टूटी हुई टहनी तो टूटी ही रही,
हवाओं का माफ़ी माँग लेना क्या काम आया।।
कुछ अहसास दबे ही रहे मन में,
ऐसा क्या था जो इनको थाम आया।।
चलती रही ज़िंदगी बग़ैर तेरे साथ के भी,
ऐसा कोई मोड़ ही न आया जहाँ विराम आया।।
सोचता हूँ ये भी—ऐसा क्या था जो
तेरे ज़ेहन में अकस्मात ही ये ताम आया।।
बहुत बार मन में ये सवाल भी आया—
सब कुछ याद आया, पर आज तलक न तेरा नाम आया।।
रूठी थी जो किस्मत, रूठी ही रही,
ऐसा कोई प्रयोजन न था जो काम आया।।
कसर तो कोई बाकी थी नहीं,
फिर भी क्यों कोई दाम न आया।।
कश्मकश तो हमेशा से थी मन में,
मैं ख़ुद से न मिला—ऐसा कोई जाम न आया।।
ये सब तो था मेरी कल्पनाओं से परे,
जो संभव था उसका ही आयाम न आया।।
तुम सुलझा न सके एक सूत के धागे को भी,
फिर उसका कट जाना ही काम आया।।
बेचैनी सी रहती है हृदय में सदा ही,
जिस्म तो क्या, रूह को भी आराम न आया।।
आना ही था पेड़ों पर जो नवीन पल्लव को,
पुरानों का मिट जाना ही काम आया।।
मैं चलता रहा—थककर भी, कुछ गिरकर भी,
तो कुछ संभलकर भी—पर कोई विराम न आया।।
— By Mr. नितिन कुमार मीना
Belong to the great village Mohacha
Nov 23, 2025
Nov 23, 2025 at 11:42 PM UTC
टूटी हुई टहनी तो टूटी ही रही,
हवाओं का माफ़ी माँग लेना क्या काम आया।।
कुछ अहसास दबे ही रहे मन में,
ऐसा क्या था जो इनको थाम आया।।
चलती रही ज़िंदगी बग़ैर तेरे साथ के भी,
ऐसा कोई मोड़ ही न आया जहाँ विराम आया।।
सोचता हूँ ये भी—ऐसा क्या था जो
तेरे ज़ेहन में अकस्मात ही ये ताम आया।।
बहुत बार मन में ये सवाल भी आया—
सब कुछ याद आया, पर आज तलक न तेरा नाम आया।।
रूठी थी जो किस्मत, रूठी ही रही,
ऐसा कोई प्रयोजन न था जो काम आया।।
कसर तो कोई बाकी थी नहीं,
फिर भी क्यों कोई दाम न आया।।
कश्मकश तो हमेशा से थी मन में,
मैं ख़ुद से न मिला—ऐसा कोई जाम न आया।।
ये सब तो था मेरी कल्पनाओं से परे,
जो संभव था उसका ही आयाम न आया।।
तुम सुलझा न सके एक सूत के धागे को भी,
फिर उसका कट जाना ही काम आया।।
बेचैनी सी रहती है हृदय में सदा ही,
जिस्म तो क्या, रूह को भी आराम न आया।।
आना ही था पेड़ों पर जो नवीन पल्लव को,
पुरानों का मिट जाना ही काम आया।।
मैं चलता रहा—थककर भी, कुछ गिरकर भी,
तो कुछ संभलकर भी—पर कोई विराम न आया।।
— By Mr. नितिन कुमार मीना
Belong to the great village Mohacha
