#duryodhan
क्या यत्न करता उस क्षण जब युक्ति समझ नहीं आती थी,
त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा मुक्ति का मार्ग दिखाती थी।
अकिलेश्वर को हरना दुश्कर कार्य जटिल ना साध्य कहीं,
जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था मार्ग अति दू:साध्य कहीं।
अतिशय साहस संबल संचय करके भीषण लक्ष्य किया,
प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निजमस्तक हव भक्ष्य किया।
अति वेदना थी तन में निज मस्तक अग्नि धरने में ,
पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में?
जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे,
उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे?
या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था,
या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था?
हठ मेरा वो सही गलत क्या इसका मुझको ज्ञान नहीं,
कपर्दिन को जिद मेरी थी कैसी पर था भान कहीं।
हवन कुंड में जलने की पीड़ा सह कर वर प्राप्त किया,
मंजिल से बाधा हट जाने का सुअवसर प्राप्त किया।
त्रिपुरान्तक के हट जाने से लक्ष्य प्रबल आसान हुआ,
भीषण बाधा परिलक्षित थी निश्चय हीं अवसान हुआ।
गणादिप का संबल पा था यही समय कुछ करने का,
या पांडवजन को मृत्यु देने या उनसे लड़ मरने का।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
Feb 1, 2022
Feb 1, 2022 at 2:36 AM UTC
क्या यत्न करता उस क्षण
जब युक्ति समझ नहीं आती थी,
त्रिकाग्निकाल से निज प्रज्ञा
मुक्ति का मार्ग दिखाती थी।
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अकिलेश्वर को हरना दुश्कर
कार्य जटिल ना साध्य कहीं,
जटिल राह थी कठिन लक्ष्य था
मार्ग अति दू:साध्य कहीं।
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अतिशय साहस संबल संचय
करके भीषण लक्ष्य किया,
प्रण धरकर ये निश्चय लेकर
निजमस्तक हव भक्ष्य किया।
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अति वेदना थी तन में
निज मस्तक अग्नि धरने में ,
पर निज प्रण अपूर्णित करके
भी क्या रखा लड़ने में?
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जो उद्भट निज प्रण का किंचित
ना जीवन में मान रखे,
उस योद्धा का जीवन रण में
कोई क्या सम्मान रखे?
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या अहन्त्य को हरना था या
शिव के हाथों मरना था,
या शिशार्पण यज्ञअग्नि को
मृत्यु आलिंगन करना था?
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हठ मेरा वो सही गलत क्या
इसका मुझको ज्ञान नहीं,
कपर्दिन को जिद मेरी थी
कैसी पर था भान कहीं।
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हवन कुंड में जलने की पीड़ा
सह कर वर प्राप्त किया,
मंजिल से बाधा हट जाने
का सुअवसर प्राप्त किया।
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त्रिपुरान्तक के हट जाने से
लक्ष्य प्रबल आसान हुआ,
भीषण बाधा परिलक्षित थी
निश्चय हीं अवसान हुआ।
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गणादिप का संबल पा था
यही समय कुछ करने का,
या पांडवजन को मृत्यु देने
या उनसे लड़ मरने का।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
Jan 16, 2022
Jan 16, 2022 at 4:26 AM UTC
था ज्ञात कृष्ण को समक्ष महिषी कोई बीन बजाता है,
विषधर को गरल त्याग का जब कोई पाठ पढ़ाता है।
तब जड़ बुद्धि मूढ़ महिषी कैसा कृत्य रचाती है,
पगुराना सैरिभी को प्रियकर वैसा दृश्य दिखाती है।
विषधर का मद कालकूट में विष परिहार करेगा क्या?
अभिमानी का मान दर्प में निज का दम्भ तजेगा क्या?
भीषण रण जब होने को था अंतिम एक प्रयास किया,
सदबुद्धि जड़मति को आये शायद पर विश्वास किया।
उस क्षण जो भी नीतितुल्य था गिरिधर ने वो काम किया,
निज बाहों से जो था सम्भव वो सबकुछ इन्तेजाम किया।
ये बात सत्य है अटल तथ्य दुष्काम फलित जब होता है,
नर का ना उसपे जोर चले दुर्भाग्य त्वरित तब होता है।
पर अकाल से कब डर कर हलधर निज धर्म भुला देता,
शुष्क पाषाण बंजर मिट्टी में श्रम कर शस्य खिला देता।
कृष्ण संधि की बात लिए जा पहुंचे थे हस्तिनापुर,
शांति फलित करने को तत्पर प्रेम प्यार के वो आतुर।
पर मृदु प्रेम की बातों को दुर्योधन समझा कमजोरी,
वो अभिमानी समझ लिया कोई तो होगी मज़बूरी।
वन के नियमों का आदि वो शांति धर्म को जाने कैसे?
जो पशुवत जीवन जीता वो प्रेम मर्म पहचाने कैसे?
दुर्योधन सामर्थ्य प्रबल प्राबल्य शक्ति का व्यापारी,
उसकी नजरों में शक्तिपुंज ही मात्र राज्य का अधिकारी।
दुर्योधन की दुर्बुद्धि ने कभी ऐसा भी अभिमान किया,
साक्षात नारायण हर लेगा सोचा ऐसा दुष्काम किया।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
Apr 26, 2021
Apr 26, 2021 at 1:08 AM UTC
रक्त से लथपथ शैल गात व शोणित सिंचित काया,
कुरुक्षेत्र की धरती पर लेटा एक नर मुरझाया।
तन पे चोट लगी थी उसकी जंघा टूट पड़ी थी त्यूं ,
जैसे मृदु माटी की मटकी हो कोई फूट पड़ी थी ज्यूं।
भाग्य सबल जब मानव का कैसे करतब दिखलाता है ,
किचित जब दुर्भाग्य प्रबल तब क्या नर को हो जाता है।
कौन जानता था जिसकी आज्ञा से शस्त्र उठाते थे ,
जब वो चाहे भीष्म द्रोण तरकस से वाण चलाते थे ।
सकल क्षेत्र ये भारत का जिसकी क़दमों में रहता था ,
भानुमति का मात्र सहारा सौ भ्राता संग फलता था ।
जरासंध सहचर जिसका औ कर्ण मित्र हितकारी था ,
शकुनि मामा कूटनीति का चतुर चपल खिलाड़ी था।
जो अंधे पिता धृतराष्ट्र का किंचित एक सहारा था,
माता के उर में बसता नयनों का एक सितारा था।
इधर उधर हो जाता था जिसके कहने पर सिंहासन ,
जिसकी आज्ञा से लड़ने को आतुर रहता था दु:शासन।
गज जब भी चलता है वन में शक्ति अक्षय लेकर के तन में,
तब जो पौधे पड़ते पग में धूल धूसरित होते क्षण में।
अहंकार की चर्बी जब आंखों पे फलित हो जाती है,
तब विवेक मर जाता है औ बुद्धि गलित हो जाती है।
क्या धर्म है क्या न्याय है सही गलत का ज्ञान नहीं,
जो चाहे वो करता था क्या नीतियुक्त था भान नहीं।
ताकत के मद में पागल था वो दुर्योधन मतवाला,
ज्ञात नहीं था दुर्योधन को वो पीता विष का प्याला।
अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित
Apr 18, 2021
Apr 18, 2021 at 6:37 AM UTC