हम लोगों के पास जाते हैं
जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर
यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता
यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम !
और पाते हैं केवल
अपनी हस्ती का मिट जाना।
लुप्त हो चुकी मिठास,
और केवल खारापन
हम लोगों के पास जाते हैं
जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर
यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता
यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम !
और पाते हैं केवल
अपनी हस्ती का मिट जाना।
लुप्त हो चुकी मिठास,
और केवल खारापन