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#lifehacks
पत्थर तो तुम थे, हम तो पानी जैसे निश्चल है जब आ ही गिरे, तो फर्क बस इतना ही पड़ा था— पहले तो कुछ हलचल हुई, पर पानी तो ऊपर ही आता गया। तुम सिर्फ गिरते रहे, पर तुम्हारे जैसा हर कोई डूबता गया। वो वक्त और हालात जो पकड़ में मेरे शायद नहीं थे, पर उस वक्त का बदलना भी कब मुझसे दूर था... कल की क्या देखता है तू, देखना है तो आज देख— अब देख मेरे समय का लेख। दीमक जैसी फितरत जो तुम्हारी, बड़ी खोखली जो खामी है। की थी कशिश जो तुमने मिटाने की, फिर भी देख तू आज मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ। मैं हार नहीं मानता, हमेशा ही बड़ी शिद्दत से लड़ा हूँ। किरदार पर मेरे तुम्हारे हाथों की झपट, तुम्हारे मन में सिर्फ बही छल-कपट। फिर भी आज मैं पहले से कई अधिक आगे बढ़ चुका हूँ, अब मैं अपने भविष्य को भी गढ़ चुका हूँ। छल, द्वंद्व, द्वेष, कपट, प्रेम, बदनामी, मित्रता, शत्रुता— सब को पढ़ चुका हूँ। कहीं छल से मेरा सामना था, मैं खुद थमा, जहाँ मुझे तुमको थामना था। झुका मैं भी वहाँ, जहाँ सिर्फ तुम्हें झुकना था। पर अब मैं कभी नहीं थकूँगा, अब सिर्फ तुमको थकना है। मैं जो मेरे जीवन में जी रहा हूँ, वो तो सिर्फ तुम्हारा सपना है। — By Mr नितिन कुमार मीना मोहचा
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Dec 28, 2025
Dec 28, 2025 at 12:54 AM UTC
निश्चल की विजय
पत्थर तो तुम थे, हम तो पानी जैसे निश्चल है जब आ ही गिरे, तो फर्क बस इतना ही पड़ा था— पहले तो कुछ हलचल हुई, पर पानी तो ऊपर ही आता गया। तुम सिर्फ गिरते रहे, पर तुम्हारे जैसा हर कोई डूबता गया। वो वक्त और हालात जो पकड़ में मेरे शायद नहीं थे, पर उस वक्त का बदलना भी कब मुझसे दूर था... कल की क्या देखता है तू, देखना है तो आज देख— अब देख मेरे समय का लेख। दीमक जैसी फितरत जो तुम्हारी, बड़ी खोखली जो खामी है। की थी कशिश जो तुमने मिटाने की, फिर भी देख तू आज मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ। मैं हार नहीं मानता, हमेशा ही बड़ी शिद्दत से लड़ा हूँ। किरदार पर मेरे तुम्हारे हाथों की झपट, तुम्हारे मन में सिर्फ बही छल-कपट। फिर भी आज मैं पहले से कई अधिक आगे बढ़ चुका हूँ, अब मैं अपने भविष्य को भी गढ़ चुका हूँ। छल, द्वंद्व, द्वेष, कपट, प्रेम, बदनामी, मित्रता, शत्रुता— सब को पढ़ चुका हूँ। कहीं छल से मेरा सामना था, मैं खुद थमा, जहाँ मुझे तुमको थामना था। झुका मैं भी वहाँ, जहाँ सिर्फ तुम्हें झुकना था। पर अब मैं कभी नहीं थकूँगा, अब सिर्फ तुमको थकना है। मैं जो मेरे जीवन में जी रहा हूँ, वो तो सिर्फ तुम्हारा सपना है। — By Mr नितिन कुमार मीना मोहचा
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अस्त से उदय की ओर निकल आया हूँ कुछ यूँ, अब लगता है किस्मत में कुछ तो खास लाया हूँ। जीने की राह अब सामने स्पष्ट नज़र आती है, वैसे तो सब कुछ पास है मेरे— पर हर किसी की बग़ावत याद आ जाती है। फिर संशय और मायूसी छा जाती है, अब समझ गया हूँ अपने लिए रचित हर अध्याय को। कुछ तकलीफ़ों, कुछ रंजिशों के बाद मिले उस सच्चे प्रेम को— जो जीने-मरने तक आज भी साथ मौजूद है। वैसे तो मैं हूँ ही क्या, और क्या है मेरा वजूद, पर विश्वास ने फिर हृदय में स्थान लिया है। आत्मा ने भी कोई रहस्यमयी निर्णय लिया है, मन भी कहता है— कि तू अभी कहाँ जिया है? अब पलटकर उन पन्नों को मैंने अध्याय-समाप्त कर दिया, जो मंज़ूर था मन को, हृदय ने उसे स्वीकार कर लिया। अब स्वरचित एक अध्याय खुद के लिए गढ़ रहा हूँ, पूर्व अध्यायों में शेष हर त्रुटि का मूल्यांकन कर, उन्हें पढ़ रहा हूँ। बहुत लड़ लिया दूसरों के लिए अब तक, अब अपने स्वहितों के लिए लड़ रहा हूँ। चढ़ना ही नहीं था कभी जिन शिखरों पर, आज उन्हीं शिखरों पर चढ़ रहा हूँ। अब न किसी की सलाह, न कोई मशवरा मंज़ूर है मुझे, अब हर कार्य स्वविवेक से पूर्ण होगा। प्रारंभ भी मैं स्वयं निश्चित करूँगा, और जब चाहूँगा— तभी संपूर्ण होगा। अब दूर हूँ उन मिथ्या कल्पनाओं से, उन राहों से— जो मंज़िल से भटका दिया करती थीं। — नितिन कुमार मीना ‘मोहचा’
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Dec 16, 2025
Dec 16, 2025 at 9:06 AM UTC
स्वरचित अध्याय
अस्त से उदय की ओर निकल आया हूँ कुछ यूँ, अब लगता है किस्मत में कुछ तो खास लाया हूँ। जीने की राह अब सामने स्पष्ट नज़र आती है, वैसे तो सब कुछ पास है मेरे— पर हर किसी की बग़ावत याद आ जाती है। फिर संशय और मायूसी छा जाती है, अब समझ गया हूँ अपने लिए रचित हर अध्याय को। कुछ तकलीफ़ों, कुछ रंजिशों के बाद मिले उस सच्चे प्रेम को— जो जीने-मरने तक आज भी साथ मौजूद है। वैसे तो मैं हूँ ही क्या, और क्या है मेरा वजूद, पर विश्वास ने फिर हृदय में स्थान लिया है। आत्मा ने भी कोई रहस्यमयी निर्णय लिया है, मन भी कहता है— कि तू अभी कहाँ जिया है? अब पलटकर उन पन्नों को मैंने अध्याय-समाप्त कर दिया, जो मंज़ूर था मन को, हृदय ने उसे स्वीकार कर लिया। अब स्वरचित एक अध्याय खुद के लिए गढ़ रहा हूँ, पूर्व अध्यायों में शेष हर त्रुटि का मूल्यांकन कर, उन्हें पढ़ रहा हूँ। बहुत लड़ लिया दूसरों के लिए अब तक, अब अपने स्वहितों के लिए लड़ रहा हूँ। चढ़ना ही नहीं था कभी जिन शिखरों पर, आज उन्हीं शिखरों पर चढ़ रहा हूँ। अब न किसी की सलाह, न कोई मशवरा मंज़ूर है मुझे, अब हर कार्य स्वविवेक से पूर्ण होगा। प्रारंभ भी मैं स्वयं निश्चित करूँगा, और जब चाहूँगा— तभी संपूर्ण होगा। अब दूर हूँ उन मिथ्या कल्पनाओं से, उन राहों से— जो मंज़िल से भटका दिया करती थीं। — नितिन कुमार मीना ‘मोहचा’
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हर बार घेरा गया, कभी छल से, कभी प्रेम की छाया से, पर निकल आया सदैव ही उस अभिमन्यु की भाँति, इस छल के रण से, अपनी उस आंतरिक माया से।। कई वाक्या फरमाए गए, वो लम्हे जो मुझे मंजूर नहीं। होना तो था घटित उनको, पर यूँ एक साथ उनका हो जाना, और करने वाले का नजरिया मुझे भाया नहीं।। थका तो मैं किंचित भी नहीं, पर कुछ अटकलें जिनसे मेरे मन को कचोटना—मुझे रास आया नहीं। त्वरित वेग से दूँ जवाब हर एक बात का, पर ये मूल के साथ ब्याज कभी चाहा नहीं।। अनदेखा तो नहीं किया, लेकिन फिर कुछ— इससे ज्यादा मैंने देखना चाहा नहीं। मुझे पूर्ण विश्वास उस ऊपर वाले पर, जिसने सदैव मुझे इन लोगों से बचाया।। इस संघर्ष की धूमिल पगडंडी पर चलता आया अकेला ही, इसलिए चलना किसी के साथ मुझे आया नहीं। सत्य को सत्य कहा यूँ हर किसी की तरह, सत्य को कभी झुठलाना मुझे आया नहीं। हक के लिए जुबान भी न खोले कोई, फिर क्या मूक रहना हमें आया नहीं।। हर शक्श याद मुझे— बस दिखाया नहीं। कभी वक्त को दी जाएगी गवाही इनकी, तभी तो अबतलक इनको भुलाया नहीं।। मैं भी वाक़िफ उस वक्त से, जो सब प्रत्यक्ष लाया करता है, इसलिए ही तो ये खोना-पाना मैंने जताया नहीं। ये किन्तु-परन्तु तो कभी जीवन में लाया नहीं।। हर फैसला लिया त्वरित, जो सिर्फ मेरा— कोई पराया नहीं। फिर कभी आज़माने की कोशिश भी न करना, जो भी किया वो कभी फिर दोहराया नहीं।।
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Nov 26, 2025
Nov 26, 2025 at 11:36 PM UTC
“छल के रण से”
हर बार घेरा गया, कभी छल से, कभी प्रेम की छाया से, पर निकल आया सदैव ही उस अभिमन्यु की भाँति, इस छल के रण से, अपनी उस आंतरिक माया से।। कई वाक्या फरमाए गए, वो लम्हे जो मुझे मंजूर नहीं। होना तो था घटित उनको, पर यूँ एक साथ उनका हो जाना, और करने वाले का नजरिया मुझे भाया नहीं।। थका तो मैं किंचित भी नहीं, पर कुछ अटकलें जिनसे मेरे मन को कचोटना—मुझे रास आया नहीं। त्वरित वेग से दूँ जवाब हर एक बात का, पर ये मूल के साथ ब्याज कभी चाहा नहीं।। अनदेखा तो नहीं किया, लेकिन फिर कुछ— इससे ज्यादा मैंने देखना चाहा नहीं। मुझे पूर्ण विश्वास उस ऊपर वाले पर, जिसने सदैव मुझे इन लोगों से बचाया।। इस संघर्ष की धूमिल पगडंडी पर चलता आया अकेला ही, इसलिए चलना किसी के साथ मुझे आया नहीं। सत्य को सत्य कहा यूँ हर किसी की तरह, सत्य को कभी झुठलाना मुझे आया नहीं। हक के लिए जुबान भी न खोले कोई, फिर क्या मूक रहना हमें आया नहीं।। हर शक्श याद मुझे— बस दिखाया नहीं। कभी वक्त को दी जाएगी गवाही इनकी, तभी तो अबतलक इनको भुलाया नहीं।। मैं भी वाक़िफ उस वक्त से, जो सब प्रत्यक्ष लाया करता है, इसलिए ही तो ये खोना-पाना मैंने जताया नहीं। ये किन्तु-परन्तु तो कभी जीवन में लाया नहीं।। हर फैसला लिया त्वरित, जो सिर्फ मेरा— कोई पराया नहीं। फिर कभी आज़माने की कोशिश भी न करना, जो भी किया वो कभी फिर दोहराया नहीं।।
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When did your life begin? Without a single mindset, No. Just for a while, remember, when was the last time you said “No”. That instant you will realize how the vibration of “No” moves you. Say “No” to all those things that have nothing to do with you. For the ears that are obsessed to hear Yes, let it know it’s time to get adjusted. Say “No” to “No”. Say “No” to break the web as for the references; When Yes is sublime, No is strength. When Yes is slavery, No is freedom. When Yes is being naive, No is growth. When Yes is a dilemma, No is the answer. Say “No” to dark clouds, black rain and stagnant silence. Say “No” if it saves your time and the energy, while Yes leads towards the ditch. No is a new beginning, where Yes is the end. Excuse me, but this is not the end. Remember for what you read this, and the very next time think twice seeking a better reason to say “No”. Be vocal. Say “No” to adore the essence within. Say “No” to “No”, even when nobody understands, and live for what is right. This is a mantra of touching lives, from where your life begins. And, this is socialization, the trails of the examined life. For your first dare, “No” may not be a comfort zone but it will change the life forever. Believe me. And here, I shall not be in between. Let me be nobody at this time as well. Sincerely yours, The Anonymous Traveller
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Oct 31, 2019
Oct 31, 2019 at 10:42 AM UTC
Life Notes