ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
ना जाने किन यादों की परछाइयों में,
अपनी और सबकी फ़िज़ा खोजता हूँ।
नज़रों के फेरों में,
और साँसों की उलझन में,
ख़ुदा से रूठे बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
ना जाने कब से ख़ामोश मन,
आज चीख़ने सा करता है।
रोती आँखों से जाने क्यों,
हँसने सा करता है।
हवाओं के बीच, सारे फ़रिश्तों से परे,
शिकायतें करने बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
सोचता हूँ, आज यहाँ ठहर जाऊँ,
आज इधर, कल उधर हो आऊँ।
क्या ढूँढता हूँ से परे,
‘क्यों’ का सवाल भरी है।
फिर भी सबको सिमटाए बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
Oct 28, 2025
Oct 28, 2025 at 11:26 AM UTC
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
ना जाने किन यादों की परछाइयों में,
अपनी और सबकी फ़िज़ा खोजता हूँ।
नज़रों के फेरों में,
और साँसों की उलझन में,
ख़ुदा से रूठे बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
ना जाने कब से ख़ामोश मन,
आज चीख़ने सा करता है।
रोती आँखों से जाने क्यों,
हँसने सा करता है।
हवाओं के बीच, सारे फ़रिश्तों से परे,
शिकायतें करने बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
सोचता हूँ, आज यहाँ ठहर जाऊँ,
आज इधर, कल उधर हो आऊँ।
क्या ढूँढता हूँ से परे,
‘क्यों’ का सवाल भरी है।
फिर भी सबको सिमटाए बैठा हूँ।
ख़ुद को हर जगह,
और उसमें ढूँढता हूँ।
