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हम लोगों के पास जाते हैं जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम ! और पाते हैं केवल अपनी हस्ती का मिट जाना। लुप्त हो चुकी मिठास, और केवल खारापन
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May 14
May 14, 2026 at 5:20 PM UTC
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हम लोगों के पास जाते हैं जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम ! और पाते हैं केवल अपनी हस्ती का मिट जाना। लुप्त हो चुकी मिठास, और केवल खारापन
himquantum
Written by
35/M/San Francisco
May 14
May 14, 2026 at 5:20 PM UTC
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