मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
ना अहंकार उसे
ना रंज उसे
ना तर्क करे
ना वो करे तकरार
वो फुसूँ हैं मेरी ज़िंदगी का
और मैं उसका बेशर्त कदारदार
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
उसकी ज़बान पे फ़ुर्सत का ज़ायक़ा
उसकी आँखों में चैन की चमक
उसके लबों पे मेरे दिल की आवाज़
वो पंख है मेरे खवाबों की
मेरे संग घंटो कल्पनाओं की उड़ाने भरा करती है
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
वो हमराह है मेरी
वो हमराज़ भी
वो घाव है
वो वक़्त का मरहम भी
उसकी नज़दीकियों में भी
फ़ासले की सी ख़ुशबू आया करती है
Feb 23, 2019
Feb 23, 2019 at 7:56 PM UTC
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
ना अहंकार उसे
ना रंज उसे
ना तर्क करे
ना वो करे तकरार
वो फुसूँ हैं मेरी ज़िंदगी का
और मैं उसका बेशर्त कदारदार
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
उसकी ज़बान पे फ़ुर्सत का ज़ायक़ा
उसकी आँखों में चैन की चमक
उसके लबों पे मेरे दिल की आवाज़
वो पंख है मेरे खवाबों की
मेरे संग घंटो कल्पनाओं की उड़ाने भरा करती है
मेरी तन्हाई की क्या तारीफ़ लिखूँ
क्या शेर लिखूँ
क्या ग़ज़ल लिखूँ
वो हमराह है मेरी
वो हमराज़ भी
वो घाव है
वो वक़्त का मरहम भी
उसकी नज़दीकियों में भी
फ़ासले की सी ख़ुशबू आया करती है