हम सर्दी में एक-दूसरे से सट जाते हैं,
शरीर काँटों से भरे,
फिर भी ज़रूरी,
परोपकार का चादर ओढ़े
यह नज़दीकी एक माफ़ी जैसी होती है
जो देह अपनी आत्मा से माँगती है।
यही पहला पाठ है जो सर्दी सिखाती है,
कि तड़प और तृप्ति
एक ही जड़ से उगते हैं,
कि फैला हुआ हाथ
और सिकुड़ा हुआ हाथ
एक ही हाथ है।
हमारे लगभग सारे दुख
किसी अपने के होते हैं।
कोई नाम, जिसे कभी
धीरे से पुकारा था कमरे के उस पार।
कोई हँसी, जो बाद में खामोश हो गई।
कोई दरवाज़ा, जिसने सीख लिया
बिना पूछे बंद होना।
हम लोगों के पास जाते हैं
जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर
यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता
यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम !
और पाते हैं केवल
अपनी हस्ती मिट जाना।
लुप्त हो चुकी मिठास,
और केवल खारापन
एक आदमी है
जो अकेला बैठता है
और अकेला नहीं होता।
वह एकांत को
अनुपस्थिति नहीं समझता।
वह जानता है कि कमरा भरा हुआ है,
उसके अपने अधूरे बहस से,
उन विचरते विचारों से
जो पिछले मंगलवार
ही आ गए थे, लेकिन
अब भी उछल रहें हैं
इधर उधर !
उसने खुद को
टुकड़ों में बाँटना बंद कर दिया है
दूसरों के शोर में
बोलना बंद कर दिया !
वह उदासीन नहीं है।
उसने बस यह जान लिया है
कि जिसकी उसे ज़रूरत थी
वह हमेशा से रहती थी
उसके कंधों के ऊपर !
अधिकांश लोग अपनी संगति से भागते हैं
जैसे अपराधी आईनों से भागते हैं।
वे हवा को बातों से भर देते हैं !
परन्तु कोई गुनगुनाता है
श्मशान के पास से गुज़रते हुए,
खुशी से नहीं,
बल्कि इसलिए कि चुप्पी
बहुत सच्चा सवाल पूछती है।
खज़ाना यह है कि
लंबे दिन के अंत में
खुद के साथ बैठना
और न सिहरना।
अपने मन को
अच्छी संगत देना
अजीब, असहज, अनभिज्ञ,
लेकिन अपना !!
वह एकमात्र चीज़
जो कोई नज़दीकी दे नहीं सकती
और कोई वियोग छीन नहीं सकता!
हम में से सबसे बुद्धिमान लोग
जानते थे बुद्धिमान होने से पहले:
कि एकाकी रेगिस्तान नहीं है।
रेगिस्तान तो वह भीड़ है
जिसमें तुमने खुद को खो दिया
खोजे जाने की कोशिश में
May 14
May 14, 2026 at 5:20 PM UTC
हम सर्दी में एक-दूसरे से सट जाते हैं,
शरीर काँटों से भरे,
फिर भी ज़रूरी,
परोपकार का चादर ओढ़े
यह नज़दीकी एक माफ़ी जैसी होती है
जो देह अपनी आत्मा से माँगती है।
यही पहला पाठ है जो सर्दी सिखाती है,
कि तड़प और तृप्ति
एक ही जड़ से उगते हैं,
कि फैला हुआ हाथ
और सिकुड़ा हुआ हाथ
एक ही हाथ है।
हमारे लगभग सारे दुख
किसी अपने के होते हैं।
कोई नाम, जिसे कभी
धीरे से पुकारा था कमरे के उस पार।
कोई हँसी, जो बाद में खामोश हो गई।
कोई दरवाज़ा, जिसने सीख लिया
बिना पूछे बंद होना।
हम लोगों के पास जाते हैं
जैसे नदियाँ जाती हैं समुद्र की ओर
यह सोचकर कि मिलेगी व्यापकता
यह सोचकर कि मिलेगा विश्राम !
और पाते हैं केवल
अपनी हस्ती मिट जाना।
लुप्त हो चुकी मिठास,
और केवल खारापन
एक आदमी है
जो अकेला बैठता है
और अकेला नहीं होता।
वह एकांत को
अनुपस्थिति नहीं समझता।
वह जानता है कि कमरा भरा हुआ है,
उसके अपने अधूरे बहस से,
उन विचरते विचारों से
जो पिछले मंगलवार
ही आ गए थे, लेकिन
अब भी उछल रहें हैं
इधर उधर !
उसने खुद को
टुकड़ों में बाँटना बंद कर दिया है
दूसरों के शोर में
बोलना बंद कर दिया !
वह उदासीन नहीं है।
उसने बस यह जान लिया है
कि जिसकी उसे ज़रूरत थी
वह हमेशा से रहती थी
उसके कंधों के ऊपर !
अधिकांश लोग अपनी संगति से भागते हैं
जैसे अपराधी आईनों से भागते हैं।
वे हवा को बातों से भर देते हैं !
परन्तु कोई गुनगुनाता है
श्मशान के पास से गुज़रते हुए,
खुशी से नहीं,
बल्कि इसलिए कि चुप्पी
बहुत सच्चा सवाल पूछती है।
खज़ाना यह है कि
लंबे दिन के अंत में
खुद के साथ बैठना
और न सिहरना।
अपने मन को
अच्छी संगत देना
अजीब, असहज, अनभिज्ञ,
लेकिन अपना !!
वह एकमात्र चीज़
जो कोई नज़दीकी दे नहीं सकती
और कोई वियोग छीन नहीं सकता!
हम में से सबसे बुद्धिमान लोग
जानते थे बुद्धिमान होने से पहले:
कि एकाकी रेगिस्तान नहीं है।
रेगिस्तान तो वह भीड़ है
जिसमें तुमने खुद को खो दिया
खोजे जाने की कोशिश में
