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अपनी तबियत सबसे यूँ मिलती ना थी... कमरे में खिड़की तो थी, खुलती ना थी... हम अपनी मर्जी के मालिक होते थे... अच्छे-अच्छों की हम पर गलती ना थी... पहले तो बस दिन होता था या की रात.. शाम कभी इस दर पे तो गलती ना थी... यारों से मिलना-जुलना जो जाता था.. क़िल्लत भी होती थी तो गलती ना थी... अब तुम इस को अहम कहो या खुद्दारी... माफ़ी कैसे माँगता जब ग़लती ना थी..
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Mar 10, 2019
Mar 10, 2019 at 11:31 AM UTC
ग़लती ना थी
अपनी तबियत सबसे यूँ मिलती ना थी... कमरे में खिड़की तो थी, खुलती ना थी... हम अपनी मर्जी के मालिक होते थे... अच्छे-अच्छों की हम पर गलती ना थी... पहले तो बस दिन होता था या की रात.. शाम कभी इस दर पे तो गलती ना थी... यारों से मिलना-जुलना जो जाता था.. क़िल्लत भी होती थी तो गलती ना थी... अब तुम इस को अहम कहो या खुद्दारी... माफ़ी कैसे माँगता जब ग़लती ना थी..
avanish-maurya
Written by
17/M/Delhi
Mar 10, 2019
Mar 10, 2019 at 11:31 AM UTC
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