कुर्सी का आकर्षण
कितना प्रबल होता है, यह कुर्सी पर काबिज़
मानुष अच्छे से जानता है,
वह इसे अपने पास रखने की खातिर
सच्चे पर लांछन लगाता है,
और जब सच्चा घायल पंछी सा तड़पता है,
वह ज़ोर आजमाइश के साथ साथ
करता है उपहास और अट्टहास!
परन्तु सच्चा कुछ भी नहीं कर पाता है,
वह अपना सा मुँह लेकर रह जाता है।
कुर्सी की चाहत में
इतिहास की किताबें
कत्ल ओ गैरत की अनगिनत कहानियां
कहती हैं ,
बड़ी मुश्किल से
संततियां इस ज़ुल्मो सितम को सहती हैं।
आज इस देश में
हरेक आम और ख़ास आदमी
कुर्सी का सताया है,
जब तक समझते समझते समझ आती है
सत्ता की अंदरूनी बात
तब तक आदर्शों का सफ़ाया
हो जाता है,
आदमी के हिस्से पछतावा आता है।
कुर्सी की चाहत
मनुष्य को दानव बना देती है,
वह अपने आदर्शों और सिद्धांतों को
भूल भालकर समझौता करने को
होता है बाध्य।
कुर्सी को साधना बड़ा कठिन होता है,
जिसे यह मिल जाए ,
वह इस से बंध जाता है।
फिर कुर्सी ही सगी हो जाती है ,
बाकी सब कुछ पराया और अप्रासंगिक हो जाता है।
इसे बनाए रखने की खातिर
आदमी शतरंजी चालें चलने में
होना चाहता माहिर,
इस के लिए स्वतः आदमी
दिन प्रति दिन होता जाता शातिर।
जब अंततः एक दिन
कुर्सी अपनी वफादारी बदलती है,
तब कुर्सी का न होना अखरता है,
यह भीतर तरह तरह के डर भर देती है,
तब जाँच का आतंक भी
मतवातर मन के भीतर दहशत भरता है,
यह अंतिम श्वास तक न केवल नींद हरता है ,
बल्कि यह आदमी को हैरान,परेशान,अवाक करता है।
फिर भी दुनिया भर में कुर्सी की चाहत बढ़ रही है।
वह आदमी को देश, दुनिया और समाज से बेदखल भी करती है।
आदमी आजकल कुर्सीदास हो गया है ,
जिसे मिले कुर्सी ,वह कोहिनूर सा अनमोल नजर आता है।
वहीं मानस आजकल सभी को भाता है।
नहीं जानते कुर्सी के प्रशंसक कि
कुर्सी का क्रूरता से अटूट नाता है।
यह किसी पर दया नहीं करती।
कुर्सी बेशक देखने में कोमल लगे ,
यह निर्णय लेते समय कठोरता की मांग करती है।
१८/०३/२०२५.