्जा खेल का मश्शाक हो। ======== क्षण का हीं तो मन है ये क्षण को हीं टिका हुआ, और तन का क्या मिट्टी का मिटटी में मिटा हुआ। ======== पर हार का वरण भी करके जो रहा अवशेष है, जिस वीर के वीरत्व का जन में स्मृति शेष है। ======== सुवाड़वाग्नि सिंधु में नर मर के भी अशेष है, जीवन वही विशेष है मानव वही विशेष है। ======== अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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क्या  यत्न  करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं  आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का  मार्ग  दिखाती  थी।    ======== अकिलेश्वर को हरना  दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था  मार्ग अति  दू:साध्य कहीं। ========= अतिशय साहस संबल  संचय  करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। ======== अति  वेदना  थी तन  में  निज  मस्तक  अग्नि  धरने  में , पर निज प्रण अपूर्णित करके  भी  क्या  रखा लड़ने  में? ======== जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में  कोई  क्या  सम्मान रखे? ======== या अहन्त्य  को हरना था या शिव के  हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? ========= हठ मेरा  वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन  को  जिद  मेरी थी  कैसी पर था  भान कहीं। ========= हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से  बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। ========= त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य  प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। ========= गणादिप का संबल पा  था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने  या उनसे  लड़ मरने  का। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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Jan 16, 2022
Jan 16, 2022 at 4:26 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-31
क्या  यत्न  करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं  आती थी, त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का  मार्ग  दिखाती  थी।    ======== अकिलेश्वर को हरना  दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं, जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था  मार्ग अति  दू:साध्य कहीं। ========= अतिशय साहस संबल  संचय  करके भीषण लक्ष्य किया, प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया। ======== अति  वेदना  थी तन  में  निज  मस्तक  अग्नि  धरने  में , पर निज प्रण अपूर्णित करके  भी  क्या  रखा लड़ने  में? ======== जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे, उस योद्धा का जीवन रण में  कोई  क्या  सम्मान रखे? ======== या अहन्त्य  को हरना था या शिव के  हाथों मरना था, या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था? ========= हठ मेरा  वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं, कपर्दिन  को  जिद  मेरी थी  कैसी पर था  भान कहीं। ========= हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया, मंजिल से  बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया। ========= त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य  प्रबल आसान हुआ, भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ। ========= गणादिप का संबल पा  था यही समय कुछ करने का, या पांडवजन को मृत्यु देने  या उनसे  लड़ मरने  का। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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जब  कान्हा के होठों पे  मुरली  गैया  मुस्काती थीं, गोपी सारी लाज वाज तज कर दौड़े आ जाती थीं। किया  प्रेम  इतना  राधा  से कहलाये थे राधेश्याम, पर भव  सागर तारण हेतू त्याग  चले थे राधे धाम। पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी , कंस आदि  के  मर्दन कर्ता  कृष्ण अति बलशाली। वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें, जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे। सारंग  धारी   कृष्ण  हरि  ने वत्सासुर संहार किया , बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया। मात्र  तर्जनी  से हीं तो  गिरि धर ने गिरि उठाया था, कभी देवाधि पति इंद्र   को घुटनों तले झुकाया था। जब पापी  कुचक्र  रचे  तब  हीं  वो चक्र चलाते हैं, कुटिल  दर्प सर्वत्र  फले  तब  दृष्टि  वक्र  उठाते हैं। उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे, इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे। एक  हाथ में चक्र हैं  जिनके मुरली मधुर बजाते हैं, गोवर्धन  धारी डर  कर  भगने  का खेल दिखातें है। जैसे  गज  शिशु से  कोई  डरने का  खेल रचाता है, कारक बन कर कर्ता  का कारण से मेल कराता है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 31, 2021
May 31, 2021 at 1:36 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-5
जब  कान्हा के होठों पे  मुरली  गैया  मुस्काती थीं, गोपी सारी लाज वाज तज कर दौड़े आ जाती थीं। किया  प्रेम  इतना  राधा  से कहलाये थे राधेश्याम, पर भव  सागर तारण हेतू त्याग  चले थे राधे धाम। पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी , कंस आदि  के  मर्दन कर्ता  कृष्ण अति बलशाली। वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें, जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे। सारंग  धारी   कृष्ण  हरि  ने वत्सासुर संहार किया , बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया। मात्र  तर्जनी  से हीं तो  गिरि धर ने गिरि उठाया था, कभी देवाधि पति इंद्र   को घुटनों तले झुकाया था। जब पापी  कुचक्र  रचे  तब  हीं  वो चक्र चलाते हैं, कुटिल  दर्प सर्वत्र  फले  तब  दृष्टि  वक्र  उठाते हैं। उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे, इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे। एक  हाथ में चक्र हैं  जिनके मुरली मधुर बजाते हैं, गोवर्धन  धारी डर  कर  भगने  का खेल दिखातें है। जैसे  गज  शिशु से  कोई  डरने का  खेल रचाता है, कारक बन कर कर्ता  का कारण से मेल कराता है। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया , अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया। कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए, जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए। जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया, तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया। ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी, दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी। ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं , अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं। कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया, शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया। जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था, मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था। कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे , तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे। जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी , आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी। और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे , मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे। कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए, पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए। इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर, कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 23, 2021
May 23, 2021 at 1:21 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-4
कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया , अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया। कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए, जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए। जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया, तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया। ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी, दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी। ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं , अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं। कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया, शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया। जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था, मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था। कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे , तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे। जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी , आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी। और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे , मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे। कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए, पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए। इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर, कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़। अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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उसके दु:साहस के समक्ष गन्धर्व यक्ष भी मांगे पानी, मर्यादा सब धूल धूसरित ऐसा था दम्भी अभिमानी ? संधि वार्ता के प्रति उत्तर  में कैसा वो सन्देश दिया ? दे डाल कृष्ण को कारागृह में उसने ये आदेश किया। प्रभु राम की पत्नी  का  जिसने मनमानी  हरण किया, उस अज्ञानी साथ राम ने प्रथम शांति का वरण किया। ज्ञात  उन्हें  था  अभिमानी को  मर्यादा का ज्ञान नहीं, वध करना था न्याय युक्त बेहतर कोई इससे त्राण नहीं। फिर भी मर्यादा प्रभु राम ने एक अवसर प्रदान किया, रण  तो होने को ही था पर अंतिम  एक निदान दिया। रावण भी दुर्योधन तुल्य हीं निरा मूर्ख था अभिमानी, पर मर्यादा पुरुष राम थे निज के प्रज्ञा की हीं मानी। था विदित राम को कि रण में भाग्य मनुज का सोता है, नर  जो  भी लड़ते कटते है अम्बर शोणित भर रोता है। इसी हेतु तो प्रभु राम ने अंतिम एक प्रयास किया, सन्धि में था संशय किंतु किंचित एक कयास किया। दूत बना के भेजा किस को रावण सम जो बलशाली, वानर श्रेष्ठ वो अंगद जिसका पिता रहा वानर बालि। महावानर बालि जिसकी क़दमों में रावण रहता था, अंगद के पलने में जाने नित क्रीड़ा कर फलता था। उसी बालि के पुत्र दूत बली अंगद को ये काम दिया, पैर डिगा ना पाया रावण  क्या अद्भुत पैगाम दिया। दूत  बली अंगद हो  जिसका सोचो राजा क्या होगा, पैर दूत का हिलता ना रावण रण में फिर क्या होगा? अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 19, 2021
May 19, 2021 at 10:47 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-3
उसके दु:साहस के समक्ष गन्धर्व यक्ष भी मांगे पानी, मर्यादा सब धूल धूसरित ऐसा था दम्भी अभिमानी ? संधि वार्ता के प्रति उत्तर  में कैसा वो सन्देश दिया ? दे डाल कृष्ण को कारागृह में उसने ये आदेश किया। प्रभु राम की पत्नी  का  जिसने मनमानी  हरण किया, उस अज्ञानी साथ राम ने प्रथम शांति का वरण किया। ज्ञात  उन्हें  था  अभिमानी को  मर्यादा का ज्ञान नहीं, वध करना था न्याय युक्त बेहतर कोई इससे त्राण नहीं। फिर भी मर्यादा प्रभु राम ने एक अवसर प्रदान किया, रण  तो होने को ही था पर अंतिम  एक निदान दिया। रावण भी दुर्योधन तुल्य हीं निरा मूर्ख था अभिमानी, पर मर्यादा पुरुष राम थे निज के प्रज्ञा की हीं मानी। था विदित राम को कि रण में भाग्य मनुज का सोता है, नर  जो  भी लड़ते कटते है अम्बर शोणित भर रोता है। इसी हेतु तो प्रभु राम ने अंतिम एक प्रयास किया, सन्धि में था संशय किंतु किंचित एक कयास किया। दूत बना के भेजा किस को रावण सम जो बलशाली, वानर श्रेष्ठ वो अंगद जिसका पिता रहा वानर बालि। महावानर बालि जिसकी क़दमों में रावण रहता था, अंगद के पलने में जाने नित क्रीड़ा कर फलता था। उसी बालि के पुत्र दूत बली अंगद को ये काम दिया, पैर डिगा ना पाया रावण  क्या अद्भुत पैगाम दिया। दूत  बली अंगद हो  जिसका सोचो राजा क्या होगा, पैर दूत का हिलता ना रावण रण में फिर क्या होगा? अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
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Ethics of war were not followed, Neither by the army under me, Nor by that wise commander, I shattered all the regulations, Especially the ones formulated by me. I, Đroņa, was a war criminal, They had him surrounded when I commanded Abhimanyu's killing. Classical rules of war idealized, Don't attack the outnumbered enemy, I helped form the Chakravyuha, A forbidden aggressive war formation, 'Abhimanyu' was killed by many, He was so outnumbered by our army, Đraupađi, his mother, cursed me, She cursed I'll die lamenting my son.
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Jul 23, 2017
Jul 23, 2017 at 12:49 AM UTC
The Guilt Of Guru Đroņa