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avanish-maurya
avanish-maurya
17/M/Delhi
अपनी तबियत सबसे यूँ मिलती ना थी... कमरे में खिड़की तो थी, खुलती ना थी... हम अपनी मर्जी के मालिक होते थे... अच्छे-अच्छों की हम पर गलती ना थी... पहले तो बस दिन होता था या की रात.. शाम कभी इस दर पे तो गलती ना थी... यारों से मिलना-जुलना जो जाता था.. क़िल्लत भी होती थी तो गलती ना थी... अब तुम इस को अहम कहो या खुद्दारी... माफ़ी कैसे माँगता जब ग़लती ना थी..
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Mar 10, 2019
Mar 10, 2019 at 11:31 AM UTC
ग़लती ना थी
हादसों की हक़ीक़त में ख्वाबों की बात करते हो खुद को है जलना अब चिरागों की बात करते हो फुरसत में हिसाब लगाना रोटी और पोथी का करोड़ों की गरीबी में नवाबों की बात करते हो
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Mar 10, 2019
Mar 10, 2019 at 12:50 AM UTC
हक़ीक़त
तेरी यादों का अब कोई पेहरेदार नहीं मिलता, बचपन की शामों सा अब इतवार नहीं मिलता..
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Mar 6, 2019
Mar 6, 2019 at 10:12 PM UTC
तेरी यादों का पेहरेदार
हाँथो में यहाँ नश्तर है कई, इक आईना है पत्थर है कई। ऐ ख़ुदा ये ग़ज़ब का घर है तिरा, इक माह है फ़क़त अख़्तर है कई। अब जीना यहाँ मुमकिन ही नहीं, इक मैं हूँ सफ-ए-लश्कर है कई। ये जो सीढ़ियों सी है जिंदगी, उतरिये संभल के ठोकर है कई। मेरी ख़बर ही न रही यारों को, कहने को मिरे दिलबर है कई। रंजन उलझन ये किसपर हो यकीं, इक राही यहाँ रहबर है कई। नश्तर--नुकीला खंजर, माह-- चाँद, अख़्तर-- सितारे, रहबर-- मार्गदर्शक सफ-लश्कर-- दुश्मन के फौज़ की लाइने
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Feb 12, 2019
Feb 12, 2019 at 1:13 AM UTC
हाथों में यहां नस्तर हैं कई..
बे-नूर पड़ा है शहर मेरा... बरसों से दीवाली आई कहाँ? . . . चले हो जबसे यूँ होकर बेगाने, फ़िर मुझमे रूहानी आयी कहाँ?..
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Sep 13, 2018
Sep 13, 2018 at 11:38 PM UTC
बे-नूर पड़ा है शहर मेरा...
अभी सूरज नहीं डूबा ज़रा सी शाम होने दो '' मैं खुद लौट जाऊँगा मुझे नाकाम होने दो '' मुझे बदनाम करने का बहाना क्यों ढूँढते हो '' मैं खुद बदनाम हो जाऊंगा पहले नाम तो होने दो ''
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Sep 1, 2018
Sep 1, 2018 at 11:02 AM UTC
अभी सूरज नहीं डूबा..
बर्फीली रातों में मुझे भागना है ज़िन्दगी जीने लायक मेरी आज ना है पर यकीन है तक़दीर बदलेगी मेरी सोना नहीं है मुझे जागना है वज़ूद नहीं दुनिया की नज़र में कहीं पर मिला के आँख सूरज को भी ताकना हैं बिखर जाए किसी के पत्थर से हम वो काँच नहीं हैं सोना नहीं हैं मुझे जागना है..
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Aug 27, 2018
Aug 27, 2018 at 11:37 PM UTC
मुझे जागना है..
​ढलते सूरज को फिर से उगते देखा है, लहरों को टकरा कर फिर से बनते देखा है.. बुझे हुए चिराग को पुनः जलते देखा है, मैंने हारे हुए आज को विजयी कल बनते देखा है.. निराश, टूटे हुए मन को संवरते देखा है, सोई हुई उमंग में रँग भरते देखा है.. मुरझाई कली को फूल में बदलते देखा है, मैंने तेरी आँखों में जीत को चमकते देखा है… नन्ही चींटी को सौ बार फिसलते देखा है, बार-बार कोशिश करते उसे फिर उठते देखा है.. हारे हुए हौसलों को उड़ान भरते देखा है , मैंने राही को राह में कांटों से निपटते देखा है.. रण छोड़ कर विवश बैठे अर्जुन को देखा है, उसी अर्जुन को महाभारत में विजयी बनते देखा है.. उठ साथी, मन को संभाल और प्रयास कर, क्योंकि मैंने हारे हुए आज में तेरे जीते हुए कल को देखा है.. तेरी माँ को मैंने तुझे याद करते देखा है, छुप-छुप कर तेरे पिता से.. आँख भरते देखा है.. तेरे पिता ने तुझे बचपन में गिरते संभलते देखा है, मैंने उनकी आँखों में स्नेह झलकते देखा है.. जिंदगी को इम्तेहान लेते देखा है, हारे हुए पर लोगों को हँसते देखा है.. लोगों की छोड़ और खुद पर कर यकीन, क्योंकि मैंने तेरे कल में तुझको चमकते देखा है..
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Aug 21, 2018
Aug 21, 2018 at 3:49 AM UTC
तेरी आँखों में जीत को चमकते देखा है...
​ढलते सूरज को फिर से उगते देखा है, लहरों को टकरा कर फिर से बनते देखा है.. बुझे हुए चिराग को पुनः जलते देखा है, मैंने हारे हुए आज को विजयी कल बनते देखा है.. निराश, टूटे हुए मन को संवरते देखा है, सोई हुई उमंग में रँग भरते देखा है.. मुरझाई कली को फूल में बदलते देखा है, मैंने तेरी आँखों में जीत को चमकते देखा है… नन्ही चींटी को सौ बार फिसलते देखा है, बार-बार कोशिश करते उसे फिर उठते देखा है.. हारे हुए हौसलों को उड़ान भरते देखा है , मैंने राही को राह में कांटों से निपटते देखा है.. रण छोड़ कर विवश बैठे अर्जुन को देखा है, उसी अर्जुन को महाभारत में विजयी बनते देखा है.. उठ साथी, मन को संभाल और प्रयास कर, क्योंकि मैंने हारे हुए आज में तेरे जीते हुए कल को देखा है.. तेरी माँ को मैंने तुझे याद करते देखा है, छुप-छुप कर तेरे पिता से.. आँख भरते देखा है.. तेरे पिता ने तुझे बचपन में गिरते संभलते देखा है, मैंने उनकी आँखों में स्नेह झलकते देखा है.. जिंदगी को इम्तेहान लेते देखा है, हारे हुए पर लोगों को हँसते देखा है.. लोगों की छोड़ और खुद पर कर यकीन, क्योंकि मैंने तेरे कल में तुझको चमकते देखा है..
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अपनी ममता को समेटे, तेरे सिर को प्यार से दुलारती थी | तेरी नादानियाँ – गलतियाँ छिपाती, पापा का गुस्सा ठंडा कर तुझे प्यार से संवारती थी…| तेरे देरी होने पर बढ़ जाती थी जिसकी धड़कने, अने पर झूठ-मूठ का गुस्सा कर.. प्यार से पुकारती थी. . | जिसे नहीं थी परवाह अपने दर्द की, तेरी जरा सी बेचैनी में रात बिन सोए गुजारती थी.. | तेरी हँसी में खुद कि खुशियाँ पाती, तेरे दर्द में जिसकी आंखें अश्रु झलकारती थी.. | आज…., छोटे से कमरे में रोती है वो माँ, उसकी क्या खता थी ये तो बता…. तू तो चला गया उसे छोड़ कर, उसका तेरे सिवा कौन है ये तो बता… खुद खाना खाए पता नहीं कितने दिन बीत गए, पर तेरे लिए आज भी थालियाँ सजती है.. उसके प्यार में क्या कमी रह गई ये बता… उस की आंख से आंसू झरते हैं, पर हलक से पानी नहीं उतरता… उसको कितना दर्द दिया ये तो बता…. ” तू क्यों बताएगा, तुझे कौन सी उसकी परवाह है..? होती तो यों जिंदगी से मुह ना मोड़ता, उसको इतना दर्द क्यों दिया ये तो बता…… ||
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Aug 21, 2018
Aug 21, 2018 at 3:47 AM UTC
तुझे कौन सी उसकी परवाह है....
अपनी ममता को समेटे, तेरे सिर को प्यार से दुलारती थी | तेरी नादानियाँ – गलतियाँ छिपाती, पापा का गुस्सा ठंडा कर तुझे प्यार से संवारती थी…| तेरे देरी होने पर बढ़ जाती थी जिसकी धड़कने, अने पर झूठ-मूठ का गुस्सा कर.. प्यार से पुकारती थी. . | जिसे नहीं थी परवाह अपने दर्द की, तेरी जरा सी बेचैनी में रात बिन सोए गुजारती थी.. | तेरी हँसी में खुद कि खुशियाँ पाती, तेरे दर्द में जिसकी आंखें अश्रु झलकारती थी.. | आज…., छोटे से कमरे में रोती है वो माँ, उसकी क्या खता थी ये तो बता…. तू तो चला गया उसे छोड़ कर, उसका तेरे सिवा कौन है ये तो बता… खुद खाना खाए पता नहीं कितने दिन बीत गए, पर तेरे लिए आज भी थालियाँ सजती है.. उसके प्यार में क्या कमी रह गई ये बता… उस की आंख से आंसू झरते हैं, पर हलक से पानी नहीं उतरता… उसको कितना दर्द दिया ये तो बता…. ” तू क्यों बताएगा, तुझे कौन सी उसकी परवाह है..? होती तो यों जिंदगी से मुह ना मोड़ता, उसको इतना दर्द क्यों दिया ये तो बता…… ||
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कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं। जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।
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Aug 20, 2018
Aug 20, 2018 at 1:58 PM UTC
कहाँ पर बोलना है