चर्चे हों कुरबानी के दुश्मन ललकारे घर में घुसकर
तो प्रेम दिवस की बातें करना कहानी सा लगता है
जब तिरंगे में लिपटकर वापिस आते वीर चवालिस
तब चॉकलेट और तोहफ़े लेना मनमानी सा लगता है
जब शहीदों की चिंताओं पे सौ सौ फूल बरसते हैं
तब ग़ुलाब की आस लगाना बेमानी सा लगता है
बारूदों की आग लगी जब झुलसे देश धमाकों से
मोमबत्तियों में दावत खाना क्या रूमानी सा लगता है
जब माँओं की गोद उजड़ती लावारिस हों नन्हे मुन्ने
मेहबूब की बाहों में छुप जाना नाफ़रमानी सा लगता है
जब हो जाये सीमाओं पे कितने निर्दोषों की कुर्बानी
तब बेमतलब के जलसों में भी वीरानी सा लगता है
चीत्कार हो वीरों का जब करना हो कुछ काम तूफ़ानी
तब चैन से सोना भी वतन से बेईमानी सा लगता है
Feb 15, 2019
Feb 15, 2019 at 12:07 PM UTC
चर्चे हों कुरबानी के दुश्मन ललकारे घर में घुसकर
तो प्रेम दिवस की बातें करना कहानी सा लगता है
जब तिरंगे में लिपटकर वापिस आते वीर चवालिस
तब चॉकलेट और तोहफ़े लेना मनमानी सा लगता है
जब शहीदों की चिंताओं पे सौ सौ फूल बरसते हैं
तब ग़ुलाब की आस लगाना बेमानी सा लगता है
बारूदों की आग लगी जब झुलसे देश धमाकों से
मोमबत्तियों में दावत खाना क्या रूमानी सा लगता है
जब माँओं की गोद उजड़ती लावारिस हों नन्हे मुन्ने
मेहबूब की बाहों में छुप जाना नाफ़रमानी सा लगता है
जब हो जाये सीमाओं पे कितने निर्दोषों की कुर्बानी
तब बेमतलब के जलसों में भी वीरानी सा लगता है
चीत्कार हो वीरों का जब करना हो कुछ काम तूफ़ानी
तब चैन से सोना भी वतन से बेईमानी सा लगता है
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