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कुछ इच्छाएं जो मन में सदा घर करती थी, जो अपने घर ही क्या, परिवार में हंसी बिखेरा करती थी। मन हृदय से कोमल, न द्वेष न दुर्भाव था, कुछ आगे चलने का उसका ख्वाब था। अपने घर की प्यारी, सबकी रूह में बसती थी, हर ग़मो का हरले, ऐसी प्यारी हस्ती थी। अब समाज की परम्परा में आगे बढ़ना था, जिनसे खुद अनभिज्ञ, उन अध्यायों को भी तो गढ़ना था। आज हर एक स्वप्न अपना उसे अधूरा-सा लगता है, कुछ चाव नहीं उसको, सब नीरस-सा लगता है। कुछ जिम्मेदारियां जो उस पर डाली गई, कहां सीखा उसने उनसे गुजरना भी— एक भयावह अघटित काल-सा लगता है। हर रोज़ एक नवीन अध्याय जिसे पढ़ना है, पता खुद को भी नहीं किस परवान उसे चढ़ना है। अब हंसी भी उसकी धूमिल नज़र आती है, दुख तो आते हैं सदा, बस खुशी नज़र न आती है। चलती रहती है अपनी इस बेरहम राही को, पर बता भी न सकती अपनी दर्द की खाई को। जब भी मिलती है किसी से, खुश नज़र आती है, दुख कितना भी हो मन में, पर उनको छुपाती है। एक दिन उसके भी सपने होंगे पूरे, पर कुछ अटकलें उस जीवन के पथ की ओर— कुछ ये टूटी उम्मीद उसे फिर से कचोट जाती है। अब खुद के लिए जीना छोड़ दिया, जो भी था उसके पास—सब कुछ मोड़ दिया। अब वक्त है उसकी समझने की कोशिश का, कुछ न बनने वाला इस झूठी कशिश का। अब जीना भी उसने सीख लिया, कौन उसका—वो भी उसने तीख लिया।। पर हिम्मत उसकी जिसने उसको स्वीकारा है, जो भी घटित जीवन में, वो एक जखीरा है। कुछ खुशी भी जीवन में आने को आतुर होगी, या बस जीवन में इन दुखों का ही जखीरा है! पर इस सत्य को भी उसको झुठलाना है, बस जीवन में अपने रंग बरसाना है। है जल की तरह कोमल भी, पर कुछ यूँ बदलना है— बनना होगा उसे भी बर्फ की तरह कठोर, पर हमेशा ही उसे तो पिघलना है…
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Dec 3, 2025
Dec 3, 2025 at 8:58 AM UTC
“वह जो कह न सकी” (मुस्कान के पीछे)
कुछ इच्छाएं जो मन में सदा घर करती थी, जो अपने घर ही क्या, परिवार में हंसी बिखेरा करती थी। मन हृदय से कोमल, न द्वेष न दुर्भाव था, कुछ आगे चलने का उसका ख्वाब था। अपने घर की प्यारी, सबकी रूह में बसती थी, हर ग़मो का हरले, ऐसी प्यारी हस्ती थी। अब समाज की परम्परा में आगे बढ़ना था, जिनसे खुद अनभिज्ञ, उन अध्यायों को भी तो गढ़ना था। आज हर एक स्वप्न अपना उसे अधूरा-सा लगता है, कुछ चाव नहीं उसको, सब नीरस-सा लगता है। कुछ जिम्मेदारियां जो उस पर डाली गई, कहां सीखा उसने उनसे गुजरना भी— एक भयावह अघटित काल-सा लगता है। हर रोज़ एक नवीन अध्याय जिसे पढ़ना है, पता खुद को भी नहीं किस परवान उसे चढ़ना है। अब हंसी भी उसकी धूमिल नज़र आती है, दुख तो आते हैं सदा, बस खुशी नज़र न आती है। चलती रहती है अपनी इस बेरहम राही को, पर बता भी न सकती अपनी दर्द की खाई को। जब भी मिलती है किसी से, खुश नज़र आती है, दुख कितना भी हो मन में, पर उनको छुपाती है। एक दिन उसके भी सपने होंगे पूरे, पर कुछ अटकलें उस जीवन के पथ की ओर— कुछ ये टूटी उम्मीद उसे फिर से कचोट जाती है। अब खुद के लिए जीना छोड़ दिया, जो भी था उसके पास—सब कुछ मोड़ दिया। अब वक्त है उसकी समझने की कोशिश का, कुछ न बनने वाला इस झूठी कशिश का। अब जीना भी उसने सीख लिया, कौन उसका—वो भी उसने तीख लिया।। पर हिम्मत उसकी जिसने उसको स्वीकारा है, जो भी घटित जीवन में, वो एक जखीरा है। कुछ खुशी भी जीवन में आने को आतुर होगी, या बस जीवन में इन दुखों का ही जखीरा है! पर इस सत्य को भी उसको झुठलाना है, बस जीवन में अपने रंग बरसाना है। है जल की तरह कोमल भी, पर कुछ यूँ बदलना है— बनना होगा उसे भी बर्फ की तरह कठोर, पर हमेशा ही उसे तो पिघलना है…
है जल की तरह कोमल भी, पर कुछ यूँ बदलना है— बनना होगा उसे भी बर्फ की तरह कठोर, पर हमेशा ही उसे तो पिघलना है…
MrNitinKumarmeena
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Dec 3, 2025
Dec 3, 2025 at 8:58 AM UTC
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