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#mahabharataduryodhanmythology
------- भीम के हाथों मदकल, अश्वत्थामा मृत पड़ा, धर्मराज ने झूठ कहा, मानव या कि गज मृत पड़ा। ------- और कृष्ण ने उसी वक्त पर , पाञ्चजन्य बजाया था, गुरु द्रोण को धर्मराज ने , ना कोई सत्य बताया था। -------- अर्द्धसत्य भी असत्य से , तब घातक बन जाता है, धर्मराज जैसों की वाणी से , जब छन कर आता है। -------- युद्धिष्ठिर के अर्द्धसत्य को , गुरु द्रोण ने सच माना, प्रेम पुत्र से करते थे कितना , जग ने ये पहचाना। --------- होता ना विश्वास कदाचित , अश्वत्थामा मृत पड़ा, प्राणों से भी जो था प्यारा , यमहाथों अधिकृत पड़ा। --------- मान पुत्र को मृत द्रोण का , नाता जग से छूटा था, अस्त्र शस्त्र त्यागे थे वो ना , जाने सब ये झूठा था। --------- अगर पुत्र इस धरती पे ना , युद्ध जीतकर क्या होगा, जीवन का भी मतलब कैसा , हारजीत का क्या होगा? --------- यम के द्वारे हीं जाकर किंचित , मैं फिर मिल पाऊँगा, शस्त्र त्याग कर बैठे शायद , मर कामिल हो पाऊँगा। ---------- धृष्टदयुम्न के हाथों ने फिर , कैसा वो दुष्कर्म रचा, गुरु द्रोण को वधने में , नयनों में ना कोई शर्म बचा। ---------- शस्त्रहीन ध्यानस्थ द्रोण का , मस्तकमर्दन कर छल से, पूर्ण किया था कर्म असंभव , ना कर पाता जो बल से। ---------- अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 15, 2022
May 15, 2022 at 4:59 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-36
------- भीम के हाथों मदकल, अश्वत्थामा मृत पड़ा, धर्मराज ने झूठ कहा, मानव या कि गज मृत पड़ा। ------- और कृष्ण ने उसी वक्त पर , पाञ्चजन्य बजाया था, गुरु द्रोण को धर्मराज ने , ना कोई सत्य बताया था। -------- अर्द्धसत्य भी असत्य से , तब घातक बन जाता है, धर्मराज जैसों की वाणी से , जब छन कर आता है। -------- युद्धिष्ठिर के अर्द्धसत्य को , गुरु द्रोण ने सच माना, प्रेम पुत्र से करते थे कितना , जग ने ये पहचाना। --------- होता ना विश्वास कदाचित , अश्वत्थामा मृत पड़ा, प्राणों से भी जो था प्यारा , यमहाथों अधिकृत पड़ा। --------- मान पुत्र को मृत द्रोण का , नाता जग से छूटा था, अस्त्र शस्त्र त्यागे थे वो ना , जाने सब ये झूठा था। --------- अगर पुत्र इस धरती पे ना , युद्ध जीतकर क्या होगा, जीवन का भी मतलब कैसा , हारजीत का क्या होगा? --------- यम के द्वारे हीं जाकर किंचित , मैं फिर मिल पाऊँगा, शस्त्र त्याग कर बैठे शायद , मर कामिल हो पाऊँगा। ---------- धृष्टदयुम्न के हाथों ने फिर , कैसा वो दुष्कर्म रचा, गुरु द्रोण को वधने में , नयनों में ना कोई शर्म बचा। ---------- शस्त्रहीन ध्यानस्थ द्रोण का , मस्तकमर्दन कर छल से, पूर्ण किया था कर्म असंभव , ना कर पाता जो बल से। ---------- अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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जिस मानव का सिद्ध मनोरथ मृत्यु क्षण होता संभव, उस मानव का हृदय आप्त ना हो होता ये असंभव। ============ ना जाने किस भाँति आखिर पूण्य रचा इन हाथों ने , कर्ण भीष्म न कर पाए वो कर्म रचा निज हाथों ने। =========== मुझको भी विश्वास ना होता है पर सच बतलाता हूँ, जिसकी चिर प्रतीक्षा थी तुमको वो बात सुनाता हूँ। =========== तुमसे पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता हूँ, अधम शत्रु का निजकर से। =========== सुन मित्र की बातें दुर्योधन के मुख पे मुस्कान फली, मनो वांछित सुनने को हीं किंचित उसमें थी जान बची। =========== कैसी भी थी काया उसकी कैसी भी वो जीर्ण बची , पर मन के अंतर तम में तो अभिलाषा कुछ क्षीण बची। ========== क्या कर सकता अश्वत्थामा कुरु कुंवर को ज्ञात रहा, कैसे कैसे अस्त्र शस्त्र अश्वत्थामा को प्राप्त रहा। ========= उभर चले थे मानस पट पे दृश्य कैसे ना मन माने , गुरु द्रोण के वधने में क्या धर्म हुआ था सब जाने। ========= लाख बुरा था दुर्योधन पर सच पे ना अभिमान रहा , धर्मराज सा सच पे सच में ना इतना सम्मान रहा। ========= जो छलता था दुर्योधन पर ताल थोक कर हँस हँस के, छला गया छलिया के जाले में उस दिन फँस फँस के। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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May 1, 2022
May 1, 2022 at 12:54 AM UTC
दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-35
जिस मानव का सिद्ध मनोरथ मृत्यु क्षण होता संभव, उस मानव का हृदय आप्त ना हो होता ये असंभव। ============ ना जाने किस भाँति आखिर पूण्य रचा इन हाथों ने , कर्ण भीष्म न कर पाए वो कर्म रचा निज हाथों ने। =========== मुझको भी विश्वास ना होता है पर सच बतलाता हूँ, जिसकी चिर प्रतीक्षा थी तुमको वो बात सुनाता हूँ। =========== तुमसे पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता हूँ, अधम शत्रु का निजकर से। =========== सुन मित्र की बातें दुर्योधन के मुख पे मुस्कान फली, मनो वांछित सुनने को हीं किंचित उसमें थी जान बची। =========== कैसी भी थी काया उसकी कैसी भी वो जीर्ण बची , पर मन के अंतर तम में तो अभिलाषा कुछ क्षीण बची। ========== क्या कर सकता अश्वत्थामा कुरु कुंवर को ज्ञात रहा, कैसे कैसे अस्त्र शस्त्र अश्वत्थामा को प्राप्त रहा। ========= उभर चले थे मानस पट पे दृश्य कैसे ना मन माने , गुरु द्रोण के वधने में क्या धर्म हुआ था सब जाने। ========= लाख बुरा था दुर्योधन पर सच पे ना अभिमान रहा , धर्मराज सा सच पे सच में ना इतना सम्मान रहा। ========= जो छलता था दुर्योधन पर ताल थोक कर हँस हँस के, छला गया छलिया के जाले में उस दिन फँस फँस के। ========= अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार सुरक्षित
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