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#truewords
खंजर पर खंजर पीठ पीछे घोंपे गए, गिनती तो कहाँ से होती जब— अनगिनत, बेहिसाब घोंपे गए। जब पीछे मुड़ा मैं, तो हैरान था, घाव देने वाला हर कोई मुझ पर मेहरबान था। मैं देखकर इस अदाकारी को विचलित से ज़्यादा अचंभित हुआ, जिन्होंने घाव दिए, उन्होंने भी बड़ी सहानुभूति से छुआ। आज भी जब उन वारों को याद करता हूँ, मानो मैं खुद मेरे घावों को नया करता हूँ। उन्होंने तो मान रखा है कि मैं अंजान हर एक घाती से, पर मैं कब अनभिज्ञ उनसे और उनकी उस ज़्यादती से। खंजर वो आज भी याद जो धोखे से घोंपे गए, आज भी छाप उनकी मन में छाई है— बस वो दौर ही मेरे लिए एक काली परछाई है। काश कि सामने से वार हुआ होता, परिणाम आज कुछ भिन्न हुआ होता। खंजर तो निकाल दिए गए, पर आज भी विष उनका मेरे रक्त में घुला हुआ है। जब भी मुड़ता हूँ भूत में फिर वहीं, हर एक घाव आज भी खुला हुआ है। भूल जाना भी चाहता हूँ, पर हृदय और मन विद्रोह कर बैठते हैं। होता है कोई एक काबू में, पर फिर याद कर घावों को दोनों ही ऐंठते हैं। एक बोलता है— भूल जा घावों को, तो एक जगा देता है बदले के भावों को। मैं खुद को असमंजस में फँसा पाता हूँ, फिर सब कुछ वक्त पर छोड़ देता हूँ, फिर उन बेबुनियादी ज़ंजीरों को तोड़ देता हूँ।
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Dec 20, 2025
Dec 20, 2025 at 9:40 AM UTC
सहानुभूति में लिपटा विश्वासघात
खंजर पर खंजर पीठ पीछे घोंपे गए, गिनती तो कहाँ से होती जब— अनगिनत, बेहिसाब घोंपे गए। जब पीछे मुड़ा मैं, तो हैरान था, घाव देने वाला हर कोई मुझ पर मेहरबान था। मैं देखकर इस अदाकारी को विचलित से ज़्यादा अचंभित हुआ, जिन्होंने घाव दिए, उन्होंने भी बड़ी सहानुभूति से छुआ। आज भी जब उन वारों को याद करता हूँ, मानो मैं खुद मेरे घावों को नया करता हूँ। उन्होंने तो मान रखा है कि मैं अंजान हर एक घाती से, पर मैं कब अनभिज्ञ उनसे और उनकी उस ज़्यादती से। खंजर वो आज भी याद जो धोखे से घोंपे गए, आज भी छाप उनकी मन में छाई है— बस वो दौर ही मेरे लिए एक काली परछाई है। काश कि सामने से वार हुआ होता, परिणाम आज कुछ भिन्न हुआ होता। खंजर तो निकाल दिए गए, पर आज भी विष उनका मेरे रक्त में घुला हुआ है। जब भी मुड़ता हूँ भूत में फिर वहीं, हर एक घाव आज भी खुला हुआ है। भूल जाना भी चाहता हूँ, पर हृदय और मन विद्रोह कर बैठते हैं। होता है कोई एक काबू में, पर फिर याद कर घावों को दोनों ही ऐंठते हैं। एक बोलता है— भूल जा घावों को, तो एक जगा देता है बदले के भावों को। मैं खुद को असमंजस में फँसा पाता हूँ, फिर सब कुछ वक्त पर छोड़ देता हूँ, फिर उन बेबुनियादी ज़ंजीरों को तोड़ देता हूँ।
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BOY: Please take care, will you? GIRL: Naah. BOY: Why so? GIRL: Because that's your job.
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May 7, 2015
May 7, 2015 at 2:18 AM UTC
Short Story
I still love, though my heart is full of pain I give you my everything, with nothing to gain You got a hold on me can't seem to let go Pulling you back everytime you got your foot out the door Love is patient, love is kind, it does not envy When you utter the word love I get stuck in a frenzy Your actions contradict your words of affection Your silence is loud when I yearn for your attention My mind is demented my heart is confused Should I stay or rather leave, what do I choose? You got a hold on me can't seem to let go As I reminisce on what love used to be before.
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Jan 13, 2015
Jan 13, 2015 at 3:17 PM UTC
You Got A Hold On Me