Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
कल ट्रेन में एक नन्ही सी कली देखी खिलखिलाती उसकी हँसी मन मोहती मासूमियत ज़िन्दगी की झुलसती धुप में   वोह एक हवा का झोंका ले आयी मन किया दो पल ठहरने को उसके पलों में अपने भूले बिसरे पल फिर से जीने को यूँ देखो तो उसकी ज़िन्दगी में बहुत दिक्कतें देखी वोह बेपरफा फ़िर भी खुशी से भरपूर मिली यह जादू है बचपन का उम्मीदों से भरता है एक छोटा सा लम्हा ही खुशियों की बहार ले आता है थोड़ी मैंने भी अपनी चादर में लपेट ली बहुत सुकून था उस पल में पर दुसरे ही पल चिंता घिर आयी की इस ज़िन्दगी के मंथन ने सबकी मासूमियत की चुनरी हटा के समझदारी की ओढ़नी उड़ायी है मेरी माँ ने भी कहाँ चाहा ना होगा पर वो भी कहाँ रोक पायी इस परिवर्तन को रिश्तों के भंवर में मासूमियत को उड़ना ही है समझदारी ने फिर हरा दिया बेपरवाही को मेरी मुस्कान फिर उड़ गयी और घिर आयी चुप्पी और मेरा स्टेशन भी आ गया था
0
Dec 5, 2018
Dec 5, 2018 at 7:37 PM UTC
ek nanhi kali
कल ट्रेन में एक नन्ही सी कली देखी खिलखिलाती उसकी हँसी मन मोहती मासूमियत ज़िन्दगी की झुलसती धुप में   वोह एक हवा का झोंका ले आयी मन किया दो पल ठहरने को उसके पलों में अपने भूले बिसरे पल फिर से जीने को यूँ देखो तो उसकी ज़िन्दगी में बहुत दिक्कतें देखी वोह बेपरफा फ़िर भी खुशी से भरपूर मिली यह जादू है बचपन का उम्मीदों से भरता है एक छोटा सा लम्हा ही खुशियों की बहार ले आता है थोड़ी मैंने भी अपनी चादर में लपेट ली बहुत सुकून था उस पल में पर दुसरे ही पल चिंता घिर आयी की इस ज़िन्दगी के मंथन ने सबकी मासूमियत की चुनरी हटा के समझदारी की ओढ़नी उड़ायी है मेरी माँ ने भी कहाँ चाहा ना होगा पर वो भी कहाँ रोक पायी इस परिवर्तन को रिश्तों के भंवर में मासूमियत को उड़ना ही है समझदारी ने फिर हरा दिया बेपरवाही को मेरी मुस्कान फिर उड़ गयी और घिर आयी चुप्पी और मेरा स्टेशन भी आ गया था
Written by
Dec 5, 2018
Dec 5, 2018 at 7:37 PM UTC
Request permission to use this poem