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jyoti-khadgawat
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ ना अहंकार उसे ना रंज उसे ना तर्क करे ना वो करे तकरार वो फुसूँ  हैं मेरी ज़िंदगी का और मैं उसका बेशर्त कदारदार मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ उसकी ज़बान पे फ़ुर्सत का ज़ायक़ा उसकी आँखों में चैन की चमक उसके लबों पे मेरे दिल की आवाज़ वो पंख है मेरे खवाबों की मेरे संग घंटो कल्पनाओं की उड़ाने भरा करती है मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ वो हमराह है मेरी वो हमराज़ भी वो घाव है वो वक़्त का मरहम भी उसकी नज़दीकियों में भी फ़ासले की सी ख़ुशबू आया करती है
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Feb 23, 2019
Feb 23, 2019 at 7:56 PM UTC
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ ना अहंकार उसे ना रंज उसे ना तर्क करे ना वो करे तकरार वो फुसूँ  हैं मेरी ज़िंदगी का और मैं उसका बेशर्त कदारदार मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ उसकी ज़बान पे फ़ुर्सत का ज़ायक़ा उसकी आँखों में चैन की चमक उसके लबों पे मेरे दिल की आवाज़ वो पंख है मेरे खवाबों की मेरे संग घंटो कल्पनाओं की उड़ाने भरा करती है मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ क्या शेर लिखूँ क्या ग़ज़ल लिखूँ वो हमराह है मेरी वो हमराज़ भी वो घाव है वो वक़्त का मरहम भी उसकी नज़दीकियों में भी फ़ासले की सी ख़ुशबू आया करती है
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कल एक पत्ती क्या बिछड़ी अपने फूल से, ख़ुशियों की लहरों ने उसके साहिल पर टकराना छोड़ दिया, कल से पहले मैं सुर्ख़ था भँवरों के गुंजन में घिरा, आज मैं मुरझाया हुआ ख़ामोश हूँ, पीला हूँ डूबते सूरज की तरह। मोह के धागों से बुना था मैंने अपना ताना बाना, आज बिखरे रिश्तों में उलझा हूँ एक दस्तक की इंतज़ार में, टकटकी लगाए घंटों दरवाज़े की ओर देखता हूँ, हज़ारों सवालों के जाल में अपने अस्तित्व को ढूँढता हूँ। यह बंधन ही सुंदरता थी मेरी अब अधूरा मैं बेजान हूँ, बाक़ी पत्तियॉं पूछें मुझसे, मायूसी भरी घूरें मुझे, क्या कहूँ कि क्यूँ तुम हमें छोड़ गई कैसे कहूँ कि तुमने घरोंदा कोई और ढूँढ लिया है, अपने ख़ून के रिश्तों को तुमने अपने ख़ून के लिए छोड़ दिया है, बचपन की यादों को तुमने नए बचपन में अब ढूँढ लिया है।
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Jan 27, 2019
Jan 27, 2019 at 8:09 PM UTC
भिकर गया धरोंधा
कल एक पत्ती क्या बिछड़ी अपने फूल से, ख़ुशियों की लहरों ने उसके साहिल पर टकराना छोड़ दिया, कल से पहले मैं सुर्ख़ था भँवरों के गुंजन में घिरा, आज मैं मुरझाया हुआ ख़ामोश हूँ, पीला हूँ डूबते सूरज की तरह। मोह के धागों से बुना था मैंने अपना ताना बाना, आज बिखरे रिश्तों में उलझा हूँ एक दस्तक की इंतज़ार में, टकटकी लगाए घंटों दरवाज़े की ओर देखता हूँ, हज़ारों सवालों के जाल में अपने अस्तित्व को ढूँढता हूँ। यह बंधन ही सुंदरता थी मेरी अब अधूरा मैं बेजान हूँ, बाक़ी पत्तियॉं पूछें मुझसे, मायूसी भरी घूरें मुझे, क्या कहूँ कि क्यूँ तुम हमें छोड़ गई कैसे कहूँ कि तुमने घरोंदा कोई और ढूँढ लिया है, अपने ख़ून के रिश्तों को तुमने अपने ख़ून के लिए छोड़ दिया है, बचपन की यादों को तुमने नए बचपन में अब ढूँढ लिया है।
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तनहाइयाँ आशना है मेरी दुनिया से कभ हमारा याराना था फुसूँ का मरसिम है ना कोई रंजिश है ना कोई तर्क ना तकरार ज़बान पर शक्कर का है ज़ायक़ा चेहरे पे मुस्कान लिए दिल में रौनक़ें है लगी पहले जब वो अजनबी थी बड़ी दूर दूर से घूरा करती थी अब यह हमसफ़र है हमारी क़दम क़दम साथ रखा करती है ना कोई ख़्वाहिश उसकी ना उसकी कोई पहचान उसकी नज़दीकियों में फ़ासले की ख़ुशबू हम साक़ी हैं उसके वो आधा भरा हुआ जाम वो ना थी तो बेफ़्ज़ूल सा शोर था छाया चारों और बड़ी कशमक़स में थी ज़िंदगी जो मन में था उसे अल्फ़ाज़ कहाँ बयान करते थे जो सुन रहे थे वो ज़स्बात सांगदिल ना हुआ करते थे लोगों की भीड़ में यादों की शाही का रंग उड़ रहा था भूले बीसरे क़िस्सों को बयान करने की ख़लिश पे आँखो की बारिश का पानी पड़ रहा था किसी को क्या इल्ज़ाम दे ख़ुद से ही थी ख़ुद को शिकायतें उन हालातों के हम मुलज़िम थे और बीमार भी अब दूर तक फैला है सुकून का सन्नाटा घंटों ख़ुद से ख़ुद के दिल ऐ हाल बयान करते हैं वो दिन रात सुनती है बड़े आराम से हमारे फिखरों पे तहाके लगा के हँसती है वो हमराह है हमारी वो हमराज़ भी अब मरहम है ज़िंदगी खवाबों के परिंदे के पर लगाए ख़ूब देर तक उड़ती है
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Jan 27, 2019
Jan 27, 2019 at 5:48 PM UTC
मैं और मेरी तनहाइयाँ
तनहाइयाँ आशना है मेरी दुनिया से कभ हमारा याराना था फुसूँ का मरसिम है ना कोई रंजिश है ना कोई तर्क ना तकरार ज़बान पर शक्कर का है ज़ायक़ा चेहरे पे मुस्कान लिए दिल में रौनक़ें है लगी पहले जब वो अजनबी थी बड़ी दूर दूर से घूरा करती थी अब यह हमसफ़र है हमारी क़दम क़दम साथ रखा करती है ना कोई ख़्वाहिश उसकी ना उसकी कोई पहचान उसकी नज़दीकियों में फ़ासले की ख़ुशबू हम साक़ी हैं उसके वो आधा भरा हुआ जाम वो ना थी तो बेफ़्ज़ूल सा शोर था छाया चारों और बड़ी कशमक़स में थी ज़िंदगी जो मन में था उसे अल्फ़ाज़ कहाँ बयान करते थे जो सुन रहे थे वो ज़स्बात सांगदिल ना हुआ करते थे लोगों की भीड़ में यादों की शाही का रंग उड़ रहा था भूले बीसरे क़िस्सों को बयान करने की ख़लिश पे आँखो की बारिश का पानी पड़ रहा था किसी को क्या इल्ज़ाम दे ख़ुद से ही थी ख़ुद को शिकायतें उन हालातों के हम मुलज़िम थे और बीमार भी अब दूर तक फैला है सुकून का सन्नाटा घंटों ख़ुद से ख़ुद के दिल ऐ हाल बयान करते हैं वो दिन रात सुनती है बड़े आराम से हमारे फिखरों पे तहाके लगा के हँसती है वो हमराह है हमारी वो हमराज़ भी अब मरहम है ज़िंदगी खवाबों के परिंदे के पर लगाए ख़ूब देर तक उड़ती है
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आज बड़ी मुद्दत बाद मैंने और ज़िन्दगी ने साथ-साथ आँख खोली तो वह इतराई, उसकी महक़ में मंत्रमुग्ध रसा के भँवरे जैसा मेरा मन, या सावन की धुन लगा सफ़ेद सीतापंग, उमंगों की लहरों में गोते लगाता कूंची लिए अपने को रंगों से सजाता। कुछ क़दम क्या चले मन में चिंता घिर आई और माथे पर सलवटें ले आई, दुनिया सतरंगी और मैं सफ़ेद पट, यह कलाकार मन मौजी मेरा क्या रंगों को समझ पाएगा, ज़ीवन श्यामपट तो नहीं एक बार रंग भरा तो कहां फ़िर कोरा हो पायेगा, जाते-जाते पता नहीं यह फ़नकार मेरे संग-ए-क़बर पे दास्ताँ कौन सी खुदवाएगा। मन अटखेली करता मुझपे मुस्काया, हल्के से उसने मेरा परिचय जीवन के रंगों से करवाया, ख़ुशी का रंग सुबह की लालिमा सा लाल, तन्हाईयाँ काली बदरा सी, दुखों का रंग सफ़ेद, इश्क़ सुर्ख ग़ुलाब, खिलखिलाहट का रंग हरा, हर रास का एक रंग, कोई रास नहीं तो वह भी कहाँ बेरंग। ज़िंदगी ने फिर कहा कि अतरंगी ने ही जिया है मुझे, तू समझ की चादर न ओढ़ मोह का रंग काफ़ूर हो जाएगा, कल की सोच की आँधी में आज रेत सा सरक जाएगा, हर रंग भरेगी इस जीवन में तो अंत में यह फिर सफ़ेद पट हो जाएगा, इस रंगों की बारिश में वह सतरंगी हो जाएगा।
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Dec 25, 2018
Dec 25, 2018 at 6:46 PM UTC
ज़िंदगी के रंग!
आज बड़ी मुद्दत बाद मैंने और ज़िन्दगी ने साथ-साथ आँख खोली तो वह इतराई, उसकी महक़ में मंत्रमुग्ध रसा के भँवरे जैसा मेरा मन, या सावन की धुन लगा सफ़ेद सीतापंग, उमंगों की लहरों में गोते लगाता कूंची लिए अपने को रंगों से सजाता। कुछ क़दम क्या चले मन में चिंता घिर आई और माथे पर सलवटें ले आई, दुनिया सतरंगी और मैं सफ़ेद पट, यह कलाकार मन मौजी मेरा क्या रंगों को समझ पाएगा, ज़ीवन श्यामपट तो नहीं एक बार रंग भरा तो कहां फ़िर कोरा हो पायेगा, जाते-जाते पता नहीं यह फ़नकार मेरे संग-ए-क़बर पे दास्ताँ कौन सी खुदवाएगा। मन अटखेली करता मुझपे मुस्काया, हल्के से उसने मेरा परिचय जीवन के रंगों से करवाया, ख़ुशी का रंग सुबह की लालिमा सा लाल, तन्हाईयाँ काली बदरा सी, दुखों का रंग सफ़ेद, इश्क़ सुर्ख ग़ुलाब, खिलखिलाहट का रंग हरा, हर रास का एक रंग, कोई रास नहीं तो वह भी कहाँ बेरंग। ज़िंदगी ने फिर कहा कि अतरंगी ने ही जिया है मुझे, तू समझ की चादर न ओढ़ मोह का रंग काफ़ूर हो जाएगा, कल की सोच की आँधी में आज रेत सा सरक जाएगा, हर रंग भरेगी इस जीवन में तो अंत में यह फिर सफ़ेद पट हो जाएगा, इस रंगों की बारिश में वह सतरंगी हो जाएगा।
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आज एक अज़नबी ने पुछा हमसे बड़ी सोच में लगते हैं कुछ कहें ज़िन्दगी कैसे रही सवाल ने एक मुस्कराहट बिखेर दी चेहरे पे हमने कहा की जनाब अभी तो चल रही है ३-४ शब्द रख छोड़े हैं यम देवता को बतलाने देखिये कब मौका पड़ता है वोह बोले अभी तक का सफ़र ही कह दीजिये हमने कहा की क्या बयां करें बचपन उम्मीदों का घड़ा था आज सबक़ का बाजार है बड़ा बेफ़कूफी भरा साहस था आज रिश्तों की बेड़ियों ने जकड़ा हैं एक वक़्त था अजनबियों पर इतना विश्वास था की जान लगा दें आज कुध पे ही शक़ और हर रोज़ ज़िरह होती हैं एक सुकून जो मिला इस ज़िन्दगी में वो ममत्व का है ज़िन्दगी गुलज़ार लगेगी अगर उसके जहाँ में यह उमीदों का और हौसलों का घड़ा भरा रहें
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Dec 5, 2018
Dec 5, 2018 at 7:42 PM UTC
zindagi
आज एक अज़नबी ने पुछा हमसे बड़ी सोच में लगते हैं कुछ कहें ज़िन्दगी कैसे रही सवाल ने एक मुस्कराहट बिखेर दी चेहरे पे हमने कहा की जनाब अभी तो चल रही है ३-४ शब्द रख छोड़े हैं यम देवता को बतलाने देखिये कब मौका पड़ता है वोह बोले अभी तक का सफ़र ही कह दीजिये हमने कहा की क्या बयां करें बचपन उम्मीदों का घड़ा था आज सबक़ का बाजार है बड़ा बेफ़कूफी भरा साहस था आज रिश्तों की बेड़ियों ने जकड़ा हैं एक वक़्त था अजनबियों पर इतना विश्वास था की जान लगा दें आज कुध पे ही शक़ और हर रोज़ ज़िरह होती हैं एक सुकून जो मिला इस ज़िन्दगी में वो ममत्व का है ज़िन्दगी गुलज़ार लगेगी अगर उसके जहाँ में यह उमीदों का और हौसलों का घड़ा भरा रहें
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आज सावन की पहली बारिश हुई किसी ने कहा के सावन इश्क़ का मौसम है मन में मैं मंद सी मुस्काईं सोचा की इश्क़ भी क्या कभी मौसम का लिहाज़ करता है उसने कहा की मंद मंद क्या मुस्काते हो इश्क़ से दोस्ती है तुम्हारी तो हमें भी ज़रा मिला दो मैंने कहा की इश्क़ का क्या कहें, वोह बांवरा है किसी भी रूप रंग में वह हमेशा ही त्यार हर पल थोर ही देखता हो जैसे किसी मतवाले मन की आगाज की खुशियाँ ऐसी की अंजाम के दुःख को भुला दे और हर बार उसमे एक नया पाकपन की सुबह की ओस की बूँद ही नहीं वोह नयी दुल्हन को भी लज्जा दे वोह देता है जीने का एहसास ऐसे की साँस भी अगली इश्क़ बिना ना आना चाहे उसने कहा की तुम इश्क़ को इतना जानते हो कोई इसके पुराने चश्मीदिगार लगते हो मैंने कहा मतवाले इश्क़ के कायल तो जरुर हैं हम पर उसके बीमार नहीं उसने रुलाया तो हमें भी पर उसकी हँसियों का इंतज़ार हमें आज भी आज सावन का ही बहाना ले के आ जाये हमारे चेहरे ने कई दिनों से मुसकुराहट नहीं देखी
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Dec 5, 2018
Dec 5, 2018 at 7:41 PM UTC
ishq aur saavan
आज सावन की पहली बारिश हुई किसी ने कहा के सावन इश्क़ का मौसम है मन में मैं मंद सी मुस्काईं सोचा की इश्क़ भी क्या कभी मौसम का लिहाज़ करता है उसने कहा की मंद मंद क्या मुस्काते हो इश्क़ से दोस्ती है तुम्हारी तो हमें भी ज़रा मिला दो मैंने कहा की इश्क़ का क्या कहें, वोह बांवरा है किसी भी रूप रंग में वह हमेशा ही त्यार हर पल थोर ही देखता हो जैसे किसी मतवाले मन की आगाज की खुशियाँ ऐसी की अंजाम के दुःख को भुला दे और हर बार उसमे एक नया पाकपन की सुबह की ओस की बूँद ही नहीं वोह नयी दुल्हन को भी लज्जा दे वोह देता है जीने का एहसास ऐसे की साँस भी अगली इश्क़ बिना ना आना चाहे उसने कहा की तुम इश्क़ को इतना जानते हो कोई इसके पुराने चश्मीदिगार लगते हो मैंने कहा मतवाले इश्क़ के कायल तो जरुर हैं हम पर उसके बीमार नहीं उसने रुलाया तो हमें भी पर उसकी हँसियों का इंतज़ार हमें आज भी आज सावन का ही बहाना ले के आ जाये हमारे चेहरे ने कई दिनों से मुसकुराहट नहीं देखी
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कल ट्रेन में एक नन्ही सी कली देखी खिलखिलाती उसकी हँसी मन मोहती मासूमियत ज़िन्दगी की झुलसती धुप में   वोह एक हवा का झोंका ले आयी मन किया दो पल ठहरने को उसके पलों में अपने भूले बिसरे पल फिर से जीने को यूँ देखो तो उसकी ज़िन्दगी में बहुत दिक्कतें देखी वोह बेपरफा फ़िर भी खुशी से भरपूर मिली यह जादू है बचपन का उम्मीदों से भरता है एक छोटा सा लम्हा ही खुशियों की बहार ले आता है थोड़ी मैंने भी अपनी चादर में लपेट ली बहुत सुकून था उस पल में पर दुसरे ही पल चिंता घिर आयी की इस ज़िन्दगी के मंथन ने सबकी मासूमियत की चुनरी हटा के समझदारी की ओढ़नी उड़ायी है मेरी माँ ने भी कहाँ चाहा ना होगा पर वो भी कहाँ रोक पायी इस परिवर्तन को रिश्तों के भंवर में मासूमियत को उड़ना ही है समझदारी ने फिर हरा दिया बेपरवाही को मेरी मुस्कान फिर उड़ गयी और घिर आयी चुप्पी और मेरा स्टेशन भी आ गया था
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Dec 5, 2018
Dec 5, 2018 at 7:37 PM UTC
ek nanhi kali
कल ट्रेन में एक नन्ही सी कली देखी खिलखिलाती उसकी हँसी मन मोहती मासूमियत ज़िन्दगी की झुलसती धुप में   वोह एक हवा का झोंका ले आयी मन किया दो पल ठहरने को उसके पलों में अपने भूले बिसरे पल फिर से जीने को यूँ देखो तो उसकी ज़िन्दगी में बहुत दिक्कतें देखी वोह बेपरफा फ़िर भी खुशी से भरपूर मिली यह जादू है बचपन का उम्मीदों से भरता है एक छोटा सा लम्हा ही खुशियों की बहार ले आता है थोड़ी मैंने भी अपनी चादर में लपेट ली बहुत सुकून था उस पल में पर दुसरे ही पल चिंता घिर आयी की इस ज़िन्दगी के मंथन ने सबकी मासूमियत की चुनरी हटा के समझदारी की ओढ़नी उड़ायी है मेरी माँ ने भी कहाँ चाहा ना होगा पर वो भी कहाँ रोक पायी इस परिवर्तन को रिश्तों के भंवर में मासूमियत को उड़ना ही है समझदारी ने फिर हरा दिया बेपरवाही को मेरी मुस्कान फिर उड़ गयी और घिर आयी चुप्पी और मेरा स्टेशन भी आ गया था
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