खंजर पर खंजर पीठ पीछे घोंपे गए,
गिनती तो कहाँ से होती जब—
अनगिनत, बेहिसाब घोंपे गए।
जब पीछे मुड़ा मैं, तो हैरान था,
घाव देने वाला हर कोई
मुझ पर मेहरबान था।
मैं देखकर इस अदाकारी को
विचलित से ज़्यादा अचंभित हुआ,
जिन्होंने घाव दिए,
उन्होंने भी बड़ी सहानुभूति से छुआ।
आज भी जब उन वारों को याद करता हूँ,
मानो मैं खुद
मेरे घावों को नया करता हूँ।
उन्होंने तो मान रखा है कि मैं अंजान
हर एक घाती से,
पर मैं कब अनभिज्ञ उनसे
और उनकी उस ज़्यादती से।
खंजर वो आज भी याद जो
धोखे से घोंपे गए,
आज भी छाप उनकी
मन में छाई है—
बस वो दौर ही
मेरे लिए एक काली परछाई है।
काश कि सामने से वार हुआ होता,
परिणाम आज
कुछ भिन्न हुआ होता।
खंजर तो निकाल दिए गए,
पर आज भी विष उनका
मेरे रक्त में घुला हुआ है।
जब भी मुड़ता हूँ भूत में फिर वहीं,
हर एक घाव
आज भी खुला हुआ है।
भूल जाना भी चाहता हूँ,
पर हृदय और मन
विद्रोह कर बैठते हैं।
होता है कोई एक काबू में,
पर फिर याद कर घावों को
दोनों ही ऐंठते हैं।
एक बोलता है—
भूल जा घावों को,
तो एक जगा देता है
बदले के भावों को।
मैं खुद को असमंजस में
फँसा पाता हूँ,
फिर सब कुछ वक्त पर
छोड़ देता हूँ,
फिर उन बेबुनियादी
ज़ंजीरों को तोड़ देता हूँ।
Dec 20, 2025
Dec 20, 2025 at 9:40 AM UTC
खंजर पर खंजर पीठ पीछे घोंपे गए,
गिनती तो कहाँ से होती जब—
अनगिनत, बेहिसाब घोंपे गए।
जब पीछे मुड़ा मैं, तो हैरान था,
घाव देने वाला हर कोई
मुझ पर मेहरबान था।
मैं देखकर इस अदाकारी को
विचलित से ज़्यादा अचंभित हुआ,
जिन्होंने घाव दिए,
उन्होंने भी बड़ी सहानुभूति से छुआ।
आज भी जब उन वारों को याद करता हूँ,
मानो मैं खुद
मेरे घावों को नया करता हूँ।
उन्होंने तो मान रखा है कि मैं अंजान
हर एक घाती से,
पर मैं कब अनभिज्ञ उनसे
और उनकी उस ज़्यादती से।
खंजर वो आज भी याद जो
धोखे से घोंपे गए,
आज भी छाप उनकी
मन में छाई है—
बस वो दौर ही
मेरे लिए एक काली परछाई है।
काश कि सामने से वार हुआ होता,
परिणाम आज
कुछ भिन्न हुआ होता।
खंजर तो निकाल दिए गए,
पर आज भी विष उनका
मेरे रक्त में घुला हुआ है।
जब भी मुड़ता हूँ भूत में फिर वहीं,
हर एक घाव
आज भी खुला हुआ है।
भूल जाना भी चाहता हूँ,
पर हृदय और मन
विद्रोह कर बैठते हैं।
होता है कोई एक काबू में,
पर फिर याद कर घावों को
दोनों ही ऐंठते हैं।
एक बोलता है—
भूल जा घावों को,
तो एक जगा देता है
बदले के भावों को।
मैं खुद को असमंजस में
फँसा पाता हूँ,
फिर सब कुछ वक्त पर
छोड़ देता हूँ,
फिर उन बेबुनियादी
ज़ंजीरों को तोड़ देता हूँ।
खंजर पर खंजर पीठ पीछे घोंपे गए,
गिनती तो कहाँ से होती जब—
अनगिनत, बेहिसाब घोंपे गए।
जब पीछे मुड़ा मैं, तो हैरान था,
घाव देने वाला हर कोई
मुझ पर मेहरबान था।
