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हाँथो में यहाँ नश्तर है कई, इक आईना है पत्थर है कई। ऐ ख़ुदा ये ग़ज़ब का घर है तिरा, इक माह है फ़क़त अख़्तर है कई। अब जीना यहाँ मुमकिन ही नहीं, इक मैं हूँ सफ-ए-लश्कर है कई। ये जो सीढ़ियों सी है जिंदगी, उतरिये संभल के ठोकर है कई। मेरी ख़बर ही न रही यारों को, कहने को मिरे दिलबर है कई। रंजन उलझन ये किसपर हो यकीं, इक राही यहाँ रहबर है कई। नश्तर--नुकीला खंजर, माह-- चाँद, अख़्तर-- सितारे, रहबर-- मार्गदर्शक सफ-लश्कर-- दुश्मन के फौज़ की लाइने
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Feb 12, 2019
Feb 12, 2019 at 1:13 AM UTC
हाथों में यहां नस्तर हैं कई..
हाँथो में यहाँ नश्तर है कई, इक आईना है पत्थर है कई। ऐ ख़ुदा ये ग़ज़ब का घर है तिरा, इक माह है फ़क़त अख़्तर है कई। अब जीना यहाँ मुमकिन ही नहीं, इक मैं हूँ सफ-ए-लश्कर है कई। ये जो सीढ़ियों सी है जिंदगी, उतरिये संभल के ठोकर है कई। मेरी ख़बर ही न रही यारों को, कहने को मिरे दिलबर है कई। रंजन उलझन ये किसपर हो यकीं, इक राही यहाँ रहबर है कई। नश्तर--नुकीला खंजर, माह-- चाँद, अख़्तर-- सितारे, रहबर-- मार्गदर्शक सफ-लश्कर-- दुश्मन के फौज़ की लाइने
Ghazal
avanish-maurya
Written by
17/M/Delhi
Feb 12, 2019
Feb 12, 2019 at 1:13 AM UTC
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