जैसे रेगिस्तान में उठती ज़िंदगी के बवंडर को,
कोई चाँदनी रात में झील का किनारा मिला हो।
जैसे दिन के उजालों में गूंजते हर इक शोर को,
ख़ामोशी भरी रात की गुनगुनाहट का स्पर्श मिला हो।
ऐसा लगता है मेरी ज़िंदगी की उथल-पुथल को,
तेरी साँसों की गरमाहट में सिमटकर कोई मखमली सुकून मिला हो।
Nov 13, 2025
Nov 13, 2025 at 11:48 PM UTC
जैसे रेगिस्तान में उठती ज़िंदगी के बवंडर को,
कोई चाँदनी रात में झील का किनारा मिला हो।
जैसे दिन के उजालों में गूंजते हर इक शोर को,
ख़ामोशी भरी रात की गुनगुनाहट का स्पर्श मिला हो।
ऐसा लगता है मेरी ज़िंदगी की उथल-पुथल को,
तेरी साँसों की गरमाहट में सिमटकर कोई मखमली सुकून मिला हो।
# hindi kavita # sukoon