Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
मन गोरा, रंग गोरा चंचलसी अदाए दिवाने बनगँए हम देखकर उन निगाहँे य खुबसुरती तुने पाइ कहाँसे ?——२ समलकर चल्ना जालीम हे हर नजर दवाकर रख्ना अप्नी बढ्ती धढ्कन बन्द कर्दो होठपे लव्ज अप्नी कम न पढे खुबसुरती तुम्हारी ——२ राहोमे तुम्हे भट्का सक्ता हे कोही आवाज देकर बुला सक्ता हे कोही बन्द कर्दो दिलके सारे दरवाजे कम न पढे खुबसुरती तुम्हारी ——२ सकल तुम्हारा उस चाँदनीकी तरह साँस तुम्हारा उस चमेलीकी तरह दिल तुम्हारा  उस मोमकी तरह य खुबसुरती तुने पाइ कहासे ?——२ उम्मीदे मराहँे जिनेका गम पिकर दिप लग्ताहे हस्ता हो मेरे उपर आइनो ने मुझसे बन्द कर्र्र्र्दी बातँे समलकर चल्ना जालीम हे हर नजर ——२ मीलाव जुत्फे अप्नि मतलव निकाल सक्ता हे कोही गिरालो अाँचल अप्नि देख् सख्ता हे कोही बन्द करो होठ अप्नि पुछ सक्ता हे कोही य खुबसुरती तुने पाई कहाँसे ?——३
0
Mar 18, 2019
Mar 18, 2019 at 11:00 AM UTC
य खुबसुरती तुने पाइ कहाँसे ?
मन गोरा, रंग गोरा चंचलसी अदाए दिवाने बनगँए हम देखकर उन निगाहँे य खुबसुरती तुने पाइ कहाँसे ?——२ समलकर चल्ना जालीम हे हर नजर दवाकर रख्ना अप्नी बढ्ती धढ्कन बन्द कर्दो होठपे लव्ज अप्नी कम न पढे खुबसुरती तुम्हारी ——२ राहोमे तुम्हे भट्का सक्ता हे कोही आवाज देकर बुला सक्ता हे कोही बन्द कर्दो दिलके सारे दरवाजे कम न पढे खुबसुरती तुम्हारी ——२ सकल तुम्हारा उस चाँदनीकी तरह साँस तुम्हारा उस चमेलीकी तरह दिल तुम्हारा  उस मोमकी तरह य खुबसुरती तुने पाइ कहासे ?——२ उम्मीदे मराहँे जिनेका गम पिकर दिप लग्ताहे हस्ता हो मेरे उपर आइनो ने मुझसे बन्द कर्र्र्र्दी बातँे समलकर चल्ना जालीम हे हर नजर ——२ मीलाव जुत्फे अप्नि मतलव निकाल सक्ता हे कोही गिरालो अाँचल अप्नि देख् सख्ता हे कोही बन्द करो होठ अप्नि पुछ सक्ता हे कोही य खुबसुरती तुने पाई कहाँसे ?——३
mystic-ink-plus
Written by
Mar 18, 2019
Mar 18, 2019 at 11:00 AM UTC
Request permission to use this poem