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#natureofman
आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के, कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के। सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से , बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के? ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा, रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के? दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन, संभले नहीं संभलते हयात आदमी के। दो गज जमीं तक के छोड़े ना अवसर, ख्वाहिशें बहुत हैं दिन रात आदमी के। बना रहा था कुछ भी जो काम कुछ न आते, जब मौत आती मुश्किल हालात आदमी के। खुदा भी इससे हारा इसे चाहिए जग सारा, अजीब सी है फितरत खयालात आदमी के। वक्त बदलने पे वक़्त भी तो बदलता है, पर एक नहीं बदलता ये जात आदमी के। अजय अमिताभ सुमन
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Jan 17, 2021
Jan 17, 2021 at 11:45 PM UTC
जात आदमी के
The verdant pasture poses a risk Ripe and fertile and as yet, useless Is man to be exposed before victory Or claim his war is passing Here is the thief of joy in his greed
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Feb 26
Feb 26, 2026 at 8:05 PM UTC
An Overused Knoll