Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
कभी यूँही ख़यालों में बचपन की यादों के गलियारो में करती हूँ जब भी मैं सफ़र एक चेहरा आता है नज़र वो जो पोशाक से ले कर पहनावे तक तालीम से लेकर रखावे तक रखता था हिसाब और ख़बर बसता क्या ,किताबें क्या, क्या क़लम ,क्या कवर स्कूल हो ,या क्लास ,या सीट हो किधर रहती थी जिसको हर बात की फ़िकर हाथ के जिसके सिले कपड़े, बुने स्वेटर निकले जब भी हम घर से पहनकर सवाल हर कोई करता आगे बढ़ कर किसने सिला किसने बुना कौन कारीगर बीमार हो तो दवाखाने का चक्कर बाज़ारों में घूमना भरी दोपहर गुज़र जाता है बचपन पलक झपक कर रह जाता है मगर जहनों के सफ़ों पर होते है सभी माँ बाप भाई बहन उसका हिस्सा पर चेहरा वो है एक.........,, नाम जिसका सबिहा
0
Feb 12, 2021
Feb 12, 2021 at 2:24 PM UTC
सबिहा”मेरी बड़ी बहन”
कभी यूँही ख़यालों में बचपन की यादों के गलियारो में करती हूँ जब भी मैं सफ़र एक चेहरा आता है नज़र वो जो पोशाक से ले कर पहनावे तक तालीम से लेकर रखावे तक रखता था हिसाब और ख़बर बसता क्या ,किताबें क्या, क्या क़लम ,क्या कवर स्कूल हो ,या क्लास ,या सीट हो किधर रहती थी जिसको हर बात की फ़िकर हाथ के जिसके सिले कपड़े, बुने स्वेटर निकले जब भी हम घर से पहनकर सवाल हर कोई करता आगे बढ़ कर किसने सिला किसने बुना कौन कारीगर बीमार हो तो दवाखाने का चक्कर बाज़ारों में घूमना भरी दोपहर गुज़र जाता है बचपन पलक झपक कर रह जाता है मगर जहनों के सफ़ों पर होते है सभी माँ बाप भाई बहन उसका हिस्सा पर चेहरा वो है एक.........,, नाम जिसका सबिहा
Written by
44/F/Dubai
Feb 12, 2021
Feb 12, 2021 at 2:24 PM UTC
Request permission to use this poem