वो गुजरे हुए वक्त के खामोश गवाहों ने
आज कुछ पूछना चाहा उन हवाओ से
जो आती नजर आयी उन रहस्यमयी राहों से
उन कदंब के खोखल में बैठे तोतों और गिलहरियां
का लगाव उन पेड़ो की कोख और उनकी बाहों से
वो चहचहाहट उन अनगिनत पक्षियों की
बहुत दूर कहा उन पिंजरों की आहट से
वो चहक भी अब बदली सी नजर आती है
उन पिंजरों में कैद सलाखों की झटपटाहट से
हर किसी पर क्यू ये हुकूमत उन लोगों की है
क्या इनमें भी गलती उन वृक्षों उन खगो की है
नाता ही इंसान ने अब इंसानियत से तोड़ लिया है
अब छोड़कर जीवों को नाता मशीनों से जोड़ लिया है
अब विनाश भी तो खुद अपनी ओर मोड़ लिया है
काश समझा होता उन जीवो की निश्चलता को
याद किया होता उनके साथ बुजुर्गों की प्रफुलता को
Jan 10
Jan 10, 2026 at 3:11 PM UTC
वो गुजरे हुए वक्त के खामोश गवाहों ने
आज कुछ पूछना चाहा उन हवाओ से
जो आती नजर आयी उन रहस्यमयी राहों से
उन कदंब के खोखल में बैठे तोतों और गिलहरियां
का लगाव उन पेड़ो की कोख और उनकी बाहों से
वो चहचहाहट उन अनगिनत पक्षियों की
बहुत दूर कहा उन पिंजरों की आहट से
वो चहक भी अब बदली सी नजर आती है
उन पिंजरों में कैद सलाखों की झटपटाहट से
हर किसी पर क्यू ये हुकूमत उन लोगों की है
क्या इनमें भी गलती उन वृक्षों उन खगो की है
नाता ही इंसान ने अब इंसानियत से तोड़ लिया है
अब छोड़कर जीवों को नाता मशीनों से जोड़ लिया है
अब विनाश भी तो खुद अपनी ओर मोड़ लिया है
काश समझा होता उन जीवो की निश्चलता को
याद किया होता उनके साथ बुजुर्गों की प्रफुलता को
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