तलाश है खुद की, न जाने कहाँ गुम हो गया हूँ,
कभी जंगलों में, कभी पहाड़ों में फिर रहा हूँ।
हो मुलाकात किसी दिन, यही आस है मुझे,
बस इस उम्मीद में, दरबदर फिर रहा हूँ।
Feb 20, 2025
Feb 20, 2025 at 2:51 PM UTC
तलाश है खुद की, न जाने कहाँ गुम हो गया हूँ,
कभी जंगलों में, कभी पहाड़ों में फिर रहा हूँ।
हो मुलाकात किसी दिन, यही आस है मुझे,
बस इस उम्मीद में, दरबदर फिर रहा हूँ।
On a journey to find myself, I roam through forests and mountains,
Holding onto hope, wandering aimlessly, waiting for a destined reunion.