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ये कमबख्त सन्नाटा कितना शोर करता है, ऊपर से कितनी गूंजती हैं इसकी आवाज़ें। जब से ऊपर वाला कमरा दिया है रेंट पे, बस सारा दिन — छे… छे… एडवांस नहीं लिया होता, तो कब का निकाल देता। अब तो घर की दीवारों के भी रंग एक से होने लगे हैं…
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Jun 14, 2025
Jun 14, 2025 at 2:48 AM UTC
यह कमबख्त सन्नाटा।
ये कमबख्त सन्नाटा कितना शोर करता है, ऊपर से कितनी गूंजती हैं इसकी आवाज़ें। जब से ऊपर वाला कमरा दिया है रेंट पे, बस सारा दिन — छे… छे… एडवांस नहीं लिया होता, तो कब का निकाल देता। अब तो घर की दीवारों के भी रंग एक से होने लगे हैं…
सन्नाटा कभी-कभी सबसे ऊँची आवाज़ करता है। ये कविता उसी शोर की कहानी है — जहां अकेलापन, रोज़मर्रा की थकन, और भीतर की चुप्पी, एक साथ बज उठते हैं।
sehgal95
Written by
19/M/Sonbarsha ghat
Jun 14, 2025
Jun 14, 2025 at 2:48 AM UTC
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