Submit your work, meet writers and drop the ads. Become a member
Joginder Singh Nov 2024
आज कल
इंसान होना बहुत मुश्किल है  
क्यों कि
उसके सामने
मुश्किलें बढ़ाने वाला कल है।
सो, यदि इंसान कहलाना चाहते हो
तो यह भी समझ लो,
तेज भागते समय को
अच्छे से समझ लो।

क्रोध करने से पहले
आदमी के पास
सच सुनने का जिगरा होना चाहिए
और साथ ही
उस के पास
झूठ को झुठलाने का  
हुनर होना चाहिए।

कभी कभार
दिल की जुस्तजू को पीछे रख
खुद से गुफ्तगू करते हुए
दिल को बहलाने का भी
हुनर होना चाहिए।
यदा कदा दिल
बहलाते रहना चाहिए।
उसे हल्के हल्के
मुस्कराते रहना चाहिए।




अब तो
मुस्करा प्यारे
तुझे जीवन भर
अपनों से सम्मान मिलेगा,
जिससे स्वत:
जीवन धारा में निखार दिखेगा।
देश और समाज को
स्वस्थ,साधन, सम्पन्न
संसार मिलेगा।
मुस्करा प्यारे मुस्करा।
अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ा।
१६/०७/२०२२
मन में कोई बात
कहने से रह जाए
तो होती है
कहीं गहरे तक
परेशानी।
कौन करता है
एक आध को छोड़कर
मनमानी ?
असल में है यह
नादानी।
इस दुनिया जहान में
बहुत से हिम्मती
सच का पक्ष
सबके समक्ष
रखने की खातिर
दे दिया करते हैं
अपना बलिदान।
अभी अभी सुनी है
हृदय विदारक
एक ख़बर कि
सच के पुरोधाओं को
पड़ोसी देश में
किया जा रहा है
प्रताड़ित।

यह सुन कर मैं सुन्न रह गया।
अभिव्यक्ति की आज़ादी का पक्षधर
आज चुप क्यों रह गया ?
शायद ज़िन्दगी सबको प्यारी है।
पर यह भी है एक कड़वा सच कि
बिना अभिव्यक्ति की आज़ादी के
सर्वस्व
बन जाया करता
भिखारी है।
यह सब चहुं ओर फैली
अराजकता
क्या व्यक्ति और क्या देश दुनिया
सब पर पड़ जाया करती भारी है।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बंदिशें लगाना
आजकल बनती जा रही
देश दुनिया भर में व्याप्त
एक असाध्य बीमारी है।
१५/०१/२०२५.
आज गुड़िया
पहली बार जा रही है
गुरु की नगरी
अमृतसर
वहां वह अपने साथियों के साथ
भगत पूर्ण सिंह की
कर्मस्थली जाएगी।
अपने भीतर
वंचितों , शोषितों , अपाहिजों के
प्रति करुणा और सद्भावना की
अमृत बूंदें लेकर आएगी ,
अपने भीतर संवेदना का
अमृत संचार लेकर आएगी।

पहली बार
जब मैं दरबार साहिब गया था
तो मुझे वहां दिव्य अनुभूति हुई थी।
उम्मीद है कि
गुड़िया वहां से दिव्य दृष्टि लेकर आएगी ,
सच्चा इंसान बनकर
अपना जीवन सेवा कार्यों में लगाएगी।

वहीं जालियां वाला बाग भी है
देश की आज़ादी में
एक विलक्षण घटना का साक्षी।
एक देशभक्तों का वध स्थल
जिसने देश समाज और दुनिया को
दिया था झकझोर !
और फिर जल्दी आई थी
आज़ादी की भोर !

वहीं पास ही है
दुर्ग्याना मंदिर
जहां बहता है
आस्था का सैलाब
जिससे जीवन में
आ सकता है ठहराव
आदमी समय के बहाव को
महसूस कर
जीवन में
आगे बढ़ने का निश्चय कर
बना सकता है स्वयं को
समाजोपयोगी और निडर।

गुड़िया
आज अभी अभी गई है
पावन नगरी
अमृतसर।
उम्मीद है कि
वह जीवन के लिए
वहां से
उपयोगी
जीवन दृष्टि संचित करके आएगी,
अपने जीवन को सार्थकता से
जोड़ पाएगी ,
स्वयं को सकारात्मक बनाएगी।
२०/०२/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
कभी
किसी
चिड़िया को
चिड़चिड़ाते
देखा है?
नहीं तो!
फिर तो तुम
दिल से चहका करो।
कभी बहका न करो।
ओ चिड़चिड़े! ओए...चि...डे...
भीतर कुछ कुढ़न हुई ,
जैसे अचानक चुभे सूई ।

अचानक
घर के आंगन में
एक चिड़िया कीट खाती हुई
दिख पड़ी।
लगा मुझे कि वह
मुझसे कह रही है,..
'अरे चिड़चिड़े !चहक जरा।
चहकने से , जीवन रहता, महक भरा।
एकदम चहल पहल भरा।'

यह सब मेरा भ्रम था।
शायद मन के भीतर से
कोई चिड़िया चहक उठी थी।
मेरी उदासीनता कुछ खत्म हुई थी ।
मैंने अपने मन की आवाज जो सुन ली थी ।

मैंने अपनी आंखें खोलीं।
घर के आंगन में धूप खिली थी।
वह चिड़िया किसी कल्पना लोक में चली गई थी।

१९/०६/२०१८.
Joginder Singh Nov 2024
झूठ बोलने वाला,
मुझे कतई भाता नहीं ।
ऐसा व्यक्ति मुझे विद्रूप लगता रहा है।
उससे बात करना तो दूर,
उसकी उपस्थिति तक को मैंने
बड़ी मुश्किल से सहा है।

उसका चलना ,फिरना ,नाचना,भागना।
उसकी सद्भावना या दुर्भावना ।
सब कुछ ही तो
मेरे भीतर
गुस्सा जगाती रही हैं।

आज अचानक एहसास हुआ,
कई दिनों से वह
नज़र नहीं आया !
इतना सोचना था कि
वह झट से मेरे सामने
हंसता ,मुस्कुराता, खिलखिलाता आ गया।
मुझ से बोला वह,
"अरे चुटकुले! आईना देख ।
मैं चेहरा हूं तेरा।
मुझसे कब तक नज़र चुरायेगा?
मुझे कदम-कदम पर
अनदेखा करता जाएगा।
झूठ बोलना आजकल ज़रूरी है
आज बना है यह युग धर्म,
कि चोरी सीनाज़ोरी करने वाले
जीवन में आगे बढ़ते हैं!
सत्यवादी तो बस यहां!
दिन-रात भूखे मरते हैं!
सो तू भी झूठ बोला कर,
जी भरकर कुफ्र तोला कर।"

मुझे अपना नामकरण अच्छा लगा था।
आईने को देख मेरा चेहरा खिल उठा था।
आईना भी मुझे इंगित कर बोल उठा था,
"अरे चुटकुले! अपना चेहरा देख।
रोनी सूरत ना बनाया कर।
खुद को कभी चुटकुला ना बनाया कर।
कभी-कभी तो अपना जी बहलाया कर।
किसी में कमियां ना ढूंढा कर,
बल्कि उनकी खूबियों को ढूंढ कर,
सराहा  कर।
उनसे ईर्ष्या भूल कर भी न किया कर।
कभी तो खुलकर जीया कर।
तब तू नहीं लगेगा जोकर।"
यह सब सुनकर मुझे अच्छा लगा।
मैंने खुद को हल्का-फुल्का महसूस किया।
Joginder Singh Nov 2024
अर्थ
शब्द की परछाई भर नहीं
आत्मा भी है
जो विचार सूत्र से जुड़
अनमोल मोती बनती है!
ये
दिन रात
दृश्य अदृश्य से परे जाकर
मनो मस्तिष्क में
हलचलें पैदा करते हैं,
ये मन के भीतर उतर
सूरज की सी रोशनी और ऊर्जा भरते हैं।


अर्थ
कभी अनर्थ नहीं करता!
बेशक यह मुहावरा बन
अर्थ का अनर्थ कर दे!
यह अपना और दूसरों का
जीना व्यर्थ नहीं करता!!
बल्कि यह सदैव
गिरते को उठाता है,
प्रेरक बन आगे बढ़ाने का
कारक बनता है।
इसलिए
मित्रवर!
अर्थ का सत्कार करो।
निरर्थक शब्दों के प्रयोग से
अर्थ की संप्रेषक
ध्वनियों का तिरस्कार न करो।
अर्थ
शब्द ब्रह्म की आत्मा है ,
अर्थानुसंधान सृष्टि की साधना है ,
सर्वोपरि ये सर्वोत्तम का सृजक है।
ये ही मृत्यु और जीवन से
परे की प्रार्थनाएं निर्मित करते हैं।

तुम अर्थ में निहित
विविध रंगों और तरंगों को पहचानो तो सही,
स्वयं को अर्थानुसंधान के पथ का
अलबेला यात्री पाओगे।
अपने भीतर के प्राण स्पर्श करते हुए
परिवर्तित प्रतिस्पर्धी के रूप में पहचान बनाओगे।
इस दुनिया का
सब से खतरनाक मनुष्य
अशिष्ट व्यक्ति होता है,

जो अपने व्यवहार से
आम आदमी और ख़ास आदमी तक को
कर देता है शर्मिन्दा।
वह अचानक
सामने वाले की इज्ज़त
अपने असभ्य व्यवहार से
कर देता है तार तार!
सभ्यता का लबादा उतार देता है।
अपने मतलब की जिन्दगी जीता है।

अभी अभी
मेरे शहर के बाईस बी सेक्टर के
भीड़ भरे बाज़ार में
एक शख़्श
अपने दोनों हाथों में
एक तख्ती उठाए
रक्तदान के लिए प्रेरित करते हुए
घर घर गली गली घूमते देखा गया है।
उसकी तख्ती पर लिखा है,
" रक्त दानी विशिष्ट व्यक्ति होता है,
जो प्राण रक्षक होता है।"
यह देख कर मुझे अशिष्ट व्यक्ति का
आ गया है ध्यान !
जो कभी भूले से भी नहीं दे सकता
किसी जरूरतमंद को प्राण दान !
बल्कि वह अपने अहम् की खातिर
बन जाता है शातिर
और हर सकता है
छोटी-छोटी बात के लिए प्राण।

इसलिए मुझे लगता है कि
अशिष्ट व्यवहार करने वाला
न केवल असभ्य बल्कि वह
होता है सबसे ख़तरनाक
जो जीवन में कभी कभी
न केवल अपनी नाक कटा सकता है,
यदि उसका वश चले
तो वह अच्छे भले व्यक्ति को
मौत के घाट उतरवा सकता है।
अशिष्ट व्यक्ति से समय रहते किनारा कीजिए!
खुद को जीवनदान दीजिए !!
०६/०३/२०२५.
चारों तरफ
अफरातफरी है।
लोग
प्रलोभन का होकर
शिकार ,
अनाधिकार
स्वयं को
सच्चा साबित
करने का कर
रहें हैं प्रयास।

अनायास
हमारे बीच
अश्लीलता
विवाद का मुद्दा
बन कर
अपनी उपस्थिति का
अहसास कराती है,
यह अप्रत्यक्ष तौर पर
समाज को
आईना दिखाती है।

हमारे आसपास
और मनों में
क्या कुछ अवांछित
घट रहा है ,
हमें विभाजित
कर रहा है।

कोई कुछ नहीं जानता।
यदि जानता भी तो कुछ भी नहीं कहता
क्योंकि
अश्लील कहे जाने का डर
भीतर ही भीतर
सताने लगता ,
जो सृजित हुआ है
उसे मिटाने को
बाध्य करता।

इर्द गिर्द
आसपास फैल
चुका है
मानसिक प्रदूषण
इस हद तक कि
पग पग पर  
साधारण जीवन स्थिति को भी
अश्लीलता के दायरे में
लाए जाने का खतरा
है बढ़ता जा रहा।
सवाल यह है कि
अश्लील क्या है ?
जो मन पर
एक साथ चोट करे ,
मन को गुदगुदाए और लुभाए ,
अंतरात्मा को भड़काए ,
इसके आकर्षण में
आदमी लगातार
फंसता जाए ,
उससे पीछा न छुड़ा पाए ,
अश्लीलता है।
यह टीका टिप्पणी,
गाली गलौज ,
अभद्र इशारे ,
नग्नता और बगैर नग्नता के
अपना स्थान बना लेती है ,
हमारी जागरूकता का
उपहास उड़ा देती है ,
अकल पर पर्दा डाल देती है।
यह अश्लीलता अच्छे भले को
महामूर्ख बन देती है,
आदमी को माफी मांगने ,
दंडित होने के लिए
न्यायालय की पहुँच में
ले जाती है।
कितना अच्छा हो ,
यदि आदमी के पास
मन को पढ़ने की सामर्थ्य होती
तब अश्लीलता इतनी तबाही मचाने में
असफल रहती ,
जितनी आजकल यह
अराजकता फैला रही है,
अच्छी भली जिंदगियां
इसकी जद में आकर
उत्पात मचाने को
आतुर नज़र आ रही हैं।
सच तो यह है कि
अश्लीलता हमारी सोच में
यदि जिन्दा है
तो इसका कारण
हमारे सोचने और जीवनयापन का तरीका है,
यदि हम प्रेमालाप, अपने यौन व्यवहार पर
नियंत्रण करना सीख जाएं
तो अश्लीलता
हमारे मन-मस्तिष्क में
कोई जगह न बना पाए ,
यह सृजन से जुड़
हमारी चेतना का कायाकल्प कर जाए।

अश्लीलता
आदमी के व्यवहार में
जिंदा रहती है,
आदमी
सभ्यता का मुखौटा
यदि शिष्टाचार वश ओढ़ना सीख ले ,
अश्लीलता विवादित न रह
गौण और नगण्य रह जाती है,
यह समाप्त प्रायः हो जाती है।
यह भी सच है कि
कभी कभी
यह हम सब पर हावी हो जाती है,
और हमारी चेतना को
शर्मसार कर जाती है,
हमें खुद की दृष्टि में
विदूषक सरीखा
और नितांत बौना बना देती है,
हमारी बौद्धिकता के सम्मुख
प्रश्नचिह्न अंकित कर देती है।
अश्लीलता
कभी कभी
हमें दमित और कुंठित सिद्ध करती है ,
यह मानव के चेहरे पर
अप्रत्याशित रूप से
तमाचा जड़ती है।
यह आदमी के जीवन में
तमाशा खड़ा कर देती है ,
उसे मुखौटा विहीन कर देती है,
यह बनी बनाई इज़्ज़त को
तार तार कर दिया करती है।
10/02/2025.
जब आप किसी के
ख़िलाफ़  कुछ कहने का
साहस जुटाने की
ज़ुर्रत करते हैं ,
आप जाने अनजाने
कितने ही
जाने पहचाने और अनजाने चेहरों को
अपना विरोधी बना लेते हैं !
जिन्हें आजकल लोग
दुश्मन समझने की भूल करते हैं !
आज दोस्त बनाने और दुश्मन कहलाने का
किस के पास है समय ?
यदि कभी समय मिल ही जाए
तो क्यों न आदमी इसे अपने
निज के विकास में लगाए ?
वह क्यों किसी से उलझने में
अपनी ऊर्जा को लगाए ?
वह निज से संवाद रचा कर
मन में शान्ति ढूंढने का
करना चाहे उपाय।
आज देखा जाए तो अश्लील कुछ भी नहीं !
क्योंकि आज एक छोटे से बच्चे के हाथ में
मोबाइल फोन दे दिया जाता है ,
ताकि बच्चा रोए न !
मां बाप की आज़ादी में
भूल कर दखल दे न !
जाने अनजाने अश्लीलता बच्चे के अवचेतन में
छाप छोड़ जाती है।
जबकि बच्चे को ढंग से
अच्छे बुरे का विवेक सम्मत फ़र्क करना नहीं आता।

आजकल
इंटरनेट का उपयोग बढ़ गया है,
इसका इस्तेमाल करते हुए
यदि भूल से भी
कुछ गलत टाइप हो जाए
तो कभी कभी अवांछित
आंखों के सामने
चित्र कथा सरीखा मनोरंजक लगकर
अश्लीलता का चस्का लगा देता है ,
जीवन के सम्मुख एक प्रश्नचिह्न लगा देता है।
आज सच को कहना भी अश्लील हो गया है !
झूठ तो खैर अश्लीलता से भी बढ़कर है।
हम अश्लीलता को तिल का ताड़ न बनाएं,
बल्कि अपने मन पर नियंत्रण करना खुद को सिखाएं।
यदि आदमी के पास मन को पढ़ने का हुनर आ जाए ,
तो यकीनन अश्लीलता भी शर्मा जाए ।
भाई भाई के बीच नफ़रत और वैमनस्य भर जाए ।
रामकथा के उपासक भी
महाभारत का हिस्सा बनते नज़र आएं।
क्यों न हम सब सनातन की शरण में जाएं।
वात्स्यायन ऋषि के आदर्शों के अनुरूप
समाज को आगे बढ़ाएं।
हमारा प्राचीन समाज कुंठा मुक्त था।
यह तो स्वार्थी आक्रमणकारियों का दुष्चक्र था,
जिसने असंख्य असमानता की
पौषक कुरीतियों को जन्म दिया,
जिसने हमारा विवेक हर लिया ,
हमें मानवता की राह से भटकने पर विवश कर दिया।
सांस्कृतिक एकता पर
जाति भेद को उभार कर
दीन हीन अपाहिज कर दिया।
अच्छे भले आदमियों और नारियों को
चिंतनहीन कर दिया ,
चिंतामय कर दिया।
सब तनाव में हैं।
आपसी मन मुटाव से
कमज़ोर और शक्तिहीन हो गए हैं।
आंतरिक शक्ति के स्रोत
अश्लीलता ने सुखा दिए हैं,
सब अश्लीलता के खिलाफ़
फ़तवा देने को तैयार बैठे हैं,
बेशक खुद इस समस्या से ग्रस्त हों।
सब भीतर बाहर से डर हुए हैं।
कोई उनका सच न जान ले !
उनकी पहचान को अचानक लील ले !!

अश्लीलता के खिलाफ़
सब को होना चाहिए।
इस बाबत सभी को
जागरूक किया जाना चाहिए।
ताकि
यह जीवन को न डसे !
बल्कि
यह अनुशासित होकर सृजन का पथ बने !!
२८/०२/२०२५.
Joginder Singh Dec 2024
जब तक खग
नभचर बना रहेगा
और
स्वयं के लिए
उड़ने की ललक को
अपने भीतर
ज़िन्दा रखेगा ,
तब तक ही
वह आजीवन  
संभावना के गगन में
स्वच्छंदता से उड़ान भरता रहेगा।
जैसे ही
वह अपने भीतर
उड़ने की चाहत को
जगाना भूलेगा ,
वैसे ही वह
अचानक
जाएगा थक
और
किसी षड्यंत्र का
हो जाएगा शिकार ,
वह खुद को
एक खुली कैद में
करेगा महसूस
और एक परकटे
परिन्दे सा होकर
भूलेगा चहकना ,
कभी
भूले से चहकेगा भी ,
तो अनजाने ही
अपने भीतर
भर लेगा दर्द ,
एकदम भीतर तक
होकर बर्फ़
रह जाएगा उदासीन।

वह धीरे धीरे
दिख पड़ेगा मरणासन्न ,
यही नहीं
वह इस जीवन में
असमय अकालग्रस्त होकर
कर जाएगा प्रस्थान।

क्या
तुम अब भी
उसे
किसी दरिन्दे
या फिर
किसी बहेलिए के
जाल में फंसते हुए
देखना चाहते हो ?
उसकी अस्मिता को ,
आज़ाद रहकर
निज की संभावना को तलाशते
नहीं ‌देखना चाहते हो ?

०४/०८/२०२०.
Joginder Singh Nov 2024
आज
देश नियंता पर
लगा रहा है कोई आरोप
तानाशाह होने का ।

उसे नहीं है पता ,
देश दुनिया संक्रमण काल से गुजर रही ।
बदमाश
सदाशयता पर हावी
होना चाहते हैं ,
उसे
घर की दासी समझते हैं ।
देश की बागडोर संभालना,
नहीं कोई है सरल काम,
इसकी राह में
मुश्किलें आती हैं तमाम ,
अगर उनसे ना सुलझा जाए,
तो अपूर्ण रह जाते सारे काम।
मुझे कभी-कभी
अपना पिता भी एक तानाशाह
जैसा लगता है ।
पर नहीं है वह एक तानाशाह ,
इस सच को हर कोई जानता है !
जानबूझकर अपनी अकड़ दिखाता है !!
जनता में सत्ताधारी की गलत छवि बनाता है।
संविधान खतरे में है ,जैसी बातें कहकर
जनता जनार्दन को मूर्ख बनाता है ।
क्या ऐसा करना
विपक्षी नेता को
सत्ता का सिंहासन दिला पाता है ?
बल्कि
ऐसा करने वाला
देश को गर्त में  पहुंचाता है।
वह आरोप लगाने से पहले
अपने  गिरेबान में झांके ।
तत्पश्चात
सत्ता के नेतृत्व कर्ता को
तानाशाह  कहे ,
अपनी तानाशाही पर नियंत्रण करे।

आज असली तानाशाह
आरोप लगाने वाले हैं।
क्या ऐसा कर के
वे सत्ता के नटवरलाल
बनना चाहते हैं ?
मुझे बताओ।
आज मुझे बताओ।
असली तानाशाह कौन?
सत्ता पर काबिज व्यक्ति
या फिर आरोप लगाने वाला,
एक झूठा  नारेटिव सेट करने वाला ?
मुझे बताओ। मुझे बताओ ।मुझे बताओ।
असली तानाशाह कौन ?
यदि इसका उत्तर पास है आपके,
शीघ्रता से मुझे बताओ।
अन्यथा गूंगे बहरे हो जाओ।
अब और नहीं
जीवन को उलझाओ।
Joginder Singh Nov 2024
गर्मी में ठंड का अहसास
और
ठंड में गर्मी का अहसास
सुखद होता है,
जीवन में विपर्यय
सदैव आनंददायक होता है।

ठीक
कभी कभी
गर्मी में तेज गर्मी का अहसास
भीतर तक को जला देता है,
यह किसी हद तक
आदमी को रुला देता है।
देता है पहले उमस,
फिर पसीने पसीने होने का अहसास,
जिंदगी एकदम बेकार लगती है,
सब कुछ छोड़ भाग जाने की बातें
दिमाग में न चाहकर भी कर जातीं हैं घर,
आदमी पलायन
करना चाहता है,
यह कहां आसानी से हो पाता है,
वह निरंतर दुविधा में रहता है।
कुछ ऐसे ही
ठंड में ठंडक का अहसास
भीतर की समस्त ऊष्मा और ऊर्जा सोख
आदमी को कठोर और निर्दय बना देता है,
इस अवस्था में भी
आदमी
घर परिवार से पलायन करना चाहता है,
वह अकेला और दुखी रहता है,
मन में अशांति के आगमन को देख
धुर अंदर तक भयभीत रहता है।
उसका यह अहसास कैसे बदले?
आओ, हम करें इस के लिए प्रयास।
संशोधन, सहिष्णुता,साहस,नैतिकता,सकारात्मकता से
आदमी के भीतर बदलते मौसमों को
विकास और संतुलित जीवन दृष्टि के अनुकूल बनाएं।
क्यों उसे बार बार थका कर
जीवन में पलायनवादी बनाएं?

ठंड में गर्मी का अहसास,
गर्मी में ठंड का अहसास,
भरता है जीवों के भीतर सुख।
इसके विपरीत घटित होने पर
मन के भीतर दुःख उपजता है ।
यह सब उमर घटाता है,
इसका अहसास आदमी को
बहुत बाद में होता है।
सोचता है रह रह कर, भावों में बह बह कर
कि अब पछताए क्या होत ,जब चिड़िया चुग गईं खेत।
Joginder Singh Nov 2024
प्रिया!

मैं
तुम्हारे
मन के भावों को चुराकर,
तुम्हारे
कहने से पहले,
तुम्हारे
सम्मुख व्यक्त करना चाहता हूँ।
..... ताकि
तुम्हारी
मुखाकृति पर
होने वाले प्रतिक्षण  
भाव परिवर्तन को
पढ़ सकूँ ,
तुम्हें  हतप्रभ
कर सकूँ ।

तुम्हारे भीतर
उतर सकूँ ।
तुम्हारी और अपनी खातिर ही
बेदर्द ,  बेरहम दुनिया से
लड़ सकूँ ।


तुम्हारा ,
अहसास चोर !!

८/६/२०१६..
मेरा पुत्र
जो है पूरा देसी
पर नाम है जिसका
अंग्रेज सिंह।
कुछ समय पहले
ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जाने की
थी जिसकी ख्वाइश!
बहुत सारा धन कमाने का
था जिसका ख्वाब!
घर पर अपने ही ढंग से रहता था ।
जिस का रहन सहन
उसके मां बाप को तनिक नहीं भाता था।
आजकल थोड़ा अक्लमंद बन गया है।

जब से अमेरिका से
मेरे भारतीय भाई लोग
डोनाल्ड ट्रंप की
अमेरिका फर्स्ट की
नीति की वज़ह से
भारत वापसी को हुए हैं
मजबूर !
जो अच्छे मज़दूर और
कामयाब व्यापारी बनने की
योग्यता रखते हैं !
उम्मीद है
वे अब सही राह चलेंगे ,
भारत की तरक्की के लिए
दिन रात उद्यम करेंगे !
भारत को
भारत प्रथम की नीति पर
चलने की राह दिखा कर
फिर से
सुख , समृद्धि और संपन्नता की
ओर ले जाने का प्रयास करेंगे।

अंग्रेज सिंह
अब भारत में रहकर
अपना काम धंधा जमाना चाहता है,
वह ज़माने के पीछे न भाग
अपना दिमाग लगा
जीवन में
कुछ करना चाहता है ,
मेहनत कर के कुछ निखरना चाहता है।

अपने अंग्रेज सिंह के
दादा स्वदेश सिंह
अब उसे कहते हैं कि
अंग्रेज !तुम इतना धन संचित करो
कि डोनाल्ड ट्रंप के देश ही नहीं ,
दुनिया भर के देशों में
टूरिस्ट बन सैर सपाटा करो।
उनकी आर्थिकता को अपने ढंग से बढ़ाओ।
यह नहीं कि विदेश से शर्मिंदा हो कर
अपने देश में लौट के आओ।
बल्कि अपने साथ
एक विदेशी नौकर
मेहनत मशक्कत करने के लिए
लेकर आओ।
भारत का आदर और सम्मान
फिर से बढ़ाओ।
२०/०२/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
अब अक्सर
भीतर का चोर
रह रहकर
चोरी को उकसाता है,
शॉर्टकट की राह से
सफलता के स्वप्न दिखाता है
पर...
विगत का अनुभव
रोशन होकर
ईमानदार बनाता है।
वह
चोरी चोरी
चुपके चुपके
हेरा फेरी के नुकसान गिनाता है!
अनुशासित जीवन से जोड़ पता है!!



भीतर का चोर
अपना सा मुंह लेकर रह जाता है।
बावजूद इसके
वह शोर मचाता है ,
देर तक चीखता चिल्लाता है।
अंतर् का चोर
भीतर की शांति भंग करना चाहता है।
जब उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है,
तब वह थक हार कर सो जाता है।
अच्छा है वह सोया रहे,
भीतर का चिराग जलता रहे ,
जीवन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहे!
बाहर भीतर चिंतन व्यापा रहे!
मन के भीतर सदैव शांति बनी रहे!
अंतर्मन में शुचिता बनी रहे!!
अंतर्मन का चोर सदैव असफल रहे।
Joginder Singh Nov 2024
शक की परिधि में आना
नहीं है कोई अच्छी बात,
यह तो स्वयं पर
करना है आघात।

अतः जीवन में
आत्महंता व्यवहार
कभी भी न करो,
अपने मन को काबू में करो।
अपने क्रिया कलापों को
शुचिता केन्द्रित बनाओ।
अपने नैतिकता विरोधी
व्यहवार को छोड़ दो।
खुद को संदिग्ध होने से बचाओ।
शक की परिधि में आने से खुद को रोको।
एक संयमित जीवन जीने का आगाज़ करो।

तुम सब अपना जीवन
कीचड़ में पले बढ़े
पुष्पित पल्लवित हुए
कमल पुष्प सा व्यतीत करो।

आज के प्रलोभन भरपूर
जीवन में शुचिता को अपनाओ।
यह मन को शुद्ध बनाती है।
यह व्यक्ति को प्रबुद्ध कर
मन के भीतर कमल खिला कर
जीवन को
जीवन्त और आकर्षण भरपूर
बनाती है,
यह शुचिता
व्यक्ति के भीतर
सकारात्मकता के बहुरंगी पुष्पों को
खिलाती है।

मित्र प्यारे,
तुम अपने भीतर
शुचिता के कमल खिलाओ। ताकि तुम स्वत:
जीवन को साधन संपन्नता का
उपहार दे पाओ ।
जीवन में
लक्ष्य सिद्धि तक
सुगमता और सहजता से
पहुंच पाओ।

दोस्त,
तुम अपने भीतर
शुचिता के कमल खिलाओ।
अंतर्मन में परम की अनुभूति कर पाओ।
  २८/११/२०२४.
Joginder Singh Nov 2024
बहुत बार
नौकर होने का आतंक
जाने अनजाने
चेतन पर छाया है ,
जिसने अंदर बाहर
रह रहकर तड़पाया है ।

बहुत बार
अब और अधिक समय
नौकरी न करने के ख़्याल ने ,
नौकर जोकर न होने की ज़िद्द ने
दिल के भीतर
अपना सिर उठाया है ,
इस चाहत ने
एक अवांछित अतिथि सरीखा होकर
भीतर मेरे बवाल मचाया है ,
मुझे भीतर मतवातर चलने वाले
कोहराम के रूबरू कराया है।


कभी-कभी कोई
अंतर्घट का वासी
उदासी तोड़ने के निमित्त
पूछता है धीरे से ,
इतना धीरे से ,
कि न  लगे भनक ,
तुम्हारे भीतर
क्या गोलमाल चल रहा है?
क्यों चल रहा है?
कब से चल रहा है?

वह मेरे अंतर्घट का वासी
कभी-कभी
ज़हर सने तीर
मेरे सीने को निशाना रख
छोड़ता है।
और कभी-कभी वह
प्रश्नों का सिलसिला ज़ारी रखते हुए ,
अंतर्मन के भीतर
ढेर सारे प्रश्न उत्पन्न कर
मेरी थाह  लेने की ग़र्ज से
मुझे टटोलना शुरू कर देता है ,
मेरे भीतर वितृष्णा पैदा कर देता है ।


मेरे शुभचिंतक मुझे  अक्सर ‌कहते हैं ।
चुपचाप नौकरी करते रहो।
बाहर बेरोजगारों की लाइन देखते हो।
एक आदर्श नौकरी के लिए लोग मारे मारे घूमते हैं।
तुम किस्मत वाले हो कि नौकरी तुम्हें मिली है ।

उनका मानना है कि
दुनिया का सबसे आसान काम है,
नौकरी करना, नौकर बनना।
किसी के निर्देश अनुसार चलना।
फिर तुम ही क्यों चाहते हो?
... हवा के ख़िलाफ़ चलना ।

दिन दिहाड़े , मंडी के इस दौर में
नौकरी छोड़ने की  सोचना ,
बिल्कुल है ,
एक महापाप करना।

जरूर तेरे अंदर कुछ खोट है ,
पड़ी नहीं अभी तक तुझ पर
समय की चोट है, जरूर ,जरूर, तुम्हारे अंदर खोट है ।
अच्छी खासी नौकरी मिली हुई है न!
बच्चू नौकरी छोड़ेगा तो मारा मारा फिरेगा ।
किसकी मां को मौसी कहेगा ।
तुम अपने आप को समझते क्या हो?

यह तो गनीमत है कि  नौकरी
एक बेवकूफ प्रेमिका सी
तुमसे चिपकी हुई है।
बच्चू! यह है तो
तुम्हारे घर की चूल्हा चक्की
चल रही है ,
वरना अपने आसपास देख,
दुनिया भूख ,बेरोजगारी ,गरीबी से मर रही है ।

याद रख,
जिस दिन नौकरी ने
तुम्हें झटका दे दिया,
समझो जिंदगी का आधार
तुमने घुप अंधेरे में फेंक दिया।
तुम सारी उम्र पछताते नज़र आओगे।
एक बार यह छूट गई तो उम्र भर पछताओगे।
पता नहीं कब, तुम्हारे दिमाग तक
कभी रोशनी की किरण पहुंच पाएगी।

यदि तुमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी,
तो तुम्हारी कीमत आधी भी न रह जाएगी ।
यह जो तुम्हारी आदर्शवादी सोच है न ,
तुम्हें कहीं का भी नहीं छोड़ेगी।
न रहोगे घर के , न घाट के।
कैसे रहोगे ठाठ से ?
फिर गुजारा चलाओगे बंदर बांट से ।


इतनी सारी डांट डपट
मुझे सहन करनी पड़ी थी।
सच! यह मेरे लिए दुःख की घड़ी थी।
मेरी यह चाहत धूल में मिली पड़ी थी।

मेरे अंतर्मन ने भी मुझे डांट लगाई।
उसने कहा,"अरे नासमझ! अपनी बढ़ती उम्र का
कुछ तो ख्याल कर,
बेवजह तू बवाल न कर।
नौकरी छोड़ने की सोच कर,
तूं भर लेगा अपने अंदर डर।
मारा  मारा फिरेगा डगर डगर।
अपनी नहीं तो
घरवाली और बच्चों की फ़िक्र कर ।

तुमसे तो
चिलचिलाती तेज धूप में
माल असबाब से भरी रिक्शा,
और उसे पर लदी सवारियां तक
ढंग से खींचीं न जाएगी।
यह पेट में जो हवा भर रखी है,
सारी पंचर होकर
बाहर निकल जाएगी।
फिर तुम्हें शूं शूं शूं  शू शूंशूंश...!!!
जैसी आवाज ही सुनाई देगी ,
तुम्हारी सारी फूंक निकल जाएगी।
हूं !बड़ा आया है नौकरी छोड़ने वाला !
बात करता है नौकरी छोड़ने की !
गुलामी से निजात पाने की!!
हर समय यह याद रखना ,....
चालीस साल
पार करने के बाद
ढलती शाम के दौर में
शरीर कमज़ोर हो जाता है
और कभी-कभी तो
यह ज़वाब देने लगता है।
इस उम्र में यदि काम धंधा छूट जाए,
तो बड़ी मुश्किल होती है।
एक अदद नौकरी पाने के लिए
पसीने छूट जाते हैं।


यह सच है कि
बाज़ दफा
अब भी कभी-कभी
एक दौरा सा उठता है
और ज्यादा देर तक
नौकरी न करने का ख़्याल
पागलपन, सिरफ़िरेपन की हद तक
सिर उठाता है ।
पर अलबेला अंतर्घट का वासी वह
कर देता है करना शुरू,
रह रहकर, कुछ उलझे सुलझे सवाल ।
वह इन सवालों को
तब तक लगातार दोहराता है,
जब तक मैं मान न लूं उससे हार ।
यही सवाल
मां-बाप जिंदा थे,
तो बड़े प्यार और लिहाज़ से
मुझसे पूछा करते थे।
वे नहीं रहे तो अब
मेरे भीतर रहने वाला,
अंतर्घट का वासी
आजकल पूछने लगा है।
सच पूछो तो, मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि
उसके सामने
मेरा जोश और होश
ठंड पड़ जाता है,
ललाट पर पसीना आ जाता है।
अतः अपनी हार मानकर
मैं चुप कर जाता हूं।
अपना सा मुंह लेकर रह जाता हूं ।


मुझे अपना अंत आ गया लगता है ,
अंतस तक
दिशाहीन और भयभीत करता सा लगता है।

सच है...
कई बार
आप बाह्य तौर पर
नज़र आते हैं
निडर व आज़ाद
पर
आप अदृश्य रस्सियों से
बंधे होते हैं ,
आप कुछ नया नहीं
कर पाते हैं,
बस !अंदर बाहर तिलमिलाते हैं ,
आपके डर अट्टहास करते जाते हैं।
हमारे यहां
अज्ञान के अंधेरे को
बदतर
अंधा करने वाला
माना जाता है।
फिर भी
कितने लोग अपने भीतर
झांककर
उजास की
अनुभूति कर पाते हैं ?
बल्कि वे जीवन में
मतवातर
भटकते रहते हैं।
अचानक रोशनी जाने से
मैं अपने आस पास को ढंग से
देख नहीं पाया था,
फलत: मेरा सिर
दीवार से जा टकराया था।
कुछ समय तक
मैं लड़खड़ाया था,
बड़ी मुश्किल से
ख़ुद को संभाल पाया था।
बस इस छोटी सी चूक से
मुझे अंधेरा अंधा कर देता है ,
जैसा खयाल मनो मस्तिष्क में
कौंध गया था।
इस पल मैं सचमुच
चौंक गया था।
यह सच है कि
घुप अंधेरा सच में
आदमी की देखने की सामर्थ्य को
कम कर देता है।
वह अंधा होकर
अज्ञान की दीवार से
टकरा जाता है।
इस टकरा जाने पर
उठे दर्द से
वह चौकन्ना भी हो जाता है।
वह संभलने की कोशिश कर पाता है।
यकीनन एक दिन वह
गिरकर संभलना सीख जाता है।
वह अथक परिश्रम के बूते आगे बढ़ पाता है।
०७/०१/२०२५.
Joginder Singh Dec 2024
स्वेच्छा से
किया गया कर्म
हमें कर्मठ बनाकर
धर्म की अनुभूति
कराता है ,
अन्यथा
जबरन थोपा गया कार्य
हमारे जीवन के भीतर
ऊब और उदासीनता
पैदा कर
हमारी सोच को
बोझिल व थकाऊ
बनाकर भटकने के लिए
बाध्य करता है।

स्वेच्छा से
किया गया कार्य
हमें शुचिता के मार्ग का
अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित
करता है और यह हमें
जीवन पथ पर
उत्तरोत्तर
स्वच्छ मानसिकता का
धारणी बनाता है ,
हमें पवित्रता की निरंतर
अनुभूति कराता है ,
अन्यथा
जबरन थोपा गया कार्य
हमें अस्वाभाविकता का दंश देकर
पलायनवादी और महत्वाकांक्षी सोच
अपनाने को बाध्य कर
रसविहीन और हृदयहीनता को
बनाए रखता है।

आओ
आज
हम स्वाभाविकता को चुनें
ताकि जीवन में
कभी परेशान होकर
हताशा और निराशा में जकड़े जाकर
अपना सिर न धुनें ।
हम सदैव अपनी अन्तश्चेतना की ही सुनें।
अपनी अंतर्दृष्टि को
प्रखर करते हुए
जीवन पथ पर आगे बढ़ें।
हम सदैव कर्मठता का ही वरण करें।
२५/१२/२०२४.
जीव के भीतर
जीवन के प्रति
बना रहना चाहिए आकर्षण
ताकि जीवन के रंगों को देखने की
उत्कंठा
जीव , जीव के भीतर
स्पष्टता और संवेदना के
अहसासों को भरती रहे ,
उन्हें लक्ष्य सिद्धि के लिए
प्रेरित करती रहे ,
मन में उमंग तरंग बनी रहे।

कभी अचानक
जीवन में
अस्पष्टता का
हुआ प्रवेश कि
समझो
जीवन की गति पर
लग गया विराम।
देर तक
रुके रहने से
जीवन में
मिलती है असफलता ,
जो सतत चुभती है ,
असहज करती है ,
व्यथित करती है ,
व्यवहार में उग्रता भर देती है।
यह जिन्दगी को कष्टदायक कर देती है।

अक्सर
यह आदमी को
असमय थका देती है ,
उसे झट से बूढ़ा बना देती है।

यह सब न केवल
जीवन में रूकावटें पैदा करती है ,
बल्कि यह जिन्दगी में
निराशा और हताशा भर कर
समस्त उत्साह और उमंग को
लेती है छीन ,
भीतर का संबल
आत्मबल होता जाता क्षीण।
आदमी धीरे धीरे होने लगता समाप्त।
वह अचानक छोड़ देता करने प्रयास।
फलत: वह जीवन की दौड़ में से हो जाता बाहर ,
वह बिना लड़े ही जाता , जीवन रण को हार।
यही नहीं वह भीतर तक हो जाता भयभीत
कि पता नहीं किस क्षण
अब उड़ने लगेगा उसका उपहास !
यही सोच कर वह होने लगता उदास !!
जीवन का आकर्षण महज एक तिलिस्म लगने लगता !
धीरे धीरे निरर्थकता बोध से जनित
जीवन में अपकर्षण बढ़ने है लगता !!
११/०२/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
हार की कगार पर
खड़े रहकर भी
जो जीत के स्वप्न ले!
ऐसा नेता
देश तुम्हें मिले !

हर पल सार्थकता से जुड़ा रहे,
ऐसा बंधु
सभी को मिले!
जिसकी उपस्थिति से
तन मन खिले!

०१/१२/२००८.
आज असंतोष की आग
हर किसी के भीतर
धधक रही है।
यह आग
दावानल सी होकर
निरन्तर बढ़ती जा रही है
और सुख समृद्धि और संपन्नता को
झुलसाती जा रही है।
यह कभी रुकेगी भी कि नहीं ?
इस बाबत कुछ कहा नहीं जा सकता ;
आदमी का लोभ,लालच, प्रलोभन
सतत दिन प्रति दिन बढ़ रहा है,
फलत: आदमी असंतोष की आग में
झुलसता जा रहा है।
वह इस अग्नि दहन से कैसे बचे ?
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है।
उसके भीतर अस्पष्टता का बादल घना होता जा रहा है।
यह कभी बरसेगा नहीं , यह भ्रम उत्पन्न करता जा रहा है।
असंतोष जनित आग निरन्तर रही धधक।
पता नहीं यह कब अचानक उठे एकदम भड़क ?
कुछ कहा नहीं जा सकता ।
इससे आत्म संयम से ही है बचा जा सकता।
और कोई रास्ता सूझ नहीं रहा।
मनो मस्तिष्क में इस आग से उत्पन्न धुंधलका
अस्पष्टता की हद तक बढ़ता जा रहा।
इस आग की तपिश से हरेक है घबरा रहा।
१६/०१/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
आईना
जो दीवार से सटा था ,
अर्से से उपेक्षित सा टंगा था ।
जिस पर धूल मिट्टी पड़ती रही ,
संगी दीवार से पपड़ियां उतरती रहीं ।
आजकल बेहद उदासीन है ,
उसका भीतर अब हुआ गमगीन है ।
बेशक आसपास उसका बेहिसाब रंगीन है ।

आज बीते समय की याद में खोया है।


रूप
जो मनोहारी था,
मंत्र मुग्ध करता था ।
जो था कभी
सचमुच
आकर्षण से भरा हुआ,
अब हुआ फीका और मटमैला सा ।
Joginder Singh Dec 2024
अब
सबसे ख़तरनाक आदमी
सच बोलने वाला
हो गया है
और
झूठ का दामन
पकड़कर
आगे बढ़ने वाला
आदर्श
हो गया है।

क्या करें लो
आजकल
ज़मीर
कहीं भागकर
गहरी नींद में
सो गया है
और
सच्चा
झूठों की भीड़ में
खो गया है।

आजकल
सच्चा मानुष
अपने भीतर
मतवातर
डर भरता
रहता है ,
जबकि
झुके मानुष की
सोहबत से
सुख मिलता है।

आजकल
भले ही
आदमी को
अपने साथी की
हकीकत
अच्छे से
पता हो ,
उसके जीवन में
पास रहने से
सुरक्षित होने का
आश्वासन भरा
अहसास
बना रहता है।

बेशक
जीवन मतवातर
समय की चक्की में
पिसता सा लगे
और
आदमी सबकी
निगाहों से
खुद को छुपाते हुए
अंदर ही अंदर
सिसकियां भरता रहे ,
वह चाहकर भी
झूठे का दामन
कभी छोड़ेगा नहीं!
जीवन का पल्लू
कभी झाड़ेगा नहीं!
वह उसे बीच
मझधार
छोड़कर
कभी भागेगा नहीं!

आजकल
यही अहसास बहुत है
जीवन को अच्छे से
जीने के लिए।
कभी-कभी पीने,
खुलकर हंसने के लिए।
बेशक हरेक हंसी के बाद
खुद को ठगने का अहसास
चेतना पर हावी हो जाए।
फलत:
आजकल
आदमी सतत्
झूठे के संग
घिसटता रहता है!
उसके जीवन से
चुपके चुपके से
सच का आधार
खिसकता रहता है!!
वह जीवन में
उत्तरोत्तर अकेला
पड़ता जाता है।
आजकल हर कोई
सच्चे को तिरस्कृत कर
झूठे से प्रीत रचाना
चाहता है क्योंकि जीवन
भावनाओं में बहकर
कब ढंग से चलता है ?
स्वार्थ का वृक्ष ही
अब ज़्यादा फलता-फूलता है।
आदमी आजकल
अल्पकालिक लाभ
अधिक देखता है,
भले ही बहुत जल्दी
जीवन में पछताना पड़े।
सबसे अपना मुंह छिपाना पड़े।
२८/१२/२०२४.
बचपन में
मां थपकी दे दे कर
बुला देती थी
निंदिया रानी को ,
देने सुख और आराम।
अब मां रही नहीं,
वे काल के प्रवाह में बह गईं।
अब बुढ़ापे में
निंदिया रानी
अक्सर झपकी बन
रह रह कर देती है सुला,
किसी हद तक
अवसाद देती है मिटा।
अब निंदिया रानी
लगने लगी है मां,
जो देने लगती है
सुख और आराम की छाया!
जिससे हो जाती है ऊर्जित
जीवन की भाग दौड़ में थकी काया !!
अब निंदिया रानी बन गई है मां!
जो सुकून भरी थपकी दे दे कर ,
मां की याद दिलाने लगती है,
सच में मां के बगैर
जिन्दगी आधी अधूरी सी लगती है।
अब निंदिया रानी अक्सर
कुंठा और तनाव से दिलाने निजात
मीठी मीठी झपकी की दे देती है सौगात।
आजकल निंदिया रानी मां सी बन कर
जीवन यात्रा में सुख की प्रतीति कराती है,
यह आदमी को बुढ़ापे में
असमय बीमार होने से बचाया करती है।
०४/०३/२०२५.
कलयुग है ,
आजकल भाई
आपस में
छोटी छोटी बातों पर
लड़ पड़ते हैं ,
वे मरने मारने पर
उतारू हो जाते हैं !
काला उर्फ़ सुरिंदर ने
दो दिन पहले
बातों बातों में कहा था कि
जो भाई शादी से पहले
एक दूसरे की रक्षा में
गैरो से लड़ने को रहते हैं तैयार !
वही भाई समय आने पर
एक दूसरे को मारने पर
हो जाते हैं आमादा,
एक दूसरे के पर्दे उतार
शर्मसार कर देते हैं।
अब रामायण काल नहीं रहा !
लक्ष्मण सा भाई विरला ही मिलता है।
बल्कि भाई भाई का ख़ून कर
बन जाया करता है क़ातिल।

अभी यह सब सुने महज दो दिन हुए हैं कि
इसे प्रत्यक्ष घटित होते
अख़बार के माध्यम से जान भी लिया।
अख़बार में एक खबर सुर्खी बन छपी है ,
" ढाबे पर ट्रक चालक ने शराब के नशे में
बड़े भाई को पीट पीटकर मार डाला..."

सनातन में "रामायण " में
आदर्श भाइयों के बारे में
उनके परस्पर प्रेम और सौहार्दपूर्ण
जीवन बाबत दर्शाया गया है।
वहीं "महाभारत" में
कौरवों और पांडवों के बीच
भाइयों भाइयों में होने वाले
विवाद और संवाद की बाबत
विस्तार से कथा के रूप में
बताया गया है,
आदमी की समझ को
बढ़ाने की खातिर
एक मंच सजाया गया है।

मैं इस बाबत सोचता हूँ
तो आता है ख्याल।
आज कथनी और करनी के अंतर ने ,
रिश्तों में स्वार्थ के हावी होने ने
भाई को भाई का वैरी बना दिया है।
स्वार्थ के रिश्तों ने
रामायण के आदर्श भाइयों को
महाभारत करने के लिए उकसाया है।
पता नहीं कहाँ भाई भाई का प्यार जा छुपाया है ?
आदर्श परिवार को भटकाव के रास्ते पर दिया है छोड़ !
पता नहीं कब तक भाई
अपने रिश्ते को एक जुट रख पाएंगे !
या फिर वे भेड़चाल का शिकार होकर
आपस में लड़ कर समाप्त हो जाएंगे !!
आज भाईचारा बचाना बेहद ज़रूरी है ,
ताकि समाज बचा रहे !
देश स्वाभिमान से आगे बढ़ सके !!
०४/०३/२०२५.
कल की तरह
आज का दिन भी
बीत गया ,
बहुत कुछ भीतर भरा था
पर वह भी
लापरवाही के छेद की
वज़ह से
रीत गया।
अब पूर्णतः खाली हूँ ,
सो अपनी बात रख रहा हूँ।

कल
मैं घर पर ही रहा ,
बाहर चलने वाली
ठंडी हवाओं से डरता रहा।
सारा दिन अख़बार,
टेलीविजन,मोबाइल ,
बिस्तर या फिर चाय के
आसरे बीत गया।
फिर भी मैं रीता ही रहा।
देश, समाज, परिवार पर
बोझ बना रहा।

आज दफ़्तर में
कुछ ज़रूरी काम था,
सो घर से समय पर निकला
और ...
दफ़्तर छोड़ आगे निकल गया
जहां एक मित्र से मिलना हुआ
उसने हृदय विदारक ख़बर सुनाई।
मेरे गाँव का एक पुलिसकर्मी
नशे में डूबे बड़े घर के बिगड़ैल बच्चों की
लापरवाही का शिकार हो गया।
वह नाके पर डयूटी दे रहा था।
उसने कार में सवार लड़कों को
रुकने का इशारा किया ही था कि
वे लड़के उसे रौंदते हुए
कार भगा कर ले गए।
पता नहीं वे क्यों डर गए ?
घबराहट में वे अनर्थ कर गए।
फलत: वह बुरी तरह से घायल हुआ।
पहले उसे रूपनगर के राजकीय हस्पताल ले जाया गया ।
उसके बाद उन्हें चंडीगढ़ स्थित पीजीआई में
दाखिल करवाया गया।
जहां ऑपरेशन होने के बावजूद
उन्हें बचाया न जा सका।

आज उनका अंतिम संस्कार है।
यह सब कुछ जानकर
मैं उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुआ।
बड़ा हृदय विदारक माहौल था।
एक संभ्रांत परिवार का कमाऊ सदस्य
अराजक तत्वों की भेंट चढ़ गया ।
परिवार पर अचानक दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।

शाम सात बजे घर पहुंचा
तो मैं थोड़ा उदास और निराश था।
जिस सहृदय आदमी की विनम्रता को
सब कल तक सराहते थे ,
वह आज अचानक मानवीय क्रूरता का
बन गया था शिकार।
वह जन रक्षक था
पर अराजकता के कारण
खुद को बचा नहीं पाया।
वह दुर्घटना ग्रस्त होकर
जीवन में संघर्ष करते करते
चिर निद्रा में सो गया।
एक संवेदनशील व्यक्ति
काल के भंवर में खो गया।

मोबाइल पर उनके दाह संस्कार की बाबत
एक वीडियो डाली गई थी,
जिसमें अंतिम अरदास से लेकर
पुलिस कर्मियों के सैल्यूट करने,
सलामी देने की प्रक्रिया दर्शाई गई थी।

पुलिस के जवान
जब तब
चौबीसों घंटे
कभी भी
कहीं भी
अपनी डयूटी ढंग से निभाते हैं
तब भी वे
असुरक्षित क्यों होते जाते हैं ?
असमय
वे हिंसा का शिकार बन जाते हैं।
इस संबंध में
सभी को सोचना होगा।

इस समय मैं
कल और आज के दिन के बारे में
विचार कर रहा हूँ ,
आदमी अपने को हर पल व्यस्त रखे
तो ही अच्छा ,
वरना सुस्ती में
दिन कुछ खो जाने का अहसास कराता है।
आदमी के जीवन का एक और दिन
काल की भेंट चढ़ जाता है।
आदमी के हाथ पल्ले कुछ नहीं पड़ता है।
उसका जीवन पछतावे में बीतने लगता है।
आदमी कर्मठता की राह चले तो दिन भी अच्छे भले लगें।
वह कल ,आज और कल का भरपूर आनंद ले।
ताकि जीवन में सुख समृद्धि का अहसास
तन और मन को प्रफुल्लित करता रहे।
२३/०१/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
वेदों, गीता, रामायण, महाभारत की
सृजन स्थली
भारतवर्ष
अब
आज के भागम भाग वाले
काल खंड में
महाभारत का स्वरूप भर
प्रतीत होता है।
हर कहीं छोटे बड़े
खंडित स्वरूपों में महाभारत
देश
और दुनिया में मंचित की
जा रही है।
लगता है महाभारत का युद्ध
अभी तक
जारी है।
यहां वहां चारों ओर
अंधकार फैला हुआ है।
छल प्रपंच के मध्य
यहां हर कोई
एक दूसरे को मार रहा है।
यहां हर कोई धीमी मौत मर रहा है।
अर्जुन सरीखा,जो लड़ने में सक्षम है,
जीवन की युद्धभूमि से भाग रहा है।
यहां हर कोई पार्थ की प्रतीक्षा कर रहा है।
इस सब के बावजूद
हर कोई अपना अपना युद्ध लड़ रहा है।
१५/११/२०२४.
Joginder Singh Nov 2024
आज का आदमी
दौड़ धूप में उलझ
कल और कल के बीच
फंसा हुआ सा
लगा रहा है
अस्तित्व अपने पर ग्रहण।


आज की दुनिया में
नाकामयाब को
लगता है
हर कोई एक जालसाज़!
कुटिल व दग़ाबाज़!!


वज़ह....
आज के आदमी की
धड़कन ,
कलयुग के दौर में
हो चुकी है
एक भटकन भर,
पल पल आज आदमी रहा मर।


आज आदमी
अपने आप में
एक मशीन हो गया है।
'कल' युग में उसका
सुख, चैन,करार
सर्वस्व
भेड़ चाल के कारण
कहीं खो गया है।


ख़ुद को न समझ पाना
उसके सम्मुख
आज
एक  संगीन जुर्म सा
हो गया है।


जिस दिन
वह समय की नदिया की
कल  कल से
खुद को जोड़ेगा,
वह  उस दिन
दुर्दिनों के दौर में भी
सुख,सुविधा, ऐश्वर्य को भोगेगा।
फिर कभी
नहीं
वह लोभ लालच का
शिकार होकर ,
अधिक देर तक
अंधी दौड़ का
अनुसरण कर भागेगा।
आज समाज में
असंतोष की आग
दावानल बनी हुई
सब कुछ भस्मित करती
जा रही है ,
उसके मूल्य
दिनोदिन
अवमूल्यन की राह
बढ़ चले हैं,
सब भोग विलास की राह पर
चल पड़े हैं।
सभी के भीतर
डर,आक्रोश, सनसनी
उत्पन्न होती जा रही है ,
हर वर्ग में तनातनी
बढ़ती जा रही है।
ऐसे समय में
समाज क्या करे ?
वह अपने नागरिकों में
कैसे सार्थक सोच विकसित करे ?
वह किन से
सुख समृद्धि और संपन्नता की आस करे
ताकि उसका मूलभूत ढांचा
सकारात्मकता को
बरकरार रख सके ,
इसमें दरारें न आ सकें।
इसमें और अधिक बिखराव न हो।
कहीं कोई गुप्त तनाव न हो ,
जिससे विघटन की रफ्तार कम हो सके ,
समाज में मूल्य चेतना बची रह सके।

आज समाज
क्यों न स्वयं को
पुनर्संगठित करे !
समाज
निज को
समयोचित बनाकर
अपने विभिन्न वर्गों में
असंतोष की ज्वाला को
नियंत्रण में रखने के लिए
निर्मित कर सके कुछ सार्थक उपाय !
वह समायोजन की और बढ़े !
इसके साथ ही वह अंतर्विरोधों से भी लड़े !!
ताकि सब साम्य भाव को अनुभूत कर सकें !!
२३/०२/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
कम दाम में
बादाम खाने हों
तो बंदा चतुर होना चाहिए।

अधिक दाम दे कर
धक्के खाने हों
तो बंदा अति चतुर होना चाहिए।

एक बात कहूं
बंदा,जो सुन ले, सभी की
करे अपनी मर्ज़ी की ।
वह कतई न ढूंढना चाहे
किसी में ‌कोई भी कमी पेशी।
ऐसा इन्सान
न केवल सम्मान पाता है,
सभी से हंसी-मजाक कर पाता है,
बल्कि सभी की कसौटी पर खरा उतरता है।
ऐसा शख्स आज़ाद परिंदे सरीखा होता है,
जिससे दोस्ती का चाहवान हर कोई होता है।
ऐसा आदमी न केवल भाई की कमी हरता है,
बल्कि उसकी सोहबत से हर कोई खुशी वरता है।
मित्र वर! एक पते की बात कहूं,
वह शख्स मुझे तुम्हारे   जैसा लगता है।


दोस्त,
आज़ाद परिंदों की सोहबत कर
ताकि मिट सकें बेवजह के डर ।
कतई न अपनी आज़ादी
किसी आततायी के पास गिरवी रख ,
ताकि तुम अपनी मंजिल की तरफ़ बेख़ौफ़ सको बढ़ ।

१०/०६/२०१६.
तुम्हारे साए में
तुम्हारे आने से
परम सुख मिलता है , अतिथि !
हमारा सौभाग्य है कि
आपके चरण अरविंद इस घर में पड़े ।
तुम्हारे आने से इस घर का कण कण
खिल उठा है।
मन परम आनंद से भर गया है।
इस घर परिवार का
हरेक सदस्य पुलकित और आनंदित हो गया है ।

जब आपका मन करे
आप ख़ुशी ख़ुशी यहाँ
आओ अतिथि !
हम सब के भीतर
जोश और उत्साह भर जाओ।
तुम हम सब के सम्मुख
एक देव ऋषि से कम नहीं हो ,बंधु !
हम सब "अतिथि देवो भव: "के बीज मंत्र को
तन मन से शिरोधार्य कर
जीवन को सार्थक करना चाहते हैं , अतिथि !
तुम्हारे दर्शन से ही
हम प्रभु दर्शन की कर पाते हैं अनुभूति,
हे प्रभु तुल्य अतिथि !!

एक बार आप सब
मेरे देश और समाज में
अतिथि बनकर पधारो जी।
आप आत्मीयता से
इस देश और समाज के कण कण को
सुवासित कर जाओ।
आपकी मौजूदगी और भाव वात्सल्य के
जादू से
यह जीवन और संसार
रमणीय बन सका है, हे अतिथि!
आपके आने से ,
आतिथ्य सुख की कृपा बरसाने से ,
इस सेवक की प्रसन्नता और सम्पन्नता
निरंतर बढ़ी है।
जीवन की यह अविस्मरणीय निधि है।
आप बार बार आओ, अतिथि।
आप की प्रसन्नता से ही
यहां सुख समृद्धि आती है।
वरना जिंदगी अपने रंग और ढंग से
अपने गंतव्य पथ पर बढ़ रही है।
यह सभी को अग्रसर कर रही है।
२५/०८/२००५.
Joginder Singh Dec 2024
आतंक
आग सा बनकर
बाहर ही नहीं
भीतर भी बसता है ,
बशर्ते
आप उसे  
समय रहते
सकें पकड़
ताकि
शांति के
तमाम रास्ते
सदैव खुले रहें ।

आतंक
हमेशा
एक अप्रत्याशित
घटनाक्रम बनकर
जन गण में
भय और उत्तेजना भरकर
दिखाता रहा है
अपनी मौजूदगी का असर ।

पर
जीवन का
एक सच यह भी है कि
समय पर लिए गए निर्णय ,
किया गया
मानवीय जिजीविषा की खातिर संघर्ष ,
शासन-प्रशासन
और जनसाधारण का विवेक
आतंकी गतिविधियों को
कर देते हैं बेअसर ,
बल्कि
ये आतंकित करने वाले
दुस्साहसिक दुष्कृत्यों को
निरुत्साहित करने में रहते हैं सफल।
ये न केवल जीवन धारा में
अवरोध उत्पन्न करने से रोकते हैं,
अपितु विकास के पहियों को
सार्थक दिशा में मोड़ते हैं।
अंततः
कर्मठता के बल पर
आतंक के बदरंगों को
और ज्यादा फैलने से रोकते हैं।


दोस्त,
अब आतंक से मुक्ति की बाबत सोच ,
इससे तो कतई न डरा कर
बस समय समय पर
अपने भीतर व्याप्त उपद्रवी की
खबर जरूर नियमित अंतराल पर ले लिया कर ,
ताकि जीवन के इर्द-गिर्द
विष वृक्ष जमा न सकें
कभी भी अपनी जड़ों को ।

और
किसी आंधी तूफ़ान के बगैर
मानसजात को
सुरक्षा का अहसास कराने वाला
जीवन का वटवृक्ष
हम सब का संबल बना रहे ,
यह टिका रहे , कभी न उखड़े !
न ही कभी कोई
दुनिया भर का
गांव ,शहर , कस्बा,देश , विदेश उजड़े।
न ही किसी को
निर्वासित होकर
अपना घर बार छोड़ने को
बाधित होना पड़े ।
१६/०६/२००७.
Joginder Singh Nov 2024
वो पति परमेश्वर
क्रोधाग्नि से चालित होकर,
अपना विवेक खोकर
अपनी अर्धांगिनी को  
छोटी छोटी बातों पर
प्रताड़ित करता है।

कभी कभी वह
शांति ढूंढने के लिए
जंगल,पहाड़,शहर, गांव,
जहां मन किया,उधर के लिए
घर से निकल पड़ता है
और भटक कर घर वापिस आ जाता है।

कल अचानक वह
क्रोध में अंधा हुआ
अनियंत्रित होकर
अपनी गर्भवती पत्नी पर
हमला कर बैठा,
उससे मारपीट कर,
अपशब्दों से अपमानित
करने की भूल कर बैठा।

वह अब पछता रहा है।
रूठी हुई धर्म पत्नी को
मना रहा है,साथ ही
माफ़ी भी माँग रहा है।
क्या वह आतंकी नहीं ?
वह घरेलू आतंक को समझे सही।
इस आतंक को समय रहते रोके भी।
०१/१२/२००८.
Joginder Singh Dec 2024
जब से
सच ने अपना
बयान दिया है ,
तब से
दुनिया भर का रंग ढंग
बदल गया है ,
और ज्ञान का दायरा
सतत् बढ़ा है।

अभी अभी
मुझे हुआ है अहसास
कि यह सुविधा भोगी दुनिया
निपट अकेली रह गई है,
उसकी अकड़
समय के साथ बह गई है ।

मुझे हो चुका है बोध
कि दुनिया बाहर से कुछ ओर ,
भीतर से कुछ ओर ।
बाहर से जो देता है दिखाई ,
वह कभी कभी होता है निरा झूठ !
भीतर से जो देता है सुनाई
वह ही होता है सही और सौ फीसदी सच !!

पर
आजकल आदमी
चमक दमक के पीछे भाग रहा है ,
आत्मा को मारकर
धन और वैभव के आगे
नाच रहा है।

जब से
एक दिन
चुपके से
सच ने
अपनी जड़ों से जुड़कर
जीवन में आगे बढ़
यथार्थ को अनुभूत करने की बात कही है,
तब से मैं
खुद को एक बंधन से
बंधा पा रहा हूं ,
मैंने अपनी भूलें
और गलतियां सही की हैं ।

आजकल
मैं कशमकश में हूं ,
कुछ-कुछ असमंजस में पड़ा हुआ हूं ।

बात
यदि सच की मानूं ,
तो आगे दिख पड़ता है
एक अंधेरे से भरा कुंआ,
जिसमें कूद पड़ने का ख़्याल तक
जान देता है सुखा !
और
यदि
झूठ के भीतर रहकर
सुख समृद्धि संपन्नता का वरण करूं
तो दिख पड़ती खाई ,
जिसमें कूदने से लगता है भय
निस्संदेह इसका ख्याल आने तक से
होने लगती है घबराहट
पास आने लगती है मौत की परछाई !!
और जीवन पीछे छूटने की
आहट भी देने लगती है सुनाई !!

मन में कुछ साहस जुटा कर
कभी कभार सोचता हूं --
बात नहीं बनेगी क्रंदन से ,
जान बचेगी केवल आत्म मंथन से
सो अब सर्वप्रथम
स्वयं का
सच से नाता जोड़ना होगा।
इसके साथ ही
झूठ से निज अस्तित्व को
अलगाना होगा।
ताकि
जीवन में
प्रकाश और परछाई का खेल
निरंतर चलता रहे।
आत्म बोध भी समय को
अपने भीतर समाहित करना हुआ
चिरंतन चिंतन के संग
जीवन पथ पर अग्रसर होता रहे।
३०/०६/२००७.
Joginder Singh Nov 2024
"दंभ से भरा मानस
नरक ही तो भोगता है, ... । "
इसका अहसास
दंभी होने पर ही हुआ।
वरना इससे पहले मैं
नासमझी से भरा
जीवन को समझता फिरा
महज़ एक जुआ।
अब मानता हूँ,
"जब जब हार मिली,
तब तब आत्मविश्वास की चूल हिली ।"
  १७/१०/२०२४
Joginder Singh Dec 2024
जब
अचानक
क्रोध से
निकली
एक चिंगारी
बड़ी मेहनत से
श्रृंगारी जिन्दगी को
अंदर बाहर से
धधकाकर ,
आदमी की
अस्मिता को झुलसा दे
तब
आप ही बताइए
आदमी कहाँ जाए ?

मन के भीतर
असंतोष की ज्वालाएं
फूट पड़ें
अचानक
......
मन के भीतर की
कुढ़न और घुटन
बेकाबू होकर
मन के अंदर
रोक कर रखे संवेगों को
बरबस
आंखों के रास्ते
बाहर निकाल दें ...!

तब तुम ही बता दो
आदमी क्या करे?
वह कहाँ जाए ?

कभी कभी
यह जिंदगी
एक मरुभूमि के बीच
श्मशान भूमि की
कराने लगती है
प्रतीति ,
तब
रह जाती  
धरी धराई
सब प्रीति और नीति ।

ऐसे में
तुम्हीं बताओ
आदमी कहाँ जाए ?
क्या वह स्वयं के
भीतर सिमटता जाए ?

क्यों न वह !
मन में सहृदयता
और सदाशयता के
लौट आने तक
खुद के मन को समझा ले ।
यह दुर्दिन का दौर भी
जल्दी ही बीत जाएगा।
तब तक वह धैर्य धारण करे।
वह खुद को संभाल ले ।

बेशक आज
निज के अस्तित्व पर
मंडरा रहीं हैं काल की
काली काली बदलियां ,
ये भी समय बीतने के साथ
इधर उधर छिटक बिखर जाएंगी।
सूर्य की रश्मियां
फिर से अपना आभास
कराने लग जाएंगी।
बस तब तक
आदमी ठहर जाए ,
वह अपने में ठहराव लेकर आए ,
तो ही अच्छा।
वह दिख पड़े फ़िलहाल
एकदम
सीधा सादा और सच्चा।

संकट के समय
आदमी
कहीं न भागे ,
न ही चीखे चिल्लाए ,
वह खुद को शांत बनाए रखे,
मुसीबत के बादल
जिन्दगी के आकाश में
आते जाते रहते हैं ,
बस जिन्दगी बनी रहनी चाहिए।
आदमी की गर्दन
स्वाभिमान से तनी रहनी चाहिए।

१३/१२/२०२४.
Joginder Singh Dec 2024
कितना अच्छा हो
आदमी सदैव सच्चा बना रहे
वह जीवन में
अपने आदर्श के अनुरूप
स्वयं को उतार चढ़ाव के बीच ढालता रहे।

कितना अच्छा हो
अगर आदमी
अपना जीवन
सत्य और अहिंसा का
अनुसरण करता हुआ
जीवन जिंदादिली से गुजार पाए ,
अपनी चेतना को
शुचिता सम्पन्न बनाकर
दिव्यता के पथ प्रदर्शक के
रूप में बदल पाए।

कितना अच्छा हो
आदमी का चरित्र
जीवन जीने के साथ साथ
उत्तरोत्तर निखरता जाए।
पर आदमी तो आदमी ठहरा ,
उसमें गुण अवगुण ,
अच्छाई और बुराई का होना,
उतार चढ़ाव का आना
एकदम स्वाभाविक है,
बस अस्वाभाविक है तो
उसके प्रियजनों द्वारा सताया जाना ,
उसके चरित्र को कुरेदते रहना ,
हर पल इस ताक में रहना कि कभी तो
उसकी कमियां और कमजोरियां पता चलें
फिर कैसे नहीं उसे पटखनी दे देते ?
...और खोल देते सब के सामने उसकी जीवन की बही।

कितना अच्छा हो
आदमी की चाहतें पूरी होतीं रहें ,
उसे स्वार्थी परिवारजनों और मित्र मंडली की
आवश्यकता कभी नहीं रहे ,
बल्कि उसका जीवन
समय के प्रवाह के साथ साथ बहता रहे।

आदमी का चरित्र उत्तरोत्तर निखरे ,
ताकि स्वप्नों का इंद्रधनुष कभी न बिखरे ।
२८/१२/२०२४.
आदमी की जिन्दगी
और जिंदगी में आदमी
एक अद्भुत संतुलन बनाए हैं ,
वे एक दूसरे के साथ
अंतर्गुंफित से हो गए हैं,
दोनों एक दूसरे से
होड़ा होड़ी करने को हैं तैयार
बेशक आस पास उनके
यार मार करने की चली जा रही चाल।
वे अपने आप में तल्लीन
सब कुछ भूले हुए हैं।
बस उन्हें है यह विदित
कि वे दोनों
डांट डपट
छल कपट
आसपास की उठा पटक के
बावजूद
अपने अपने वजूद को
बनाए रखने के निमित्त
कर रहे हैं सतत संघर्ष
और नहीं बचा है कोई विकल्प।
आदमी की जिन्दगी
और
जिन्दगी में आदमी
सरपट भागे
जा रहें हैं अपने पथ पर।
अवसर
अक्सर
अचानक एक अजगर सा होकर
जाता है उनसे लिपट
इस हद तक कि
आदमी की जिन्दगी ,
और जिन्दगी में आदमी  को
समेट कर
बढ़ जाता है सतत
अपने पथ पर।
समय एक अजगर सा होकर
लिपटा जा रहा है
आदमी की जिन्दगी से
इस हद तक कि
उसकी जिन्दगी का किस्सा
लगने लगा है बड़ा अजीब और अद्भुत
बिल्कुल एक शांत बुत सा।
आदमी को
जिन्दगी की तेज़ रफ़्तार के दौर ने
जीने की होड़ ने ,
रोजमर्रा की दौड़ धूप ने
बना दिया है
एक बाज़ीगर सरीखा ।
वह अपनी मूल शांत प्रवृत्ति को छोड़ कर
वह बनता चला जाता है
पल पल तीखा ,एकदम तेज़ तर्रार
हरपल क़दम क़दम पर
अपने प्रतिस्पर्धी को चोट पहुंचाने को उद्यत।
आदमी लड़ता है मतवातर
परस्पर एक दूसरे से
इस हद तक
कि वह हरदम  
करना चाहता उठा पटक ।
वह जैसे ही अपने हिस्से पर
झपटने के बाद
अपने ठौर ठिकाने में लौट कर आता है ,
वह और ज़्यादा अपने भीतर सिमटता जाता है ।
जिन्दगी पर से उसका भरोसा
लगातार पीछे छूटता जाता है ,
वह निपट अकेला रह जाता है।
उसकी जिन्दगी को यह सब नहीं भाता है,
फिर भी वह आदमी का साथ नहीं छोड़ती है।
जिन्दगी का किस्सा है बड़ा अजीबोगरीब ,
आदमी जितना इससे पीछा छुड़ाना चाहता है ,
यह उतना ही
आती जाती है
आदमी के क़रीब।
आदमी कभी भी पीछा नहीं छुड़ा पाता है।
इस डांट डपट छल कपट के दौर में भी
जिन्दगी आदमी के साथ साथ
उसके समानांतर
दौड़ी जा रही है
अपने पथ पर।
यह आदमी को
निरन्तर आगे ही आगे
है बढ़ा रही ,
यह सुख समृद्धि और संपन्नता की ओर
उसे अग्रसर है कर रही।
आदमी के भीतर की बेचैनी
इस सब के बावजूद  
लगातार बढ़ती जा रही है।
यही बेचैनी उसे दरबदर कर ,
ठोकरें खाने को विवश कर
मतवातर भटका रही है।
१८/०१/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
आदमी
जो नहीं है,
वह वैसा होने का
दिखावा करता है ,
बस खुद से  
छलावा करता है।
इस सब को
मैं नहीं समझता हूं अच्छा।
क्या ऐसा करने से
वह रह पाएगा सच्चा ?
यह तो है बस है
अपने आप से बोलना झूठ।
कदम कदम पर पीना
ज़हर और अपमान की घूट।
साथ ही है यह
जाने अनजाने
अपने हाथों ही
अपने पर कतरना भी है।
स्वयं को
अनुभूतियों के आसमान में
परवाज़ भरने से रोकना भी है।


आज
आदमी ने
पाल ली है
यह खुशफहमी,
कोई उसकी असलियत
कभी जानेगा नहीं।
पर
नहीं जानता वह बेचारा।
दूसरे भी
उसकी तरह चेहरा छुपाए हैं,
एक मुखौटा चेहरे पर लगाए हैं।
उनसे चेहरा छुपाना मुश्किल है,
नहीं समझता इसे, कम अक्ल है।
सब यहां, मनोरंजन कर रहा है, जैसा कुछ सोच
हरदम मुस्कुराते रहते हैं!
दुनिया के हमाम में नंगे बने रहते हैं!!


अब आदमी
कतई न करे कोई लोक दिखावा।
खुद को च
छलने से अच्छा है ,
वह देखा करें अब ,
समय की धूप में
अपना परछावा!

आजकल
अपना साया ही बेहतर है,
कम से कम
सुख दुःख में साथ देता है,
तपती धूप के दौर में
आदमी जैसा है, उसे वैसे ही दिखाया करता है ।

आदमी जैसे ही
अपना परछावा भूल
आईने से गुफ्तगू करता है,
आईने में अपना मोहक रूप देख
होता है प्रसन्न।
आईने को एक शरारत सूझी है
और वह
आदमी को
उसके रंग ढंग दिखला ,
उसे सच से अवगत करा
कर देता है सन्न !
ऐसे समय में
आदमी मतवातर
आईने  से शर्माता  है।
वह बीच रास्ते
हक्का-बक्का सा
आता है नज़र।
यही है आदमी की वास्तविकता का मंज़र।


आदमी, जो नहीं है, वह वैसा होने का
दिखावा आखिरकार क्यों करता है?
अगर उसे होना पड़ता है अपमानित, इस वज़ह से ;
तो आज का शातिर आदमी
झट से मांग लेता है माफी
और इसे अपनी भूल ठहरा देता है।

जब कभी समय देवता
उसे अचानक बस यूं ही
दिखा देते हैं ,हकीकत का आईना,
तो आदमी बाहर भीतर तक
कर लेता है मौन धारण।
ऐसा आदमी नहीं होता कतई साधारण ।
वह कभी किसी की पकड़ में नहीं आता है,
बल्कि जनसाधारण के बीच , वह नीच!
पहुंचा हुआ आदमी कहलाता है !
सभी के लिए आदर का पात्र
यानी कि आदरणीय बन जाता है।
और एक दिन समाज और सरकार से पुरस्कृत हो जाता है। ऐसे में सच
सचमुच ही तिरस्कृत हो जाता है ।

२२/०२/२०१७.
आदमी
जब तक
नासमझ बना
रहता है ,
छोटी छोटी बातों पर
अड़ा रहता है ।
जैसे ही
वह समझता है
जीवन का सच ,
वह एक सुरक्षा कवच में
सिमट जाता है ,
जिंदगी में
समय रहते
समझौता करना
सीख जाता है ,
सुखी और सुरक्षित
रहता है।
भूल कर भी
बात बात पर
अकड़ दिखाने से
करता है गुरेज।
वह जीवन की
समझ निरंतर
बढ़ाता रहता है।
एक समय आता है ,
वह समझौता
बेहद आसानी से
कर पाता है ,
वह बिना कोई हेर फेर किए
स्वयं को संतुलित और
समायोजित कर लेता है ,
शांत रहना सीख जाता है ,
दिल और दिमाग से
समझौताबाज़ बन जाता है।
वह किसी भी हद तक
सहनशील बना रहता है ,
फल स्वरूप जीवन भर
फलता फूलता जाता है ,
समझौता करने में
गनीमत समझता है।
अतः सुख का आकांक्षी
जीवन में समझौता कर ले ,  
समय रहते समझदारी वर ले।
यह सच है कि
यदि वह समय पर समझौता कर ले ,
तो स्वत: स्वयं को सुखी कर ले।
१४/०३/२०२५.
Joginder Singh Dec 2024
मन के भीतर
             हद से अधिक
यदि होने लगे कभी कभार उथल पुथल
तो कैसे नहीं हो जाएगा आदमी शिथिल ?
यकीनन वह महसूस करेगा खुद को निर्बल।
              मन के भीतर
              सोए हुए डर
  यदि अचानक एक एक कर जागने लगें ,
कैसे नहीं आदमी थोड़ा चलते ही लगे हांफने ?
यकीनन वह खुद को बेकाबू कर लगेगा कांपने।

              मन के भीतर
              बसा है संसार
जो समय बीतने के साथ बनाता सबको अक्लमंद।
यह उतार चढ़ाव भरी राहों से गुजारकर करता निर्द्वंद्व।
इस संसार की अनुभूतियों से सम्बन्ध होते रहते दृढ़।
               मन के भीतर
               बढ़े जब द्वंद्व
अंत समय को झट से ,अचानक अपने नज़दीक देख ।
आदमी जीवन से रचाना चाहता है संवेदना युक्त संवाद।
हो चुका है वह भीतर से पस्त,इसलिए रह जाता तटस्थ।
               मन के भीतर
               दुविधा न बढ़े
अन्तर्जगत अपनी आंतरिक हलचलों से निराश न करे।
बल्कि वह सकारात्मक विचारों से मन को प्रबुद्ध करे।
जीवन में डर सतत् घटें, इसके लिए मानव संयमी बने।
०९/०१/२००८.
      ‌
Joginder Singh Nov 2024
आज
मैं अपने
परम प्रिय
मित्र और पुत्र
विनोद के घर में हूं ।

कल
मेरे परम आदरणीय,आदर्श अध्यापक,
मार्गदर्शक,
प्रेरणा पुंज,
अध्ययनशील
कुंदन भाई साहब जी की
अंत्येष्टि में
शामिल होना पड़ा।  
अधिक देर होने की वजह से
एक आदर्श परिवार में रात बितानी पड़ी है।

आधी रात को
नींद उचट जाने के कारण
जग रहा हूं,
विनोद और उसके परिवार की
बाबत सोच रहा हूं ।
उन दिनों   जब मैं संकटग्रस्त था
नौकरी के दौरान
सहयोगियों के
अहम् और षड्यंत्र का
शिकार बना था,
फलत:
मेरा तबादला  
एक दूरस्थ, पिछड़े इलाके में
किया गया था,
वहां मेरा मन इतना रमा था कि
नौकरी के
अधिकांश साल
उस गांव टकारला को दे दिए थे।
वहीं मुझे मास्टर कुंदन लाल,
विनोद कुमार और ... बहुत सारे जीवनानुभव हुए ।
आदर्श अध्यापक और  आदर्श परिवार की बाबत
जीवन के धरातल पर
समझने का
सुअवसर मिला।

इस परिवार में
अब पांच जीव हैं,  
पहले से कुछ कम,

जीवन के  उतार चढ़ाव ने
कुछ सदस्यों को काल ने
अपने भीतर समा लिया,
इस परिवार को   कष्ट उठाने पड़े ,
आज यह परिवार
एक आदर्श परिवार
कहलाता है,
कारण ...

सभी सदस्यों के मध्य
परस्पर तालमेल है,
वे आपस में कभी लड़ते नहीं,
धन का अपव्यय
करते नहीं,
अन्याय के  खिलाफ डटे रहते हैं।
पति पत्नी , दोनों
तीनों बच्चों को सुशिक्षित
बनाने के लिए
दिन रात
कोल्हू के बैल बने
चौबीसों घंटे मेहनत करके
जीविकोपार्जन करते हैं
और मुझ जैसे अतिथियों का
खिले मन से स्वागत करते हैं ।
ऐसे परिवार ही
देश, समाज, दुनिया को
समृद्ध करते हैं,
वे कर्मठता की मिसाल बन कर
जीवन में टिकाव लेकर आते हैं।
हमारी धरती स्वर्ग सम बने,
सुख की चादर सब पर तने, जैसे आदर्शों को
व्यावहारिक बनाते हैं।
ऐसे परिवार
संक्रमण काल की इस दुनिया में
कभी राम राज्य भी बनेगा,
सतत् इस बाबत आश्वस्त करते हैं।
आदर्श परिवार निर्मित करने की परिपाटी चला कर
राष्ट्र आगे बढ़ते हैं।
Joginder Singh Nov 2024
नाद
पर कर नृत्य
अनुभूति के पार उतरकर,
बनकर अद्वितीय !
कर मुझे चमत्कृत !
ओ ,योगीनाथ शिव !

तुम्हारे आगमन की गंध,
कण-कण में है जा समाई।

आज नाट्य, नाद, नाच ,गान के स्वर, आदिनाथेश्वर!
कर रहे पग पग पर मानव को प्रखर!!

तुम प्रखरता के शिखर पर
बैठी संवेदना हो,
साक्षात सत्य हो,
परम कल्याणकारी हो।

स्वयं में सुंदरता का सार हो।
तुम्हें मेरा नमन।
हे सत्यं शिवम्  सुंदरम के प्रणेता।!
तुम्हीं सृष्टि की दृष्टि हो ।
तुम्हारे भीतर समाया है काल।
तभी तुम महाकाल कहलाते हो।
यही काल बनता जीवन का आकर्षण है ,
जो जीव , जीव को अपनी ओर खींचता है।
मृत्यु का संस्पर्श कराकर
भोलेनाथ ब्रह्मांड की चेतना से
जीवन के कल्पवृक्ष को सींचते हैं !!

हे  भूतनाथ !
नाद तुम्हारा
जीवन का संवाद बने,
साथ ही यह समस्त वाद विवाद हरे ।
सृष्टि के कण कण से
जीव के भीतर व्यापी चेतना का
आप में समाई महाचेतना से संबंध जुड़े।

ओ' आदियोगी भगवान!
तुम्हारे दिशा निर्देशों पर
सब आगे बढ़ें,
जीवन के भीतर से अमृत का संधान करें।
तुमसे प्रेरित होकर
विषपान करने में सक्षम बनें।
जीवन में ज़हर सरीखे कष्टों को सहन कर सकें।
तुम्हारे भक्त अमर जीवन की  चाहत से सदैव दूर रहें।
वह मृत्यु को अटल मानकर
अपने भीतर बाहर की तमाम हलचलों को भूलकर
अपने  और आप को खोजने का प्रयास करें।
आपको खोजने की खातिर सदैव लालायित रहें।


हे आदिनाथ!
आपको क्या कहूं?
आप अंतर्यामी हैं।
सर्वस्व के स्वामी हैं।
हम सब जीवन धारा के साथ बहते रहें।
आपकी कृपा में ही मोक्ष को देखें ।
सभी आपकी चेतना को
जानने और समझने की चेष्टा करते रहें।

२४/०२/२०१७.
Joginder Singh Nov 2024
लगता है
आज आदमी
आधा रह गया है,
उसमें लड़ने का माद्दा नहीं बचा है।
इसलिए जल्दी ही
देता घुटने
टेक।
कई दफा
बगैर लड़े
मान लेता हार,
उसकी बुजदिली पर कोई करेगा चोट
तो मुमकिन है
वह लड़ने के लिए
करे स्वयं को
तैयार
थाम ले हथियार ।
करअपना परिष्कार !!
तुम उसे उकसाओ तो सही।
उसे उसकी ताकत का
अहसास कराओ तो सही।
उसे सही दिशा दिखाओ तो सही।
उसे लड़ाकू होने की प्रतीति करवाओ  तो सही।
उसे, सही ढंग से समझाओ तो सही।
उसकी समझ की बही में सही होने,रहने का गणित लिखवाओ तो सही।
उस के भीतर मनुष्य होने का आधार बनाओ तो सही।
आज
बस उसके अहम् को खरा बनाओ तो सही।
समन्दर किनारे घर न बनाने के लिए
उसे समझाओ तो सही।
उसकी खातिर ,उसे उसके सही होने की ख़बर सुनाओ तो
सही।
कुछ और नहीं कर सकते तो उसे सही राम बनाओ तो सही।
उसे सही कुर्सी पर बैठाओ तो सही,
ठसक उसके भीतर भर  ही जाएगी जी।
जिजीविषा उसके भीतर
सही सही मिकदार में उत्पन्न हो ही जाएगी जी।
वह बिल्कुल सही है जी।
हम ही सहीराम को गलत समझे जी।
उसको करने दो  अपनी मनमर्जी जी।
जी लेने दो उसे जी भर कर जी।
... क्यों कि वह पूरा आदमी नहीं,
आधा अधूरा आदमी है जी।
परम्परा और आधुनिकता का सताया आदमी है जी,
जो बस रिरियाना और गिड़गिड़ाना जानता है जी।
२९/११/२०२४.
आजकल
दुनिया असली से
नकली बनती जा रही है ,
आभासी दुनिया की
चकाचौंध भी
अब सभी को
लुभा रही है ,
यह दिन प्रति दिन
भरमा रही है।

इस दुनिया के
अपने ही ख़तरे हैं,
हम सब आभास करते हैं
कुछ सचमुच का होने का ,
पर यह होता नहीं , कहीं भी।
इसे असल दुनिया में
खोजने लगें
तो हासिल होता कुछ भी नहीं ,
फिर भी लगता सब कुछ ठीक और सही।
मैं आभासी अंतरंगता के
दौर से भी गुजर चुका हूँ,
खुद को खूब थका चुका हूँ।
सब कपोल कल्पित
किस्से कहानियों में वर्णित
रंग बिरंगी दुनिया के
आकर्षक और लुभावने पात्रों की तरह !
इर्द गिर्द मंडराते और घूमते दिखाई देते हैं !!
एक नशीली महिमा मंडित दुनिया की तरह !
जहां असलियत और सच्चाई के लिए
होती नहीं कोई जगह बेवजह।

आभासी दुनिया का सच
कब हो जाए गायब और गुम !
यह कर दे इंसान को गुमसुम !!
कुछ कहा नहीं जा सकता !
बहुत कुछ कभी सहा नहीं जा सकता !!

जैसे ही रीचार्ज खत्म
समझो आभासी दुनिया का तिलिस्म भी हुआ खत्म !
और जैसे ही इंटरनेट कनेक्शन हुआ डिस्कनेक्ट !
वैसे ही समझो अब कुछ खत्म और समाप्त !
समूल सत्यानाश ! सब कुछ तहस नहस !
जीते जी बेड़ा गर्क !
जिन्दगी बन जाती साक्षात नरक !

इस आभासी दुनिया के खिलाड़ी
एक आभासी दुनिया में रहकर संतुष्ट होते हैं !
वे किसी हद तक
स्व निर्मित कैद को भोगने को विवश होते हैं !
क्या कभी कल्पित वास्तविकता
हम सब को हड़प जाएगी ?
हाय!तब हमारी असली दुनिया कहाँ ठौर ठिकाना पाएगी?
१७/०१/२०२५.
Joginder Singh Nov 2024
देश की
आर्थिकता
आजकल बैसाखियों के आसरे
चल रही है ,
सोचता हूं,
देश के भीतर
तभी आर्थिक अपराध बढ़े हैं,
सभी भीतर तक भ्रष्ट हुए हैं।


देश समाज और दुनिया में
सभी अपनी आर्थिकता को
सुदृढ़ कर रहे हैं
मतवातर
हम ही धनार्जन की दौड़ में
पिछड़े हुए हैं।
आखिरकार ऐसा क्यों है?


आजकल
सत्ताधारी दल
और
विपक्षी दल
परस्पर लड़ रहे हैं ,
नूरा कुश्ती कर रहे हैं।

परस्पर
एक दूसरे पर हेराफेरी करने,
भ्रष्टाचारी होने के
आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं।
इन दोनों की लड़ाई का
कुछ आर्थिक शक्तियां
लाभ उठा रही हैं।
देश भर में निवेश, शेयरों को
अपने हाथों में लेकर
रक्त चूसने की हद तक लाभ कमा रही हैं।
उपभोक्ताओं को सस्ते सामान मुहैया कर लुभा रही हैं।
अंदर ही अंदर
देश की आर्थिकता को
दीमक सी होकर
खोखला करती जा रही हैं।


आज
देश का व्यापार संतुलन
बिगड़ चुका है,आयात अधिक, निर्यात कम है।
इस स्थिति को
समझते बूझते हुए भी सत्ता पक्ष और विपक्ष
चोरी-चोरी ,चुपके-चुपके
अपना अपना खेल, खेल रहे हैं।
जन साधारण इन सब के बीच पिस रही है।
देश की आर्थिकता
चुपचाप परित्यक्ताओं सी  होकर
सिसकियां भर रही है।
हाय! देश की शासन व्यवस्था क्या कर रही है?
Joginder Singh Nov 2024
बेघर को
यदि
घर का
तुम दिखाओगे सपना
तो उसे कैसे नहीं
लगेगा अच्छा?
वह कैसे नहीं,
समझेगा तुम्हें अपना?
परंतु
आजकल
घर के बाशिंदों को
बेघर करने की
रची जा रही हैं साजिशें,
तो किसे अच्छा लगेगा ?
सच!
ऐसे में
भीतर उठती है
पीड़ा, बेचैनी,दर्द,कसक।
इन्सान होने की ठसक क्या!
सब कुछ मिट्टी में मिलता लगता है।
सब कुछ तहस नहस होता लगता है।
कभी कभी रोने का मन करता है,
परंतु दुनिया की निर्मम हंसी से डर लगता है।


मन मनन चिंतन छोड़ कर
करता है महसूस
वह घड़ी रही होगी मनहूस
जब किसी उत्पाती ने
दी थी आधी रात घर की देहरी पर दस्तक
और कर दिया था हम सब को
बेघर और अकेला।
दे दी थी भटकन सभी को।
बस! तभी से है मेरा मन आशंकित।
मुझे हर समय एक दुस्वप्न
घर की देहरी पर दस्तक देता लगता है।
मैं भीतर तक खुद को हिला और डरा पाता हूं।
इस भरी पूरी दुनिया में खुद को अकेला पाता हूं।
मुझे कहीं कोई ठौर ठिकाना नहीं मिलेगा,
बस इसी सोच से पल पल चिंतित रहता हूं।


आजकल मैं एक यतीम हुआ सा
सतत् भटकता हुआ आवारा बना घूमता हूं।
मन मेरा बेघर है ।
उसके भीतर बिछुड़न का डर  कर गया घर है।
अतः अंत के आतंक से भटक रहा गली गली डगर डगर है।
०२/०१/२०१२.
इतिहास के
बारे में
कुछ पूर्वाग्रह से युक्त
कोई धारणा बनाना
ख़तरे से
खाली नहीं ,
इसे कालखंड के
संदर्भ में
पढ़ा जाना चाहिए।
यह अपने अतीत का
मूल्यांकन भर है,
इसे वर्तमान के
घटनाचक्र से
पृथक रखा जाना चाहिए।
इतिहास जीवन का
मार्गदर्शक बन सकता है,
बशर्ते इसे लचीलेपन से
संप्रकृत किया जाए ,
इसे भविष्य के परिवर्तन से
जोड़ते हुए
एक संभावना के रूप में
महसूस किया जाए ,
इतिहास के संदर्भ में
इसे सतर्कता और जागरूकता के साथ
देखा और पढ़ा जाए ,
इतिहास की समझ की बाबत
आपस में लड़ा न जाए,
प्राचीन जीवन के उज्ज्वल पक्षों को तलाशा जाए ,
इनसे सीख लेकर
अपने वर्तमान को तराशा जाए ,
ताकि भविष्य में
संभावनाओं का स्वागत
आदमी अपनी चेतना के स्तर पर
करने के लिए
स्वयं को तैयार कर पाए !
जीवन यात्रा में
समय की धारा के संग
सतत अग्रसर हो सके ,
अतीत के विवादों को पीछे छोड़ सके ,
वह सार्थकता से
अपनी जीवन की संवेदना को जोड़ सके ,
अपना अड़ियल रवैया छोड़ सके ,
जिससे कि उसकी जीवन धारा नया मोड़ ले सके,
उसके भीतर इतिहास की समझ विकसित हो सके।
२५/०३/२०२५.
आज जब देश दुनिया
अराजकता के मुहाने पर खड़ी है
एक समस्या मेरे जेहन में चिंता बनी हुई है।
सब लोग इतिहास को
फुटबाल बना कर अपने अपने ढंग से खेल रहे हैं।
सब धक्कामुक्की ,  जोर-जबरदस्ती कर
अपनी बात मनवाने में लगे हैं।
सब स्वयं को विजेता सिद्ध करना चाहते हैं।
अपना नैरेटिव गढ़ना चाहते हैं।
वे गड़े मुर्दे कब्रों से निकालना चाहते हैं।
ऐसे हालात में
एक पड़ोसी देश के मान्यनीय मंत्री महोदय ने
सच कह कर बवाल मचा दिया।
हंगामेदार शख़्सों को सुप्तावस्था से जगा दिया।
उन्होंने आक्रमणकारी महमूद गजनवी की
बाबत अपना नज़रिया बताया और
अपने वतनवासियों को चेताया कि
अब सच को छुपाया जाना नहीं चाहिए।
इस की बाबत यथार्थ को स्वीकारा जाना चाहिए।

इतना सुनते ही वहां बवाल हो गया।
इतिहास के बारे में अबूझ सवाल खड़ा हो गया।
इतिहास की अस्मिता के सामने अचानक
अप्रत्याशित रूप से एक प्रश्नचिह्न लगा देखा गया।
मैंने इस घटनाक्रम को लेकर सोचा कि
अब और अधिक देर नहीं होनी चाहिए।
इतिहास का सच जनता जनार्दन के सम्मुख आना चाहिए।
इतिहास के विशेषज्ञों और मर्मज्ञों द्वारा
उपेक्षित इतिहास बोध को पुनर्जीवित करने के निमित्त
इतिहास का पुनर्लेखन किया जाना चाहिए
ताकि इतिहास अतीत का आईना बन सके।
इसके उजास से
अराजकता और उदासीनता को
घर आने से रोका जा सके।
सब अपने को गौरवान्वित महसूस कर सकें।

आखिरकार सच का सूरज
बादलों के बीच से बाहर निकल ही आता है ,
जब संवेदनशील राजनेता
इतिहास की बाबत सच को उजागर कर देता है।
वह जाने अनजाने सबको भौंचक्का कर ही देता है।
इतिहास अब चिंतन मनन का विषय बन गया है।
यह जिज्ञासुओं के दिलों की धड़कन भी बन गया है।
इसके सच की अनुभूति कर गर्व से सीना तन गया है।
०२/०१/२०२५.
Next page