Hello Poetry
Submit your work and get some sparkles! Create free account
अब खतों के जल्द जवाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? पता या लोग? अब दरिया में वो सैलाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? बहाव या ग़हराव? अब रातों में वो ख्वाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? लगाव या तनाव? अब खैरियत के तलबदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? झुकाव या चुनाव? चाँद से वो ज्वार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? आफ़ताब या खिंचाव? अब इस घर में किरायेदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? हिसाब या रखरखाब?
0
Jun 1, 2017
Jun 1, 2017 at 8:12 AM UTC
पता नहीं क्या बदल गया है?
अब खतों के जल्द जवाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? पता या लोग? अब दरिया में वो सैलाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? बहाव या ग़हराव? अब रातों में वो ख्वाब नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? लगाव या तनाव? अब खैरियत के तलबदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? झुकाव या चुनाव? चाँद से वो ज्वार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? आफ़ताब या खिंचाव? अब इस घर में किरायेदार नहीं आते, पता नहीं क्या बदल गया है? हिसाब या रखरखाब?
Sorry non-hindi friends.. soon i will translate this in english...
jayantee
Written by
Jun 1, 2017
Jun 1, 2017 at 8:12 AM UTC
Request permission to use this poem