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वो एक दौर पुराना था काव्य संग्रह की निशीथ काल सीरीज से लेखक नितिन कुमार मीना अब एक कहानी फिर से लिखना चाहता हु जो असंभव है फिर भी वो बचपन जीना चाहता हूं आज प्रत्येक दिन नागवार सा मेहसूस होता है हर एक लम्हा हर एक पल बस घावों को ढोता है आज मै खुद अपनी दास्तान बया करना चाहता हु जो भी सहा, जिया और फिर भी मै आज तक जीया उन सब मिले अजावो के जख्म गिनाना चाहता हु बस सुकून अब उस निशीथ में नजर आता है पर वो पहर भी तो थोड़ी देर के लिए आता है आज मै खुद इस जीवन पथ की धूमिल पगडंडी पर इसलिए मैं बस इस सफर की मंजिल चाहता हु आज मै अपनी सहनशीलता के चरम पर इस लिए अब मै एक प्रखर संवाद चाहता हु कुछ लोगों ने जो कारीगरी मेरे जीवन में की है ये कोई हमदर्दी तो है नहीं, फिर क्यू की है मै बस अपने चरित्र पर चित्रकारी का कारण चाहता हु अब फैसला हो मेरे जज्बातों से खिलवाड़ का मै अब बस शीघ्र अतिशीघ्र वो न्यायिक वक्त चाहता हु लेखक नितिन कुमार मीना
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Jan 15
Jan 15, 2026 at 9:25 AM UTC
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वो एक दौर पुराना था काव्य संग्रह की निशीथ काल सीरीज से लेखक नितिन कुमार मीना अब एक कहानी फिर से लिखना चाहता हु जो असंभव है फिर भी वो बचपन जीना चाहता हूं आज प्रत्येक दिन नागवार सा मेहसूस होता है हर एक लम्हा हर एक पल बस घावों को ढोता है आज मै खुद अपनी दास्तान बया करना चाहता हु जो भी सहा, जिया और फिर भी मै आज तक जीया उन सब मिले अजावो के जख्म गिनाना चाहता हु बस सुकून अब उस निशीथ में नजर आता है पर वो पहर भी तो थोड़ी देर के लिए आता है आज मै खुद इस जीवन पथ की धूमिल पगडंडी पर इसलिए मैं बस इस सफर की मंजिल चाहता हु आज मै अपनी सहनशीलता के चरम पर इस लिए अब मै एक प्रखर संवाद चाहता हु कुछ लोगों ने जो कारीगरी मेरे जीवन में की है ये कोई हमदर्दी तो है नहीं, फिर क्यू की है मै बस अपने चरित्र पर चित्रकारी का कारण चाहता हु अब फैसला हो मेरे जज्बातों से खिलवाड़ का मै अब बस शीघ्र अतिशीघ्र वो न्यायिक वक्त चाहता हु लेखक नितिन कुमार मीना
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आज पेश आख़िरी एक अपील की जाएगी उसी पवित्र काल निशीथ में की जाएगी। ये किसी और के लिए नहीं, मेरे खुद के आहत आत्म के समक्ष की जाएगी। जो भी अंतिम निर्णय मुझको दिया जाएगा, फिर खुद मेरा भी दख़ल उसमें न लिया जाएगा। आज कुछ गहरे चालसाज़ों को प्रतिबंधित किया जाए, या उन्हें हमेशा के लिए किसी गहरी काल-कोठरी में— जो मेरी यादों में भी नज़र न आए— उनमें ढकेल दिया जाए। पूर्ण आहत मेरा आत्म आज खुद बोलेगा, सह चुका जो भी सहना था— आज अपनी चुप्पी भी तोड़ेगा। आज मेरा मन और हृदय आत्म की दलील करेंगे, पूर्ण सहयोग आत्म का कर कुछ उसके घावों को भरेंगे। अब आत्म भी खुद को मज़बूत महसूस कर रहा है, अब इस वक़्त वो कहाँ किसी से डर रहा है। अब एक अंतिम निर्णय और आदेश मेरे लिए पारित किया जाएगा। अब फूट पड़ा मेरा आत्म और सख़्ती से बोलता है मुझे— अब हर एक कार्य त्वरित वेग से किया जाएगा। अब बहुत झुक लिया दूसरों के लिए जो अंजान से थे, अब किसी ऐरे-गैरे के लिए झुकना मंज़ूर नहीं। जो खेल गए मेरे आत्म से, जो झिझके भी नहीं उस परमात्म से— आहत मेरा हृदय कर, आघात मेरे मन पर गहरा कर गए, और घायल मेरे आत्म को कर गए। — लेखक: नितिन कुमार मीना
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Jan 13
Jan 13, 2026 at 9:31 AM UTC
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आज पेश आख़िरी एक अपील की जाएगी उसी पवित्र काल निशीथ में की जाएगी। ये किसी और के लिए नहीं, मेरे खुद के आहत आत्म के समक्ष की जाएगी। जो भी अंतिम निर्णय मुझको दिया जाएगा, फिर खुद मेरा भी दख़ल उसमें न लिया जाएगा। आज कुछ गहरे चालसाज़ों को प्रतिबंधित किया जाए, या उन्हें हमेशा के लिए किसी गहरी काल-कोठरी में— जो मेरी यादों में भी नज़र न आए— उनमें ढकेल दिया जाए। पूर्ण आहत मेरा आत्म आज खुद बोलेगा, सह चुका जो भी सहना था— आज अपनी चुप्पी भी तोड़ेगा। आज मेरा मन और हृदय आत्म की दलील करेंगे, पूर्ण सहयोग आत्म का कर कुछ उसके घावों को भरेंगे। अब आत्म भी खुद को मज़बूत महसूस कर रहा है, अब इस वक़्त वो कहाँ किसी से डर रहा है। अब एक अंतिम निर्णय और आदेश मेरे लिए पारित किया जाएगा। अब फूट पड़ा मेरा आत्म और सख़्ती से बोलता है मुझे— अब हर एक कार्य त्वरित वेग से किया जाएगा। अब बहुत झुक लिया दूसरों के लिए जो अंजान से थे, अब किसी ऐरे-गैरे के लिए झुकना मंज़ूर नहीं। जो खेल गए मेरे आत्म से, जो झिझके भी नहीं उस परमात्म से— आहत मेरा हृदय कर, आघात मेरे मन पर गहरा कर गए, और घायल मेरे आत्म को कर गए। — लेखक: नितिन कुमार मीना
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*पूर्ण आहत आत्म की घोषणा आज पेश आख़िरी एक अपील की जाएगी उसी पवित्र काल निशीथ में की जाएगी। ये किसी और के लिए नहीं, मेरे खुद के आहत आत्म के समक्ष की जाएगी। जो भी अंतिम निर्णय मुझको दिया जाएगा, फिर खुद मेरा भी दख़ल उसमें न लिया जाएगा। आज कुछ गहरे चालसाज़ों को प्रतिबंधित किया जाए, या उन्हें हमेशा के लिए किसी गहरी काल-कोठरी में— जो मेरी यादों में भी नज़र न आए— उनमें ढकेल दिया जाए। पूर्ण आहत मेरा आत्म आज खुद बोलेगा, सह चुका जो भी सहना था— आज अपनी चुप्पी भी तोड़ेगा। आज मेरा मन और हृदय आत्म की दलील करेंगे, पूर्ण सहयोग आत्म का कर कुछ उसके घावों को भरेंगे। अब आत्म भी खुद को मज़बूत महसूस कर रहा है, अब इस वक़्त वो कहाँ किसी से डर रहा है। अब एक अंतिम निर्णय और आदेश मेरे लिए पारित किया जाएगा। अब फूट पड़ा मेरा आत्म और सख़्ती से बोलता है मुझे— अब हर एक कार्य त्वरित वेग से किया जाएगा। अब बहुत झुक लिया दूसरों के लिए जो अंजान से थे, अब किसी ऐरे-गैरे के लिए झुकना मंज़ूर नहीं। जो खेल गए मेरे आत्म से, जो झिझके भी नहीं उस परमात्म से— आहत मेरा हृदय कर, आघात मेरे मन पर गहरा कर गए, और घायल मेरे आत्म को कर गए। — लेखक: नितिन कुमार मीना
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Jan 13
Jan 13, 2026 at 9:31 AM UTC
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*पूर्ण आहत आत्म की घोषणा आज पेश आख़िरी एक अपील की जाएगी उसी पवित्र काल निशीथ में की जाएगी। ये किसी और के लिए नहीं, मेरे खुद के आहत आत्म के समक्ष की जाएगी। जो भी अंतिम निर्णय मुझको दिया जाएगा, फिर खुद मेरा भी दख़ल उसमें न लिया जाएगा। आज कुछ गहरे चालसाज़ों को प्रतिबंधित किया जाए, या उन्हें हमेशा के लिए किसी गहरी काल-कोठरी में— जो मेरी यादों में भी नज़र न आए— उनमें ढकेल दिया जाए। पूर्ण आहत मेरा आत्म आज खुद बोलेगा, सह चुका जो भी सहना था— आज अपनी चुप्पी भी तोड़ेगा। आज मेरा मन और हृदय आत्म की दलील करेंगे, पूर्ण सहयोग आत्म का कर कुछ उसके घावों को भरेंगे। अब आत्म भी खुद को मज़बूत महसूस कर रहा है, अब इस वक़्त वो कहाँ किसी से डर रहा है। अब एक अंतिम निर्णय और आदेश मेरे लिए पारित किया जाएगा। अब फूट पड़ा मेरा आत्म और सख़्ती से बोलता है मुझे— अब हर एक कार्य त्वरित वेग से किया जाएगा। अब बहुत झुक लिया दूसरों के लिए जो अंजान से थे, अब किसी ऐरे-गैरे के लिए झुकना मंज़ूर नहीं। जो खेल गए मेरे आत्म से, जो झिझके भी नहीं उस परमात्म से— आहत मेरा हृदय कर, आघात मेरे मन पर गहरा कर गए, और घायल मेरे आत्म को कर गए। — लेखक: नितिन कुमार मीना
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वो गुजरे हुए वक्त के खामोश गवाहों ने आज कुछ पूछना चाहा उन हवाओ से जो आती नजर आयी उन रहस्यमयी राहों से उन कदंब के खोखल में बैठे तोतों और गिलहरियां का लगाव उन पेड़ो की कोख और उनकी बाहों से वो चहचहाहट उन अनगिनत पक्षियों की बहुत दूर कहा उन पिंजरों की आहट से वो चहक भी अब बदली सी नजर आती है उन पिंजरों में कैद सलाखों की झटपटाहट से हर किसी पर क्यू ये हुकूमत उन लोगों की है क्या इनमें भी गलती उन वृक्षों उन खगो की है नाता ही इंसान ने अब इंसानियत से तोड़ लिया है अब छोड़कर जीवों को नाता मशीनों से जोड़ लिया है अब विनाश भी तो खुद अपनी ओर मोड़ लिया है काश समझा होता उन जीवो की निश्चलता को याद किया होता उनके साथ बुजुर्गों की प्रफुलता को
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Jan 10
Jan 10, 2026 at 3:11 PM UTC
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वो गुजरे हुए वक्त के खामोश गवाहों ने आज कुछ पूछना चाहा उन हवाओ से जो आती नजर आयी उन रहस्यमयी राहों से उन कदंब के खोखल में बैठे तोतों और गिलहरियां का लगाव उन पेड़ो की कोख और उनकी बाहों से वो चहचहाहट उन अनगिनत पक्षियों की बहुत दूर कहा उन पिंजरों की आहट से वो चहक भी अब बदली सी नजर आती है उन पिंजरों में कैद सलाखों की झटपटाहट से हर किसी पर क्यू ये हुकूमत उन लोगों की है क्या इनमें भी गलती उन वृक्षों उन खगो की है नाता ही इंसान ने अब इंसानियत से तोड़ लिया है अब छोड़कर जीवों को नाता मशीनों से जोड़ लिया है अब विनाश भी तो खुद अपनी ओर मोड़ लिया है काश समझा होता उन जीवो की निश्चलता को याद किया होता उनके साथ बुजुर्गों की प्रफुलता को
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भेदकर हृदय की पतवार को, ना सुनकर मन की चित्कार को, उस सत्व को हत् तुमने किया है— था जो पूर्व रचित, तुमने क्यूँ किया है। अब ना समेट मुझको, बिखरा ही रहने दे; मैं नहीं चाहता कोई मरहम तुमसे— मुझे घावों से लिपटा ही रहने दे। हर एक बार क्यूँ मेरी रूह का हनन किया गया, हर एक सत्य के बदले झूठ दिया गया? रक्त-रंजित मेरा आत्मसम्मान, इसको रक्त से ही धोने दे। मैं नहीं चाहता कुछ भी प्राप्त करना, बस खोने ही दे। मेरी निर्भीकता को कुचला गया क्यूँ छल से— इसका प्रत्युत्तर तो मुझे लेने ही दे। मत समझ मेरी उस वेदना के आयाम को, हर पल याद मुझे—सुबह से लेकर श्याम को। हृदय को भी भेदकर जो आत्म को घायल कर गए, मेरे लिए जीवित ही कब थे— वो तो कब के मर गए। पृष्ठ पर वार कर क्यूँ ये सहानुभूति का लेपन है? हर वार का प्रत्युत्तर मेरी कलम का लेखन है। देह का विनाश तो मंजूर मुझे, पर छल से आत्म को क्षीर्ण करने की क्या आवश्यकता थी? आज पर जीता हूँ मैं—कल के आह्वान की क्या आवश्यकता थी? विचरण जब रातों को किया जाता है, मन में लहरें किलोल किया करती हैं— हर बार मेरे सत्य को छला करती हैं। ऐसी क्या विवशता थी, जो मुझे कसक दी गयी? जब मैंने हमेशा सम्मान दिया, फिर क्यूँ ये रश्क दी गयी? सौगंध मुझे मेरे उस घायल आत्मसम्मान की, जीवन में घटित घटनाओं के भान की। तपकर उस कृशानु में, हार न स्वीकार मुझे— छल तो कभी न अपनाऊँगा, कैसे भी तुझको हराऊँगा। कंठ भी शुष्क अब रूंध-सा गया है, तेरा हर एक छल मेरे सत्य को मूंद-सा गया है। आएगा निश्चित वो वक्त भी, जब पुनः मैं सम्भल जाऊँगा। घाव भी भरेंगे, और रण में पुनः नज़र मैं आऊँगा। अब आत्मसम्मान से खिलवाड़ न होगा कभी— साक्षात् साक्ष होंगी दशो दिशाएँ, शशि और रवि। तू माँगना तेरी रहमत उस परमात्म से— न हो सामना तेरा मेरे उस घायल आत्म से।
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Dec 10, 2025
Dec 10, 2025 at 10:55 AM UTC
पुनः मैं रण में आऊँगा”
भेदकर हृदय की पतवार को, ना सुनकर मन की चित्कार को, उस सत्व को हत् तुमने किया है— था जो पूर्व रचित, तुमने क्यूँ किया है। अब ना समेट मुझको, बिखरा ही रहने दे; मैं नहीं चाहता कोई मरहम तुमसे— मुझे घावों से लिपटा ही रहने दे। हर एक बार क्यूँ मेरी रूह का हनन किया गया, हर एक सत्य के बदले झूठ दिया गया? रक्त-रंजित मेरा आत्मसम्मान, इसको रक्त से ही धोने दे। मैं नहीं चाहता कुछ भी प्राप्त करना, बस खोने ही दे। मेरी निर्भीकता को कुचला गया क्यूँ छल से— इसका प्रत्युत्तर तो मुझे लेने ही दे। मत समझ मेरी उस वेदना के आयाम को, हर पल याद मुझे—सुबह से लेकर श्याम को। हृदय को भी भेदकर जो आत्म को घायल कर गए, मेरे लिए जीवित ही कब थे— वो तो कब के मर गए। पृष्ठ पर वार कर क्यूँ ये सहानुभूति का लेपन है? हर वार का प्रत्युत्तर मेरी कलम का लेखन है। देह का विनाश तो मंजूर मुझे, पर छल से आत्म को क्षीर्ण करने की क्या आवश्यकता थी? आज पर जीता हूँ मैं—कल के आह्वान की क्या आवश्यकता थी? विचरण जब रातों को किया जाता है, मन में लहरें किलोल किया करती हैं— हर बार मेरे सत्य को छला करती हैं। ऐसी क्या विवशता थी, जो मुझे कसक दी गयी? जब मैंने हमेशा सम्मान दिया, फिर क्यूँ ये रश्क दी गयी? सौगंध मुझे मेरे उस घायल आत्मसम्मान की, जीवन में घटित घटनाओं के भान की। तपकर उस कृशानु में, हार न स्वीकार मुझे— छल तो कभी न अपनाऊँगा, कैसे भी तुझको हराऊँगा। कंठ भी शुष्क अब रूंध-सा गया है, तेरा हर एक छल मेरे सत्य को मूंद-सा गया है। आएगा निश्चित वो वक्त भी, जब पुनः मैं सम्भल जाऊँगा। घाव भी भरेंगे, और रण में पुनः नज़र मैं आऊँगा। अब आत्मसम्मान से खिलवाड़ न होगा कभी— साक्षात् साक्ष होंगी दशो दिशाएँ, शशि और रवि। तू माँगना तेरी रहमत उस परमात्म से— न हो सामना तेरा मेरे उस घायल आत्म से।
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Only if you knew how much I torture myself to be with you “just as a friend.”
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Feb 14, 2021
Feb 14, 2021 at 1:46 PM UTC
just as a friend
The promise to stay is just a lie that uh wanna delay the promise to love is something above Reality is not just not him and him not being real all I fear is being him with her and her doesn't exsists what exsists in him is me that would soon flee That separation would be easy my heart wouldn't ache and these illusions are all my heart make Our love can't be viewed as there aren't any hands craving but heart pounding is amazing that could be felt dude But these feelings can't overcome the ****** and *** that he is responsible for and he got no score
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Sep 27, 2020
Sep 27, 2020 at 3:40 AM UTC
PROMISE ME