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भेदकर हृदय की पतवार को, ना सुनकर मन की चित्कार को, उस सत्व को हत् तुमने किया है— था जो पूर्व रचित, तुमने क्यूँ किया है। अब ना समेट मुझको, बिखरा ही रहने दे; मैं नहीं चाहता कोई मरहम तुमसे— मुझे घावों से लिपटा ही रहने दे। हर एक बार क्यूँ मेरी रूह का हनन किया गया, हर एक सत्य के बदले झूठ दिया गया? रक्त-रंजित मेरा आत्मसम्मान, इसको रक्त से ही धोने दे। मैं नहीं चाहता कुछ भी प्राप्त करना, बस खोने ही दे। मेरी निर्भीकता को कुचला गया क्यूँ छल से— इसका प्रत्युत्तर तो मुझे लेने ही दे। मत समझ मेरी उस वेदना के आयाम को, हर पल याद मुझे—सुबह से लेकर श्याम को। हृदय को भी भेदकर जो आत्म को घायल कर गए, मेरे लिए जीवित ही कब थे— वो तो कब के मर गए। पृष्ठ पर वार कर क्यूँ ये सहानुभूति का लेपन है? हर वार का प्रत्युत्तर मेरी कलम का लेखन है। देह का विनाश तो मंजूर मुझे, पर छल से आत्म को क्षीर्ण करने की क्या आवश्यकता थी? आज पर जीता हूँ मैं—कल के आह्वान की क्या आवश्यकता थी? विचरण जब रातों को किया जाता है, मन में लहरें किलोल किया करती हैं— हर बार मेरे सत्य को छला करती हैं। ऐसी क्या विवशता थी, जो मुझे कसक दी गयी? जब मैंने हमेशा सम्मान दिया, फिर क्यूँ ये रश्क दी गयी? सौगंध मुझे मेरे उस घायल आत्मसम्मान की, जीवन में घटित घटनाओं के भान की। तपकर उस कृशानु में, हार न स्वीकार मुझे— छल तो कभी न अपनाऊँगा, कैसे भी तुझको हराऊँगा। कंठ भी शुष्क अब रूंध-सा गया है, तेरा हर एक छल मेरे सत्य को मूंद-सा गया है। आएगा निश्चित वो वक्त भी, जब पुनः मैं सम्भल जाऊँगा। घाव भी भरेंगे, और रण में पुनः नज़र मैं आऊँगा। अब आत्मसम्मान से खिलवाड़ न होगा कभी— साक्षात् साक्ष होंगी दशो दिशाएँ, शशि और रवि। तू माँगना तेरी रहमत उस परमात्म से— न हो सामना तेरा मेरे उस घायल आत्म से।
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Dec 10, 2025
Dec 10, 2025 at 10:55 AM UTC
पुनः मैं रण में आऊँगा”
भेदकर हृदय की पतवार को, ना सुनकर मन की चित्कार को, उस सत्व को हत् तुमने किया है— था जो पूर्व रचित, तुमने क्यूँ किया है। अब ना समेट मुझको, बिखरा ही रहने दे; मैं नहीं चाहता कोई मरहम तुमसे— मुझे घावों से लिपटा ही रहने दे। हर एक बार क्यूँ मेरी रूह का हनन किया गया, हर एक सत्य के बदले झूठ दिया गया? रक्त-रंजित मेरा आत्मसम्मान, इसको रक्त से ही धोने दे। मैं नहीं चाहता कुछ भी प्राप्त करना, बस खोने ही दे। मेरी निर्भीकता को कुचला गया क्यूँ छल से— इसका प्रत्युत्तर तो मुझे लेने ही दे। मत समझ मेरी उस वेदना के आयाम को, हर पल याद मुझे—सुबह से लेकर श्याम को। हृदय को भी भेदकर जो आत्म को घायल कर गए, मेरे लिए जीवित ही कब थे— वो तो कब के मर गए। पृष्ठ पर वार कर क्यूँ ये सहानुभूति का लेपन है? हर वार का प्रत्युत्तर मेरी कलम का लेखन है। देह का विनाश तो मंजूर मुझे, पर छल से आत्म को क्षीर्ण करने की क्या आवश्यकता थी? आज पर जीता हूँ मैं—कल के आह्वान की क्या आवश्यकता थी? विचरण जब रातों को किया जाता है, मन में लहरें किलोल किया करती हैं— हर बार मेरे सत्य को छला करती हैं। ऐसी क्या विवशता थी, जो मुझे कसक दी गयी? जब मैंने हमेशा सम्मान दिया, फिर क्यूँ ये रश्क दी गयी? सौगंध मुझे मेरे उस घायल आत्मसम्मान की, जीवन में घटित घटनाओं के भान की। तपकर उस कृशानु में, हार न स्वीकार मुझे— छल तो कभी न अपनाऊँगा, कैसे भी तुझको हराऊँगा। कंठ भी शुष्क अब रूंध-सा गया है, तेरा हर एक छल मेरे सत्य को मूंद-सा गया है। आएगा निश्चित वो वक्त भी, जब पुनः मैं सम्भल जाऊँगा। घाव भी भरेंगे, और रण में पुनः नज़र मैं आऊँगा। अब आत्मसम्मान से खिलवाड़ न होगा कभी— साक्षात् साक्ष होंगी दशो दिशाएँ, शशि और रवि। तू माँगना तेरी रहमत उस परमात्म से— न हो सामना तेरा मेरे उस घायल आत्म से।
आएगा निश्चित वो वक्त भी, जब पुनः मैं सम्भल जाऊँगा। घाव भी भरेंगे, और रण में पुनः नज़र मैं आऊँगा।
MrNitinKumarmeena
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Dec 10, 2025
Dec 10, 2025 at 10:55 AM UTC
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