Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
हार तो मुझे ना थी मंजूर पर हार तो गई थी मैं उस हार की वजह ना थी कुछ और कमी थी मेरे ही इरादों में ।। अपनी गलती को झुटलाना नहीं चाहती और वो गलती दोबारा दोहराना भी नहीं चाहती इसलिए तो दूरी बना रही हूँ मैं उन सबसे ताकि खो ना दूँ मैं वो बची हुई आस ।। समझ में आती है मुझे बस एक ही बात है बची मेरे पास बस एक ही आस अगर खो दिया मैंने वो बची हुई आस तो कभी खुद को जोड़ ना पाऊँगी बस इतनी सी है बात ।। बहुत सुन चुकी हूँ मैं सबकी बात अब बस शांत ही रहना है मुझे किसी को भी ना देना है मुझे कोई भी जवाब खुद को खुद में ही बस जगाना है विश्वास ।।
0
Oct 13, 2018
Oct 13, 2018 at 11:56 AM UTC
बची हुई आस
हार तो मुझे ना थी मंजूर पर हार तो गई थी मैं उस हार की वजह ना थी कुछ और कमी थी मेरे ही इरादों में ।। अपनी गलती को झुटलाना नहीं चाहती और वो गलती दोबारा दोहराना भी नहीं चाहती इसलिए तो दूरी बना रही हूँ मैं उन सबसे ताकि खो ना दूँ मैं वो बची हुई आस ।। समझ में आती है मुझे बस एक ही बात है बची मेरे पास बस एक ही आस अगर खो दिया मैंने वो बची हुई आस तो कभी खुद को जोड़ ना पाऊँगी बस इतनी सी है बात ।। बहुत सुन चुकी हूँ मैं सबकी बात अब बस शांत ही रहना है मुझे किसी को भी ना देना है मुझे कोई भी जवाब खुद को खुद में ही बस जगाना है विश्वास ।।
sefalirani
Written by
20/F/Ranchi
Oct 13, 2018
Oct 13, 2018 at 11:56 AM UTC
Request permission to use this poem