#dontregret
अस्त से उदय की ओर निकल आया हूँ कुछ यूँ,
अब लगता है किस्मत में कुछ तो खास लाया हूँ।
जीने की राह अब सामने स्पष्ट नज़र आती है,
वैसे तो सब कुछ पास है मेरे—
पर हर किसी की बग़ावत याद आ जाती है।
फिर संशय और मायूसी छा जाती है,
अब समझ गया हूँ अपने लिए रचित हर अध्याय को।
कुछ तकलीफ़ों, कुछ रंजिशों के बाद
मिले उस सच्चे प्रेम को—
जो जीने-मरने तक आज भी साथ मौजूद है।
वैसे तो मैं हूँ ही क्या, और क्या है मेरा वजूद,
पर विश्वास ने फिर हृदय में स्थान लिया है।
आत्मा ने भी कोई रहस्यमयी निर्णय लिया है,
मन भी कहता है—
कि तू अभी कहाँ जिया है?
अब पलटकर उन पन्नों को
मैंने अध्याय-समाप्त कर दिया,
जो मंज़ूर था मन को,
हृदय ने उसे स्वीकार कर लिया।
अब स्वरचित एक अध्याय
खुद के लिए गढ़ रहा हूँ,
पूर्व अध्यायों में शेष हर त्रुटि का
मूल्यांकन कर, उन्हें पढ़ रहा हूँ।
बहुत लड़ लिया दूसरों के लिए अब तक,
अब अपने स्वहितों के लिए लड़ रहा हूँ।
चढ़ना ही नहीं था कभी जिन शिखरों पर,
आज उन्हीं शिखरों पर चढ़ रहा हूँ।
अब न किसी की सलाह,
न कोई मशवरा मंज़ूर है मुझे,
अब हर कार्य स्वविवेक से पूर्ण होगा।
प्रारंभ भी मैं स्वयं निश्चित करूँगा,
और जब चाहूँगा— तभी संपूर्ण होगा।
अब दूर हूँ उन मिथ्या कल्पनाओं से,
उन राहों से—
जो मंज़िल से भटका दिया करती थीं।
— नितिन कुमार मीना ‘मोहचा’
Dec 16, 2025
Dec 16, 2025 at 9:06 AM UTC