सराबोर था दरिया में ,
पर गुफ्तुगू में सुलगता रहा !
बंद रास्तों के दंगल में,
मैं आरज़ू की खातिर भटकता रहा |
नज़र थी जिस मंज़िल पे,
सफर में उसका सजदा नहीं था |
हुजूम लगा था करीबियों का,
पर करीब कभी कोई अपना नहीं था |
खोकली बोलियों के इस जहां में,
वादों के फेरे में सिमटता रहा |
अँधेरी सुनी गलियों में,
मैं रौशनी की आस में भटकता रहा |
Mar 4, 2018
Mar 4, 2018 at 4:08 PM UTC
सराबोर था दरिया में ,
पर गुफ्तुगू में सुलगता रहा !
बंद रास्तों के दंगल में,
मैं आरज़ू की खातिर भटकता रहा |
नज़र थी जिस मंज़िल पे,
सफर में उसका सजदा नहीं था |
हुजूम लगा था करीबियों का,
पर करीब कभी कोई अपना नहीं था |
खोकली बोलियों के इस जहां में,
वादों के फेरे में सिमटता रहा |
अँधेरी सुनी गलियों में,
मैं रौशनी की आस में भटकता रहा |