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sandeep-kumar-singh
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Name : Sandeep Kumar Singh. / C/o : Krishna Kumar Singh. / Add : South Haibargaon, Nagaon, Assam. Pin 782002. / E/q : M.A. Hindi. (Tezpur University) / M.No : +91847191060
वह अपने आप को छुपाती है सारी बाते लबो से दबाती है कुछ कहना है तो कह दो दो दिन की जींदगी और बाकी है। मैं तो चाहता हूँ तुम्हें, सब को पता है अपना हाले दिन तू अब तो बता दे कितना अब इंतजार करू मैं अपने लबो के पर्दे को अब तो हटा दे। मैं बैठा रह गया तेरे इंतजार में अब तो खुद को तू मुझसे मिला दे अपना हाले दिल मुझे तू अब तो सुना दे मुझे जीने का अब तो कोई रास्ता दिखा दे। वह अपने आप को छुपाती है पर नजरे उनकी सब बताती है मैं जानता हूँ सब तेरी बाते मुझे भी तो अब अपना बनाले । अभी भी इंतजार है उनका कभी अपना चेहरा तो दिखा दे खुल के तू जरा सा मुस्कुरा दे जज़बातो को अपने लबो से उतार दे। संदीप कुमार सिंह
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Mar 29, 2016
Mar 29, 2016 at 2:29 PM UTC
बेचैन मन 29/03/2016
वह अपने आप को छुपाती है सारी बाते लबो से दबाती है कुछ कहना है तो कह दो दो दिन की जींदगी और बाकी है। मैं तो चाहता हूँ तुम्हें, सब को पता है अपना हाले दिन तू अब तो बता दे कितना अब इंतजार करू मैं अपने लबो के पर्दे को अब तो हटा दे। मैं बैठा रह गया तेरे इंतजार में अब तो खुद को तू मुझसे मिला दे अपना हाले दिल मुझे तू अब तो सुना दे मुझे जीने का अब तो कोई रास्ता दिखा दे। वह अपने आप को छुपाती है पर नजरे उनकी सब बताती है मैं जानता हूँ सब तेरी बाते मुझे भी तो अब अपना बनाले । अभी भी इंतजार है उनका कभी अपना चेहरा तो दिखा दे खुल के तू जरा सा मुस्कुरा दे जज़बातो को अपने लबो से उतार दे। संदीप कुमार सिंह
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For sweet sleep For true dream
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Mar 10, 2016
Mar 10, 2016 at 1:56 PM UTC
Untitled
हमें डर लगता है इसी लिए तो चुप रहते है वरना कलाम तो हमारी भी खूब चलती है। हमे डर लगता है सामाजिक मुद्दो पर लिखने मे अपने विचार रखने में अपने आप से लड़ने में। देख लेते है हम अपनी आंखे बंद करके लोगो को रोते, चिल्लाते साँसे थाम लेते है, कलम बंद कर लेते है । हमें डर लगता है इसी लिए तो आंखे मूँद लेते है वरना इन आंखो से भी चिंगारियाँ खूब निकलती है। कलम रोती है मेरी, कहती है कभी तो मुझे छोड़ दो आजादी से लिखने दो, पर इसे कैसे समझाऊँ हाथ स्व्यम रुक जाती है । हमें डर लगता है इसी लिए तो चुप रहते है वरना कलाम तो हमारी भी खूब चलती है। >>> संदीप कुमार सिंह <<<
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Mar 10, 2016
Mar 10, 2016 at 1:44 PM UTC
हमे डर लगता है
kaisi - kaisi din dikhati hai ye jindagi kabhi hansati hai kabhi rulati hai ye jindagi jise chaha apni anko ke palko pe sajake oh kisi orke sath hai, kya khel hai ye jindagi.??? . sandeep kr singh
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Mar 4, 2016
Mar 4, 2016 at 12:00 PM UTC
zindagi
I saw everything In front of eyes looked deeply involved The two friends looked at fester Love saw two fighting The break saw two flowers . If neither , Make someone saw Do not believe anyone saw Love did not laugh Friends call seen Saw two flowers blooming . Sandeep Kumar Singh
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Feb 26, 2016
Feb 26, 2016 at 5:39 AM UTC
I saw everything
आंखो के सामने उलझते देखा दो दोस्त को बिगड़ते देखा दो प्यार को लड़ते देखा दो फूल को टूटते देखा । न देखा तो, किसी को बनाते न देखा किसी को मानते न देखा प्यार को हँसाते न देखा दोस्त को बुलाते न देखा दो फूल को खिलते न देखा। -संदीप कुमार सिंह
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Feb 26, 2016
Feb 26, 2016 at 5:27 AM UTC
मैंने सब देखा
भुला देना मेरे हृदय से तुम्हारे हर एक यादों को उन फरियादों को, मुलाकातों को उन हर एक नजारो को खुद को, मुझ को, हम सब को। भुला देना तुम हमारी उन पहली मुलाकातों, उन पालो को जो बिताएँ थे साथ-साथ भुला देना तुम उस साथ को, मुलाक़ातों को दो पल को, और हम को। तुम तो जीलोगी किसी और की यादों में यादों में मेरे सताओगी मुझाको तन्हा रुलाओगी हर पल, हर दिन यादों को लेकर तड़पाओगी मुझको। कुछ दिन तो लगेंगे मुझे तुम्हें भूल जाने को तुम्हारी उन यादों को, हर मुलाकातों को मेरे दिल से मिटाने को। तबतक तड़पूंगा जी भर के रोलूंगा s तुम्हें याद करूंगा तुम्हारे लौट आने का खुदा से भी फरियाद करूंगा। पर.... भुला देना तुम अपने दिलो से मेरी तड़प की आवाज सुनने की चाहत को मेरी बेचैनी, तुम्हें पाने की चाहत और मेरी आंखो में आँसू देखने की अपनी तमन्ना को। भुला देना मेरे हृदय से तुम्हारे हर एक यादों को उन फरियादों को, मुलाकातों को उन हर एक नजारो को खुद को, मुझ को, हम सब को। भुला देना तुम, भुला देना। -संदीप कुमार सिंह
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Jan 3, 2016
Jan 3, 2016 at 12:42 PM UTC
भुला देना तुम
भुला देना मेरे हृदय से तुम्हारे हर एक यादों को उन फरियादों को, मुलाकातों को उन हर एक नजारो को खुद को, मुझ को, हम सब को। भुला देना तुम हमारी उन पहली मुलाकातों, उन पालो को जो बिताएँ थे साथ-साथ भुला देना तुम उस साथ को, मुलाक़ातों को दो पल को, और हम को। तुम तो जीलोगी किसी और की यादों में यादों में मेरे सताओगी मुझाको तन्हा रुलाओगी हर पल, हर दिन यादों को लेकर तड़पाओगी मुझको। कुछ दिन तो लगेंगे मुझे तुम्हें भूल जाने को तुम्हारी उन यादों को, हर मुलाकातों को मेरे दिल से मिटाने को। तबतक तड़पूंगा जी भर के रोलूंगा s तुम्हें याद करूंगा तुम्हारे लौट आने का खुदा से भी फरियाद करूंगा। पर.... भुला देना तुम अपने दिलो से मेरी तड़प की आवाज सुनने की चाहत को मेरी बेचैनी, तुम्हें पाने की चाहत और मेरी आंखो में आँसू देखने की अपनी तमन्ना को। भुला देना मेरे हृदय से तुम्हारे हर एक यादों को उन फरियादों को, मुलाकातों को उन हर एक नजारो को खुद को, मुझ को, हम सब को। भुला देना तुम, भुला देना। -संदीप कुमार सिंह
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कोरा कागज लेकर बैठा हूँ कुछ लिखना चाहता हूँ मन की बातो को कहना चाहता हूँ पर शब्द ही नहीं मिलते मेरे आंखो के सामने एक दृष्य बार-बार घूमता है अस्पष्ट रूप में दिखता है उसे पकड़ना चाहता हूँ उसकी व्याख्या करना चाहता हूँ पर शब्द ही नहीं मिलते। इसका कारण ढूँढने जब अपने अंदर जाता हूँ, तो वहाँ मिलता है मुझे शिर्फ और शिर्फ ‘शून्य’ एक ऐसा शून्य, जो अपने अंदर अनेकों शब्दों को बटोर कर रखी हो, पर मेरे लिए वह सब, व्यर्थ है या यह कहूं, कि मैं जो कहना चाहता हूँ जिसके बारे में, मैं सभी को बताना चाहता हूँ उसके लिए ये शब्द भी कम पर जाती है। जिसका चित्र मेरे सामने घूमता है जिसका एक अधूरा रूप मुझे दिखाता है वह है एक औरत का जो अपने गोद में एक छोटी-सी बच्ची लिए हुए है जो ठीक से चल भी नहीं पाती वह औरत, नीले रंग की शारी में है जो मैली और पुरानी है उसका शरीर थोड़ी समता रंग और धूल से भरी हुई है बच्ची भी पुरानी और मैली कपड़ो में है हाथ में एक छोटी सी लकड़ी लिए हुए है मानो एक रक्षक की भांति अपनी माँ की रक्षा करने की जिद्द लिए बैठी हो वह औरत हाथ फैलती है कुछ मिल गाया तो, आगे बढ़ जाती उस बच्ची को निहारती, फिर आगे बढ़कर दया की हाथ फैलती है उसकी इस दशा पे मैं क्या कहूं क्या सोचू, क्या लिखू मेरे सोंचने की क्षमता ही खत्म हो जाती है सायद इसी कारण मुझे कोई शब्द नहीं मिलता, और मैं एक सीमित शून्य में कैद होकर रह जाता हूँ । -संदीप कुमार सिंह
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Dec 25, 2015
Dec 25, 2015 at 12:46 AM UTC
कोरा कागज
कोरा कागज लेकर बैठा हूँ कुछ लिखना चाहता हूँ मन की बातो को कहना चाहता हूँ पर शब्द ही नहीं मिलते मेरे आंखो के सामने एक दृष्य बार-बार घूमता है अस्पष्ट रूप में दिखता है उसे पकड़ना चाहता हूँ उसकी व्याख्या करना चाहता हूँ पर शब्द ही नहीं मिलते। इसका कारण ढूँढने जब अपने अंदर जाता हूँ, तो वहाँ मिलता है मुझे शिर्फ और शिर्फ ‘शून्य’ एक ऐसा शून्य, जो अपने अंदर अनेकों शब्दों को बटोर कर रखी हो, पर मेरे लिए वह सब, व्यर्थ है या यह कहूं, कि मैं जो कहना चाहता हूँ जिसके बारे में, मैं सभी को बताना चाहता हूँ उसके लिए ये शब्द भी कम पर जाती है। जिसका चित्र मेरे सामने घूमता है जिसका एक अधूरा रूप मुझे दिखाता है वह है एक औरत का जो अपने गोद में एक छोटी-सी बच्ची लिए हुए है जो ठीक से चल भी नहीं पाती वह औरत, नीले रंग की शारी में है जो मैली और पुरानी है उसका शरीर थोड़ी समता रंग और धूल से भरी हुई है बच्ची भी पुरानी और मैली कपड़ो में है हाथ में एक छोटी सी लकड़ी लिए हुए है मानो एक रक्षक की भांति अपनी माँ की रक्षा करने की जिद्द लिए बैठी हो वह औरत हाथ फैलती है कुछ मिल गाया तो, आगे बढ़ जाती उस बच्ची को निहारती, फिर आगे बढ़कर दया की हाथ फैलती है उसकी इस दशा पे मैं क्या कहूं क्या सोचू, क्या लिखू मेरे सोंचने की क्षमता ही खत्म हो जाती है सायद इसी कारण मुझे कोई शब्द नहीं मिलता, और मैं एक सीमित शून्य में कैद होकर रह जाता हूँ । -संदीप कुमार सिंह
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जमाने ने दिखाया है हमें हर वक़्त आईना मगर गलती ये हमने की जो इसको देख पाए न हमारी आंखों के आगे से ही सब यूं ही गुजरता गया ये गलती थी हमारी ही जो इसको रोक पाए न। बहुत देखे इन आंखों ने उन्हें इस राह को जाते कभी हँसते, कभी रोते, कभी चलते, कभी गिरते सोचा इस राह से मैं थाम लूँ उनकी कहानी को मगर जो राह है अपनी,हम उन तक जा नहीं सकते। कभी भूखी वह सोती है, कभी रोती ही रहती है वह इतनी सख्त हो गई है कि आँसू भी न गिरती है जमाने ने दिखाया है उन्हें यह राह पत्थर का मगर वह सब समझती है किसी से कुछ न कहती है। हमारा धर्म क्या है यह तो हम सब भूल बैठे हैं अपने ही स्वार्थ के चलते हम इनसे दूर रहते हैं कोई अगर चाहे तो सब कुछ जान सकता है उन्हें इस राह पर गिरने से पहले थाम सकता है। अगर चाहे तो हम उनकी जंजीरे खोल सकते हैं अगर चाहे तो हम उनकी दीवारें तोड़ सकते हैं अगर चाहे तो हम उनकी हकीकत तौल सकते हैं अगर चाहे तो हम उनके ये आँसू पोंछ सकते हैं। मगर यह कौन कहता है कि हम उनको बचाएँगे यह तो हम भी नहीं कहते कि उनके पास जाएँगे जमाने ने सिखाया है हमें बस दूर ही रहना अगर हम पास जाएँगे तो हमें भी छोड़ जाएँगे। तुम्हारी आंखों से गिरते आँसू को मैंने देखा है तुम्हारी गोद में सोते एक जीवन मैंने देखा है तुम्हारे भीतर जलती ममता को भी मैंने देखा है तुम्हारे आँसू के मोती में एक माँ को मैंने देखा है। -संदीप कुमार सिंह
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Dec 10, 2015
Dec 10, 2015 at 1:13 PM UTC
जमाने ने दिखाया है ‘आईना’
जमाने ने दिखाया है हमें हर वक़्त आईना मगर गलती ये हमने की जो इसको देख पाए न हमारी आंखों के आगे से ही सब यूं ही गुजरता गया ये गलती थी हमारी ही जो इसको रोक पाए न। बहुत देखे इन आंखों ने उन्हें इस राह को जाते कभी हँसते, कभी रोते, कभी चलते, कभी गिरते सोचा इस राह से मैं थाम लूँ उनकी कहानी को मगर जो राह है अपनी,हम उन तक जा नहीं सकते। कभी भूखी वह सोती है, कभी रोती ही रहती है वह इतनी सख्त हो गई है कि आँसू भी न गिरती है जमाने ने दिखाया है उन्हें यह राह पत्थर का मगर वह सब समझती है किसी से कुछ न कहती है। हमारा धर्म क्या है यह तो हम सब भूल बैठे हैं अपने ही स्वार्थ के चलते हम इनसे दूर रहते हैं कोई अगर चाहे तो सब कुछ जान सकता है उन्हें इस राह पर गिरने से पहले थाम सकता है। अगर चाहे तो हम उनकी जंजीरे खोल सकते हैं अगर चाहे तो हम उनकी दीवारें तोड़ सकते हैं अगर चाहे तो हम उनकी हकीकत तौल सकते हैं अगर चाहे तो हम उनके ये आँसू पोंछ सकते हैं। मगर यह कौन कहता है कि हम उनको बचाएँगे यह तो हम भी नहीं कहते कि उनके पास जाएँगे जमाने ने सिखाया है हमें बस दूर ही रहना अगर हम पास जाएँगे तो हमें भी छोड़ जाएँगे। तुम्हारी आंखों से गिरते आँसू को मैंने देखा है तुम्हारी गोद में सोते एक जीवन मैंने देखा है तुम्हारे भीतर जलती ममता को भी मैंने देखा है तुम्हारे आँसू के मोती में एक माँ को मैंने देखा है। -संदीप कुमार सिंह
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तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा जिस रास्तो से तुम गुजरोगी वाह पथ मैं छोड़ जाऊंगा जब याद कभी करोगी मुझको तेरी यादों से निकल जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जो हो मुझसे तुम नाराज तेरी यादे छोड़ जाऊंगा तेरे संग बिताए सभी उन लम्हो को भूल जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। चाहोगे तुम अगर तो, मैं अपनी खुशियाँ भूल जाऊंगा गुजारोगी तुम जिस भी गली से वो गलियाँ मैं छोड़ जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जिस कविता से तुम हो नाराज वो कविता छोड़ जाऊंगा तेरे यादों का महल मैं एक पल में तोड़ जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जो मुझसे तुम हो नाराज मैं खुद को भूल जाऊंगा तेरी यादों और वो पल मैं सब को छोड़ जाऊंगा तेरे इंकर करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। मेरे जिस बातो से तुम हो नाराज वो बाते न भूल पाऊँगा वो लम्हे, उन बातो को याद कर मैं जीवन भर पछताऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। -संदीप कुमार सिंह।
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Nov 21, 2015
Nov 21, 2015 at 12:05 PM UTC
मैं रास्ता बदल जाऊंगा
तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा जिस रास्तो से तुम गुजरोगी वाह पथ मैं छोड़ जाऊंगा जब याद कभी करोगी मुझको तेरी यादों से निकल जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जो हो मुझसे तुम नाराज तेरी यादे छोड़ जाऊंगा तेरे संग बिताए सभी उन लम्हो को भूल जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। चाहोगे तुम अगर तो, मैं अपनी खुशियाँ भूल जाऊंगा गुजारोगी तुम जिस भी गली से वो गलियाँ मैं छोड़ जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जिस कविता से तुम हो नाराज वो कविता छोड़ जाऊंगा तेरे यादों का महल मैं एक पल में तोड़ जाऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। जो मुझसे तुम हो नाराज मैं खुद को भूल जाऊंगा तेरी यादों और वो पल मैं सब को छोड़ जाऊंगा तेरे इंकर करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। मेरे जिस बातो से तुम हो नाराज वो बाते न भूल पाऊँगा वो लम्हे, उन बातो को याद कर मैं जीवन भर पछताऊंगा तेरे इंकार करने से पहले मैं रास्ता बदल जाऊंगा। -संदीप कुमार सिंह।
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