जब व्यथा की कथा ना कही जा सके,
जब छलकते ये आँशु बहे जा रहे,
कोई तो बताये ये है राज क्या ?
या शायद वक्त नहीं साथ क्या ?
विचारो के ये पंख उड़े जा रहे,
अब सम्हालना आशां नहीं क्या ?
क्यूँ सीमाएं अब नजर नहीं आ रही ,
खुदा तो नहीं मानव्क्रित्य है क्या ?
कोई ना मइला जो दे साथ मेरा,
ज़माने को लगा इतना बुरा क्या ?
Jan 28, 2015
Jan 28, 2015 at 12:46 PM UTC
जब व्यथा की कथा ना कही जा सके,
जब छलकते ये आँशु बहे जा रहे,
कोई तो बताये ये है राज क्या ?
या शायद वक्त नहीं साथ क्या ?
विचारो के ये पंख उड़े जा रहे,
अब सम्हालना आशां नहीं क्या ?
क्यूँ सीमाएं अब नजर नहीं आ रही ,
खुदा तो नहीं मानव्क्रित्य है क्या ?
कोई ना मइला जो दे साथ मेरा,
ज़माने को लगा इतना बुरा क्या ?
