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मैं लिखता नहीं  !! मैं लिखता नही स्याही हिं बस बहाता हूँ , कविता कल्पना है चिज बड़ी ए शाहब मैं मन से बनें दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ मैं बस शब्द का सृगार यार करता हूँ अपने अनूभवों का रंग उसमें भरता हूँ ॥ झूठी हर कहानी हीं सरल सी होती है बस यह सोच कर ही दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ मै किखता नहीं स्याही हिं बस बहाता हूँ ॥ कितने हिं कलम का मात्र मै अपराधि हूँ उनके रक्त का अपमान किया है, मैनें, अंधी जनता , सच्ची कहानी लिख-लिख कर   कितने स्याही  को बद्नाम किया है | मैंने कितनो कि कलम, साम्मान ले रही सबकी ह्त्या को भी, वलिदान कहा है जिसनें वाश्ना को कहे जो रंग नया जिवन कि अपराधों को विरता का तथ्य देते है ॥ पर मेरी कलम यह सब कला में असफल है । ऐसा लिखने से पहले, टुट जाती है । मैं लिखता नहीं स्याही हिं बस बहाता हूँ । कबिता कल्पना है चिज बड़ी ए शाहब, मैं मन से बने दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ - सुरज कुमर सिहँ दिनांक  :- 06 / 09 / 2012
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Feb 18, 2015
Feb 18, 2015 at 5:02 AM UTC
hindi poem on meri kalam (मैं लिखता नहीं !!)
मैं लिखता नहीं  !! मैं लिखता नही स्याही हिं बस बहाता हूँ , कविता कल्पना है चिज बड़ी ए शाहब मैं मन से बनें दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ मैं बस शब्द का सृगार यार करता हूँ अपने अनूभवों का रंग उसमें भरता हूँ ॥ झूठी हर कहानी हीं सरल सी होती है बस यह सोच कर ही दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ मै किखता नहीं स्याही हिं बस बहाता हूँ ॥ कितने हिं कलम का मात्र मै अपराधि हूँ उनके रक्त का अपमान किया है, मैनें, अंधी जनता , सच्ची कहानी लिख-लिख कर   कितने स्याही  को बद्नाम किया है | मैंने कितनो कि कलम, साम्मान ले रही सबकी ह्त्या को भी, वलिदान कहा है जिसनें वाश्ना को कहे जो रंग नया जिवन कि अपराधों को विरता का तथ्य देते है ॥ पर मेरी कलम यह सब कला में असफल है । ऐसा लिखने से पहले, टुट जाती है । मैं लिखता नहीं स्याही हिं बस बहाता हूँ । कबिता कल्पना है चिज बड़ी ए शाहब, मैं मन से बने दो शब्द गुनगुनाता हूँ ॥ - सुरज कुमर सिहँ दिनांक  :- 06 / 09 / 2012
suraj-kumar-singh
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Feb 18, 2015
Feb 18, 2015 at 5:02 AM UTC
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